नागलोक में आज असामान्य हलचल थी। काले आकाश में लाल बिजली चमक रही थी, और नाग-स्तंभों पर लिपटे सर्प बार-बार फुफकार रहे थे। यह किसी युद्ध का नहीं, बल्कि विवाह का संकेत था—ऐसा विवाह, जो इच्छा से नहीं, वश से होने वाला था।
विक्रम नागराजी वेश में नागशिला सिंहासन पर खड़ा था। उसके माथे पर नागमणि चमक रही थी, आंखों में अधिकार और जुनून। “आज यह बंधन पूरा होगा,” उसने घोषणा की,
“आज एकांक्षी केवल मेरी बनेगी—नागलोक की महारानी।”
दूसरी ओर, एकांक्षी को लाल वस्त्र पहनाए जा रहे थे। वे वस्त्र भारी थे, विषैले मंत्रों से सिले हुए—जो पहनने वाले की इच्छा को दबा देते हैं। उसके हाथों में नागसूत्र बांधा जा रहा था।
एकांक्षी की आंखों से आंसू बह रहे थे। “यह विवाह नहीं… यह कैद है…”
स्मृतिका उसके पास खड़ी कांप रही थी। “क्षमा करना… मैं तुम्हें बचा नहीं पा रही…”
एकांक्षी ने धीमे से कहा— “अगर प्रेम सच है… तो वह रास्ता ढूंढ लेगा…”
मंत्र शुरू हुए। अग्निकुंड में नीली आग जल उठी। जैसे ही विक्रम ने आगे बढ़कर एकांक्षी का हाथ पकड़ना चाहा—
धड़ाम!
पूरा नागलोक कांप उठा।
आकाश फटने लगा, और काले बादलों के बीच से स्वर्ण प्रकाश उतर आया। वह प्रकाश नागलोक के लिए असहनीय था।
“यह… यह असंभव है…!”
विक्रम पीछे हट गया।
अग्निकुंड के सामने, टूटे पंखों की जगह अब अग्नि-पंख फैलाए कोई खड़ा था। आंखों में पक्षीराज से भी अधिक तेज़ ज्वाला।
वह अधिराज था—लेकिन बदला हुआ।
“विवाह उसकी इच्छा से होता है,” उसकी आवाज़ गूंज उठी,
“वश से नहीं।”
नागलोक के सर्प पीछे हटने लगे। नागमंत्र दरकने लगे।
विक्रम गरजा— “तुम यहां कैसे आए…? नागलोक की सीमा कोई पार नहीं कर सकता!”
अधिराज आगे बढ़ा। “प्रेम ने मुझे वह बना दिया है, जो मैं पहले नहीं था।”
वह सीधे एकांक्षी के सामने आया। जैसे ही उसने उसके माथे को छुआ—नागसूत्र टूट गया, लाल वस्त्र राख हो गए।
एकांक्षी की आंखों में रोशनी भर आई। “अधिराज…!”
विक्रम पागल-सा हंस पड़ा। “अगर तुम उसे ले जाना चाहते हो… तो नागलोक का श्राप भी साथ ले जाओगे!”
उसने अंतिम नागास्त्र छोड़ा।
अधिराज ने एकांक्षी को अपने पीछे कर लिया। अग्नि-पंख पूरी तरह फैल गए। “अगर इसकी कीमत मेरी शक्ति है… तो भी स्वीकार है।”
तेज़ प्रकाश फूटा।
जब रोशनी छटी—
नागलोक की विवाह वेदी खंडहर बन चुकी थी।
एकांक्षी अधिराज की बाहों में थी—सुरक्षित। विक्रम घुटनों के बल गिरा था, उसकी नागमणि बुझ चुकी थी।
अधिराज ने अंतिम बार कहा— “प्रेम को बांधा नहीं जा सकता, विक्रम।
और जिसे आत्मा ने चुना हो… उसे कोई नागलोक नहीं रोक सकता।”
अगले ही पल, प्रकाश द्वार खुला—और दोनों नागलोक से बाहर चले गए।
पीछे रह गया केवल सन्नाटा…
और विक्रम, जो पहली बार समझ रहा था—
उसने विवाह नहीं खोया था…
उसने युद्ध हार दिया था।
नागलोक से बाहर निकलते ही एकांक्षी की चेतना डगमगा गई। अधिराज ने उसे थाम लिया। जैसे ही उसका सिर अधिराज के हृदय से लगा, एक तीव्र स्पंदन उठा—मानो समय की परतें एक साथ फटने लगी हों।
एकांक्षी ने आंखें बंद कीं।
और फिर…
अंधकार नहीं आया।
स्मृति आई।
वह स्वयं को एक विशाल, प्राचीन लोक में खड़ी देखती है। चारों ओर औषधियों की सुगंध, जड़ी-बूटियों से भरे पात्र, और मंत्रों से सजा एक कक्ष।
वह स्वयं को पहचान जाती है—
वैदेही।
उसके वस्त्र सरल थे, हाथों में औषधियों का कटोरा, आंखों में करुणा और साहस। “मैं… वैदेही हूं…”
एकांक्षी के होंठ कांपते हैं।
दृश्य बदलता है।
एक युद्धभूमि—आकाश फटा हुआ, धरती कांपती हुई।
सामने खड़ा है प्राक्षिरोध—अंधकार और विनाश का स्वरूप।
और उसके सामने, अग्नि-पंख फैलाए खड़ा है अधिराज—तब भी वही, अब भी वही।
वैदेही अधिराज की ओर दौड़ती है। “अधिराज! तुम्हारी ऊर्जा क्षीण हो रही है… तुम यह युद्ध अकेले नहीं जीत पाओगे!”
अधिराज उसकी ओर देखकर कहता है— “वैदेही, यह युद्ध मेरा है… तुम पीछे हट जाओ।”
वैदेही मुस्कराती है। “जहां प्रेम है… वहां युद्ध अकेले का नहीं होता।”
प्राक्षिरोध अपना अंतिम प्रहार करता है—एक ऐसा आघात, जो सीधे अधिराज के हृदय की ओर बढ़ता है।
सब कुछ थम जाता है।
वैदेही बिना एक क्षण सोचे अधिराज के सामने आ जाती है।
“नहीं!”
वह अपनी सम्पूर्ण उपचार-शक्ति, प्राण-ऊर्जा, सब कुछ एक मंत्र में बदल देती है—
प्राण-न्यास।
आघात वैदेही को चीरता हुआ निकल जाता है।
अधिराज की चीख पूरे लोक में गूंजती है— “वैदेही—!!!”
वह उसे थाम लेता है। वैदेही की सांसें टूट रही हैं, लेकिन चेहरे पर शांति है। “रोओ मत… अधिराज…”
वह धीमे से कहती है,
“जब तक प्रेम जीवित है… मृत्यु हार जाती है…”
उसकी हथेली अधिराज के हृदय पर टिक जाती है—और वहीं स्थिर हो जाती है।
वैदेही चली जाती है।
अधिराज बच जाता है।
दृश्य टूटता है।
वर्तमान में, एकांक्षी जोर से सांस लेती है। उसकी आंखों से अविरल आंसू बह रहे हैं। “मैं… वैदेही थी…”
उसकी आवाज़ कांप रही है।
“मैंने… तुम्हारे लिए… अपना जीवन दिया था…”
अधिराज स्तब्ध खड़ा है। “मुझे याद है…”
उसकी आंखें भर आती हैं,
“हर जन्म में एक रिक्तता थी… अब समझ आया… वह तुम थी।”
एकांक्षी ने उसका हाथ थाम लिया। “प्राक्षिरोध अभी समाप्त नहीं हुआ है, है न…?
मेरा बलिदान उसे रोक नहीं पाया…”
अधिराज ने दृढ़ स्वर में कहा— “लेकिन इस जन्म में… मैं तुम्हें नहीं खोऊंगा।”
उसने उसके माथे पर हाथ रखा। “अब तुम केवल मेरी प्रेमिका नहीं…
तुम वही हो, जिसने मुझे जीवन दिया था।”
आकाश में हल्का प्रकाश फैल गया। जैसे स्वयं समय ने इस स्मृति को स्वीकार कर लिया हो।
एकांक्षी—अब केवल एकांक्षी नहीं थी।
वह वैदेही भी थी।
और प्रेम—
अब स्मृति बनकर नहीं,
संघर्ष बनकर लौट आया था।