यह कहानी उस लड़की की है जो बाहर से जितनी सामान्य दिखती थी, अंदर से उतनी ही उलझी हुई थी। बचपन से ही उसके मन में एक बात साफ़ थी—उसे अपनी कहानी खुद लिखनी है। किताबों में नहीं, शब्दों में नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी के फैसलों में।
वह अंडरकॉन्फिडेंट थी। यह उसने कभी खुलकर कहा नहीं, लेकिन महसूस हमेशा किया। हर कदम पर उसे खुद को समझाना पड़ता था कि वह कर सकती है। पढ़ाई में वह अच्छी थी, इसलिए उससे उम्मीदें जुड़ती चली गईं। परिवार को लगता था कि वह आगे बढ़ेगी, कुछ बड़ा करेगी। और सच कहें तो उसके सपने भी छोटे नहीं थे। लेकिन सपनों के साथ डर भी चलता था—गलत साबित होने का डर, पीछे रह जाने का डर।
जैसे-जैसे वह बड़ी हुई, ज़िंदगी ने उससे तेज़ फैसले माँगने शुरू कर दिए। करियर, जिम्मेदारियाँ, खुद को साबित करने की दौड़। उसने बहुत कुछ अपनी समझ से चलाने की कोशिश की। उसे लगता था कि अगर वह मेहनत करेगी, सही रास्ता चुनेगी, तो सब ठीक रहेगा। उस समय भगवान बस एक नाम थे—आस्था नहीं, आदत।
लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजना के हिसाब से नहीं चलती।
एक समय ऐसा आया जब उसे लगा कि वह थक गई है। जिस दिशा में वह चल रही थी, वहाँ सुकून नहीं था। बाहर से सब ठीक दिखता था, लेकिन अंदर कुछ लगातार खाली होता जा रहा था। उसे पहली बार एहसास हुआ कि केवल सही दिखने वाली ज़िंदगी, सही महसूस होने वाली ज़िंदगी नहीं होती।
यहीं से टूटन शुरू हुई।
उसे समझ आया कि बहुत कुछ ऐसा था जिसे वह अपने नियंत्रण में मान बैठी थी, लेकिन असल में वह कभी उसके हाथ में था ही नहीं। यह एहसास आसान नहीं था। उसे लगा जैसे उसकी पहचान, उसका आत्मविश्वास—सब सवालों में खड़ा है।
और इसी खालीपन में उसने पहली बार सच में रुककर देखा।
जब सब कुछ अनिश्चित लगने लगता है, तब इंसान के अंदर कुछ जागता है। कोई आवाज़ नहीं, कोई संकेत नहीं—बस एक गहरी शांति। वही अदृश्य शक्ति। वही भगवान।
शुरुआत में उसने भी प्रार्थना सिर्फ़ इसलिए की कि चीज़ें ठीक हो जाएँ। रास्ता साफ़ दिखने लगे। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आया कि भगवान ज़िंदगी आसान नहीं करते, वे हमें मज़बूत बनाते हैं। वे जवाब नहीं देते, दिशा देते हैं।
आज उसकी कहानी अभी भी अधूरी है। करियर तय हो रहा है। सपने आकार ले रहे हैं। वह अभी भी सीख रही है। लेकिन अब वह डर से नहीं चलती।
अब उसने अपनी ज़िंदगी
उसी के भरोसे छोड़ दी है
जिसने उसे बनाया है।
इसका मतलब यह नहीं कि उसने कोशिश छोड़ दी है। वह आज भी मेहनत करती है, फैसले लेती है, आगे बढ़ती है। फर्क बस इतना है कि अब वह अकेली नहीं है।
अब उसकी कहानी
दो लोग मिलकर लिख रहे हैं—
वह और उसका भगवान।
वह परीक्षा ले रहे हैं।
और वह भरोसा रखकर, सीखते हुए,
अपने सही समय का इंतज़ार कर रही है।
“जब भरोसा खुद पर और उस पर जाग जाता है, जो हमारी कहानी लिख रहा है, डर खुद-ब-खुद टूट जाता है। यही असली ताकत है—अपने कदम उसी के भरोसे चलाना।”
Faith in God turns uncertainty into hope and struggle into strength.
His timming is best.