Do Dil Kaise Milenge - 43 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | दो दिल कैसे मिलेंगे - 43

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दो दिल कैसे मिलेंगे - 43

ही एकांक्षी की धुंधली आंखों के सामने अधिराज की आकृति स्पष्ट हुई, उसका हृदय जोर से धड़क उठा। स्मृतियों की टूटी हुई कड़ियां एक क्षण के लिए आपस में जुड़ गईं।
“अ… अधिराज…!”
उसके होंठ कांप उठे।
बस यही एक क्षण विक्रम के लिए सबसे ख़तरनाक था।
विक्रम की आंखों में पागलपन उतर आया। “नहीं… तुमने उसे पहचान लिया…!”
बिना एक पल गंवाए उसने अपनी नाग-शक्ति को जागृत कर दिया। उसकी आंखें सर्प जैसी चमकने लगीं, गर्दन पर नीली रेखाएं उभर आईं। पूरा किला फुफकारती ऊर्जा से भर गया।
“अब बहुत हो चुका,” विक्रम गरजा,
“अगर तुम मेरी नहीं हो सकतीं… तो किसी की भी नहीं!”
उसने हाथ फैलाए और मंत्रोच्चार के साथ नाग-बंधन रचा। काले धुएं और विषैली ऊर्जा की लहरें एकांक्षी के चारों ओर लिपट गईं। एकांक्षी चीख भी नहीं पाई—उसका शरीर जैसे जकड़ गया।
उसी क्षण अधिराज आगे बढ़ा। उसके पंखों से प्रकाश फूट पड़ा, पक्षीराज का दिव्य स्वर गूंज उठा— “विक्रम! उसे छोड़ दो!”
लेकिन जैसे ही अधिराज ने आगे कदम रखा, नाग-बंधन की दूसरी परत सक्रिय हो गई। आकाश से भारी शक्ति गिरी और उसके पंखों को जकड़ लिया।
अधिराज घुटनों के बल झुक गया।
“नहीं…!”
उसकी आवाज़ में पहली बार बेबसी थी।
विक्रम ठहाका लगाकर हंसा— “पक्षीराज… आज तुम केवल देखोगे। इच्छा-धारी नाग का वश जब पूर्ण होता है, तब देव भी लाचार हो जाते हैं।”
अधिराज ने पूरी शक्ति लगाकर बंधन तोड़ने की कोशिश की, लेकिन हर प्रयास के साथ उसकी ऊर्जा क्षीण होती गई। उसके पंख झुक गए, प्रकाश मंद पड़ने लगा।
एकांक्षी की आंखों से आंसू बहने लगे। “अधिराज… मुझे छोड़कर मत जाना…”
अधिराज कांपती आवाज़ में बोला— “मैं यहीं हूं… मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा…”
लेकिन उसके शब्द खोखले पड़ गए। नाग-शक्ति ने एकांक्षी को अधिराज से दूर खींचना शुरू कर दिया।
विक्रम एकांक्षी को अपनी ओर खींचते हुए बोला— “तुम्हारी पहचान, तुम्हारी स्मृति, तुम्हारा प्रेम—सब मैं छीन लूंगा। अब तुम केवल मेरी हो।”
अधिराज ने आख़िरी बार पूरी शक्ति समेटी। “एकांक्षी! अगर तुम मुझे भूल भी जाओ… तो याद रखना—तुम्हारा हृदय कभी झूठ नहीं बोलेगा!”
एक तेज़ प्रकाश चमका—लेकिन वह पर्याप्त नहीं था।
नाग-बंधन ने एकांक्षी को अंधकार में लपेट लिया। उसकी आंखों के सामने अधिराज की छवि टूटती चली गई।
“…अधि…”
नाम अधूरा रह गया।
अगले ही पल विक्रम एकांक्षी को लेकर अंधकार द्वार में समा गया। किले में सन्नाटा छा गया।
अधिराज वहीं गिर पड़ा—पंख टूटे हुए, दृष्टि शून्य। “मैं… हार गया…?”
उसकी मुट्ठी से प्रकाश फिसल गया। “मैं अपनी एकांक्षी को खो चुका हूं…”
किले के बाहर, तान्या ने यह दृश्य महसूस किया। उसकी आंखों से आंसू गिर पड़े। “विक्रम ने जीत नहीं पाई… उसने केवल युद्ध को और भयानक बना दिया है…”
दूर अंधकार लोक में, विक्रम एकांक्षी को अपनी गोद में लिए फुसफुसाया— “अब कोई पक्षीराज, कोई स्मृति, कोई प्रेम… हमारे बीच नहीं आएगा।”
और कहीं बहुत दूर, टूटे पंखों के साथ खड़ा पक्षीराज अधिराज केवल एक ही प्रतिज्ञा दोहरा रहा था—
“यह अंत नहीं है…
यह युद्ध की शुरुआत है…”
अंधकार द्वार से गुजरते ही चारों ओर की दुनिया बदल गई। हवा भारी, विषैली और सर्द थी। आकाश हरे-काले धुएँ से भरा हुआ था, जिसमें बिजली की पतली रेखाएँ रेंग रही थीं। यह नागलोक था—जहाँ हर श्वास में शक्ति भी थी और मृत्यु भी।
विक्रम एकांक्षी को अपनी बाहों में लिए खड़ा था। उसके चारों ओर विशाल नाग-स्तंभ उठे हुए थे, जिन पर प्राचीन नाग-मंत्र खुदे थे। नीचे भूमि पर काले सर्पों की आकृतियाँ जीवित-सी प्रतीत हो रही थीं।
एकांक्षी की चेतना धीरे-धीरे लौट रही थी। उसने आंखें खोलीं तो सबसे पहले एक ठंडा, सिहरन भरा एहसास हुआ। “यह… यह जगह…?”
उसकी आवाज़ कमजोर थी।
विक्रम ने उसे नीचे उतारते हुए कहा— “नागलोक। अब यही तुम्हारा संसार है।”
एकांक्षी ने घबराकर चारों ओर देखा। “अधिराज…?”
उसने नाम लिया, लेकिन इस बार कोई प्रकाश नहीं आया, कोई प्रतिध्वनि नहीं हुई।
विक्रम की आंखों में संतोष उतर आया। “यहाँ उसकी शक्ति नहीं पहुँचती। यहाँ केवल नागों का नियम चलता है… और मेरा।”
वह उसे एक विशाल कक्ष में ले आया। कक्ष के बीचों-बीच नागशिला का सिंहासन था, जिसके पीछे अनगिनत सर्प फन फैलाए खड़े थे। दीवारों से नीली रोशनी टपक रही थी—जैसे स्वयं विष बह रहा हो।
विक्रम ने ज़मीन पर अपना हाथ रखा। नाग-बंधनों की जंजीरें उभर आईं और एकांक्षी के चारों ओर लिपट गईं। वे कठोर नहीं थीं, लेकिन उनसे निकलती शक्ति उसके शरीर को कमजोर कर रही थी।
“यह कैद नहीं है,” विक्रम ने धीरे से कहा,
“यह सुरक्षा है… मेरी सुरक्षा।”
एकांक्षी ने रोते हुए कहा— “तुम इसे जो भी नाम दो… मैं यहां अपनी मर्जी से नहीं हूं।”
विक्रम के चेहरे पर पल भर के लिए पीड़ा उभरी, फिर वह कठोर हो गया। “मर्जी… प्रेम… ये सब ऊपर की दुनिया के शब्द हैं। नागलोक में केवल अधिकार होता है।”
वह मुड़ा और आदेश दिया— “स्मृतिका!”
सफेद प्रकाश से वही परी प्रकट हुई, लेकिन इस बार उसका चेहरा बुझा हुआ था। “युवराज…”
“इस पर निगरानी रखो,” विक्रम बोला,
“कोई स्मृति वापस न जागे… खासकर उसका।”
स्मृतिका ने एकांक्षी की ओर देखा। उसकी आंखों में करुणा थी। “युवराज… नागलोक की शक्ति इसे तोड़ देगी। यह मानव है…”
विक्रम की आवाज़ कठोर हो गई— “तो इसे ढाल बना दो।”
स्मृतिका मौन हो गई। आदेश का उल्लंघन वह नहीं कर सकती थी।
रात जैसे कभी खत्म न होने वाली थी। एकांक्षी अकेली बैठी रही। उसके चारों ओर सर्पों की फुफकार गूंजती रही, लेकिन किसी ने उसे छुआ नहीं। फिर भी हर पल उसे लग रहा था जैसे उसका अस्तित्व धीरे-धीरे घुल रहा हो।
उसने आंखें बंद कीं। “अधिराज… अगर तुम मुझे सुन सकते हो… तो जान लो… मैं तुम्हें भूलना नहीं चाहती…”
नागलोक की गहराइयों में, कहीं दूर, एक हल्का-सा प्रकाश काँपा—जैसे किसी ने पुकार सुन ली हो।
उसी समय, ऊपर की दुनिया में, टूटे पंखों के साथ अधिराज ने नागलोक की दिशा में देखा। उसके चारों ओर मौन था, लेकिन हृदय में ज्वाला फिर जल उठी।
“नागलोक ने मेरी शक्ति छीनी है,” उसने स्वयं से कहा,
“लेकिन प्रेम को नहीं।”
उसकी आंखों में दृढ़ता लौटी। “एकांक्षी… मैं तुम्हें लेने आऊंगा…
चाहे मुझे पक्षीराज से कुछ और बनना पड़े।”
नागलोक में, एकांक्षी ने महसूस किया—कैद के बीच भी, उसके भीतर कुछ जीवित था।
एक स्मृति नहीं…
एक एहसास।
और यही एहसास आगे चलकर नागलोक की सबसे बड़ी भूल बनने वाला था…