पहाड़ों को लोग शांति के लिए जानते हैं।लेकिन कुछ पहाड़ ऐसे भी होते हैं, जहाँ खामोशी के नीचे गुनाह दबे होते हैं।हिमाचल के उस अनजान से कस्बे का नाम था — धवलगढ़।चारों तरफ ऊँचे पहाड़, बीच में एक पतली-सी सड़क, और नीचे गहरी खाई।यहाँ मोबाइल नेटवर्क कमजोर था, कानून और भी कमजोर।इसी कस्बे में एक शाम बस से उतरा अर्जुन मल्होत्रा।चेहरे पर दाढ़ी, आँखों में थकान और जेब में एक झूठा नाम।दुनिया उसे अर्जुन जानती थी,लेकिन उसका असली नाम था — आर्यन सिंह,दिल्ली क्राइम ब्रांच का अंडरकवर ऑफिसर।उसके मिशन का नाम था — ऑपरेशन स्नोब्लड।सूचना साफ थी—धवलगढ़ के पहाड़ों के बीच से एक बड़ा ड्रग रैकेट चल रहा है।नशा, हथियार, और पैसे—सब कुछ बर्फीली चोटियों की आड़ में।और इस पूरे खेल का एक ही नाम बार-बार सामने आ रहा था—राणा प्रताप रावत।अर्जुन ने कस्बे में एक छोटा सा लॉज लिया।लकड़ी की दीवारें, पुरानी घंटी, और एक रिसेप्शन—जहाँ पहली बार उसने उसे देखा।काव्या।साधारण सलवार-कुर्ता, बाल ढीले बंधे हुए,और आँखें…जिनमें डर भी था और मजबूरी भी।“रूम चाहिए?”उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे पहाड़ों की हवा।“हाँ,” अर्जुन ने कहा,“कुछ दिन रुकना है।”काव्या ने रजिस्टर आगे बढ़ाया।अर्जुन ने झूठा नाम लिखा— अर्जुन वर्मा।उनकी उंगलियाँ हल्की-सी टकराईं।एक पल को काव्या ने उसकी आँखों में देखा—जैसे कुछ पहचान लिया हो,या शायद कुछ खोया हुआ देख लिया हो।धवलगढ़ बाहर से शांत था,लेकिन रात होते ही पहाड़ बदल जाते थे।अर्जुन ने पहले ही हफ्ते समझ लिया—यहाँ हर कोई कुछ छुपा रहा है।लॉज के पीछे की सड़क,आधी रात को चलती गाड़ियाँ,और हर बार वही आदमी—राणा के लोग।काव्या सब देखती थी।पर कुछ कहती नहीं थी।एक रात, अर्जुन देर से लौटा।उसके हाथ में चोट थी।“यह कैसे लगी?”काव्या ने पूछा।“फिसल गया,”अर्जुन ने झूठ बोला।काव्या चुप रही,लेकिन उसकी आँखों में भरोसा नहीं था।धीरे-धीरे दोनों के बीच बातें बढ़ीं।कस्बे की, पहाड़ों की, और ज़िंदगी की।“तुम यहाँ क्यों रहती हो?”एक दिन अर्जुन ने पूछा।काव्या ने पहाड़ों की तरफ देखा।“क्योंकि यहाँ से भागने का रास्ता नहीं।”उसके पिता कभी इसी रैकेट के खिलाफ बोले थे।अगले हफ्ते—वे खाई में गिरे पाए गए।दुर्घटना कहकर मामला बंद कर दिया गया।और काव्या…राणा के इलाके में,उसी लॉज में,ज़िंदा लाश बनकर रह गई।अर्जुन का मिशन आगे बढ़ रहा था।सबूत मिल रहे थे।डील्स रिकॉर्ड हो रही थीं।लेकिन एक चीज़ प्लान में नहीं थी—काव्या।उसे अर्जुन से प्यार हो रहा था।बिना जाने कि वह कौन है।और अर्जुन…जिसे नियमों के मुताबिककिसी से जुड़ना नहीं था,वह हर दिन कमजोर पड़ रहा था।एक रात, सब बदल गया।अर्जुन को पता चला—अगली खेप उसी लॉज से जाएगी।और काव्या…इस सब से अनजान थी।उस रात अर्जुन ने फैसला किया—या तो मिशन,या काव्या।उसने काव्या को सब सच बता दिया।नाम, पहचान, मिशन—सब कुछ।काव्या की आँखों में आँसू नहीं थे।बस एक ठंडी मुस्कान।“तो तुम भी झूठे निकले,”उसने कहा।“लेकिन मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता,”अर्जुन की आवाज़ काँप रही थी।रात के दो बजे—राणा के आदमी आ गए।गोली चली।पहाड़ों में गूंज फैल गई।अर्जुन और काव्या भागे।अंधेरे, बर्फ और खाई के बीच।राणा खुद सामने आया।“प्यार बड़ी महंगी चीज़ है, अफसर,”वह हँसा।गोली चली।अर्जुन गिर पड़ा।काव्या ने पहली बार हथियार उठाया।और ट्रिगर दबा दिया।राणा वहीं गिर गया।सुबह होते-होते पुलिस पहुँच गई।ऑपरेशन सफल हुआ।रैकेट खत्म।लेकिन अर्जुन…बच नहीं पाया।अस्पताल में, आखिरी सांसों में,उसने काव्या का हाथ पकड़ा।“मुझे माफ़ कर देना…”काव्या रोई नहीं।उसने पहाड़ों की तरफ देखा।आज भी धवलगढ़ वैसा ही है।शांत।सुंदर।लेकिन उस लॉज के आँगन मेंएक छोटा सा बोर्ड लगा है—“यहाँ अर्जुन रहता था।जो प्यार और कानून—दोनों के लिए लड़ा।”पहाड़ गवाह हैं—कुछ प्यारअपराध से भी बड़ा होता है।— समाप्त —