love on wings in Hindi Thriller by Pooja Singh books and stories PDF | पंखो में बंधा प्रेम

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पंखो में बंधा प्रेम

पक्षीलोक की सुबह आज कुछ अलग थी।
आकाश सामान्य से अधिक उजला था, हवाओं में हल्की सी मिठास थी, और महल के ऊँचे शिखरों पर बैठे पक्षी बिना कारण ही मधुर स्वर में गा रहे थे।
रानी एकांक्षी महल की बालकनी में खड़ी थीं।
उनकी हथेलियाँ अनायास ही अपने उदर पर जा टिकीं।
दिल की धड़कनें आज कुछ तेज़ थीं…
जैसे भीतर कोई नई हलचल जन्म ले रही हो।
“अधिराज…”
उनके होंठों से अनजाने में ही नाम फिसल गया।
अधिराज, जो कुछ ही दूरी पर अपने पंखों को समेटे खड़े थे, उनकी आवाज़ सुनकर तुरंत उनकी ओर बढ़े।
“क्या हुआ एकांक्षी?”
उनकी आवाज़ में वही पुराना अपनापन था, वही सुरक्षा।
एकांक्षी कुछ क्षण चुप रहीं।
फिर धीरे से बोलीं—
“मुझे नहीं पता ये क्या है…
पर आज सुबह से मेरे भीतर एक अलग ही ऊर्जा है।
जैसे… कोई मुझे पुकार रहा हो।”
अधिराज ने उनकी आँखों में देखा।
वही आँखें, जिनके लिए उसने युद्ध लड़े थे, जिनके लिए उसने लोकों को चुनौती दी थी।
“क्या तुम्हें कोई पीड़ा है?”
उन्होंने चिंतित होकर पूछा।
एकांक्षी हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाती हैं—
“नहीं… पीड़ा नहीं।
बल्कि… शांति।”
उसी समय महल के द्वार पर हलचल होती है।
राजवैद्य और देवी सावित्री, दोनों एक साथ अंदर आते हैं।
राजवैद्य का चेहरा असामान्य रूप से गंभीर था,
पर आँखों में चमक छिपी नहीं थी।
रानी रत्नावली भी अपने कक्ष से बाहर आ चुकी थीं।
“क्या बात है?”
रत्नावली ने पूछा।
राजवैद्य एकांक्षी के सामने झुकते हैं और कहते हैं—
“महारानी…
पक्षीलोक को उत्तराधिकारी मिलने वाला है।”
क्षण भर के लिए समय थम सा गया।
एकांक्षी की आँखें फैल जाती हैं।
अधिराज की साँस रुक जाती है।
“क्या…?”
अधिराज के मुख से शब्द मुश्किल से निकलते हैं।
राजवैद्य मुस्कुराते हैं—
“हाँ महाराज।
रानी एकांक्षी के गर्भ में एक दिव्य आत्मा ने प्रवेश किया है।”
रत्नावली के नेत्र भर आते हैं।
वो आगे बढ़कर एकांक्षी को अपने सीने से लगा लेती हैं।
“देवताओं की कृपा है ये…”
उनकी आवाज़ कांप रही थी।
अधिराज धीरे-धीरे एकांक्षी के सामने घुटनों के बल बैठ जाते हैं।
अपने माथे को उनकी हथेली से लगाते हुए कहते हैं—
“तुमने मुझे जीवन दिया था…
और अब हमारा प्रेम जीवन को जन्म देने वाला है।”
एकांक्षी की आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
ये आँसू डर के नहीं थे—
ये भविष्य की रोशनी के थे।
लेकिन उसी क्षण…
आकाश में बिजली कौंधती है।
महल के ऊपर बैठे पक्षी अचानक उड़ जाते हैं।
हवा भारी हो जाती है।
राजवैद्य का चेहरा गंभीर हो जाता है।
“महाराज…”
वे धीमे स्वर में कहते हैं—
“ये बच्चा साधारण नहीं होगा।
इसके जन्म से त्रिलोक का संतुलन बदलेगा।”
अधिराज उठ खड़े होते हैं।
उनकी आँखों में पिता की ममता के साथ योद्धा की चेतावनी भी थी।
“जो भी आए…”
वे आकाश की ओर देखते हुए कहते हैं—
“मेरी संतान को कोई स्पर्श नहीं कर पाएगा।
इसके लिए मुझे फिर से युद्ध ही क्यों न लड़ना पड़े।”
एकांक्षी उनके पास खड़ी होकर उनका हाथ थाम लेती हैं।
“इस बार…”
वो दृढ़ स्वर में कहती हैं—
“हम अकेले नहीं हैं।”
दूर कहीं…
अंधकार में एक शक्ति मुस्कुरा उठती है।
“तो भविष्य ने जन्म लेना शुरू कर दिया है…”
पक्षीलोक की रात्रि आज असामान्य रूप से शांत थी.
चंद्रमा पूर्ण था, पर उसकी रोशनी में हल्की सुनहरी आभा घुली हुई थी—
जैसे आकाश स्वयं किसी महान आत्मा के आगमन की तैयारी कर रहा हो.
एकांक्षी अपने कक्ष में विश्राम कर रही थीं.
उनकी साँसों की लय के साथ ही उनके गर्भ से मंद प्रकाश फैल रहा था—
ना तेज, ना डरावना.
बल्कि सुरक्षित और दिव्य.
अधिराज उनके पास बैठे थे.
उनके पंख स्वतः ही फैल गए थे, मानो किसी अदृश्य ऊर्जा को ढक रहे हों.
अधिराज.
एकांक्षी ने धीमे स्वर में कहा.
मुझे स्वप्न नहीं. दर्शन हो रहे हैं।
अधिराज सतर्क हो गए.
कैसे दर्शन?
एकांक्षी ने आँखें बंद कर लीं.
मैं एक आकाश देखती हूँ.
तीन रंगों में बँटा हुआ.
नीला—पक्षीलोक का.
स्वर्ण—मानव लोक का.
और गहरा लाल—नागलोक का।
अधिराज का मुख गंभीर हो गया.
तीनों लोक.
उसी क्षण महल के प्राचीन गर्भगृह में स्थित त्रिलोक शिला कम्पन करने लगती है.
रानी रत्नावली, राजवैद्य और महर्षि सौमित्र वहाँ एकत्र हो जाते हैं.
शिला पर स्वयं प्रकाश उभर आता है.
महर्षि सौमित्र ने आँखें बंद कर मंत्रोच्चार किया.
क्षण भर बाद उनके मुख से शब्द निकलते हैं—
ये एक नहीं.
दो आत्माएँ हैं।
सन्नाटा.
दो.
रत्नावली ने अविश्वास से पूछा.
महर्षि ने सिर झुकाया.
हाँ महारानी.
एकांक्षी के गर्भ में जुडवा दिव्य आत्माएँ हैं।
एकांक्षी की आँखें भर आती हैं.
अधिराज का हाथ कसकर उनके हाथ में आ जाता है.
शिला पर अब दो प्रकाश बिंदु स्पष्ट दिखाई देते हैं.
पहला प्रकाश — उज्ज्वल और शांत
महर्षि बोले—
यह आत्मा संतुलन की वाहक होगी.
यह न युद्ध चाहेगी, न विनाश.
यह लोकों को जोडने वाली होगी।
शिला पर शब्द उभरते हैं—
नाम: आर्यविहान
शक्ति:
त्रिलोक संतुलन
स्मृति जागरण
प्राण- ऊर्जा का उपचार
सत्य को पहचानने की दृष्टि
यह वैदेही की करुणा और अधिराज की बुद्धि का स्वरूप है।
दूसरा प्रकाश — तीव्र और प्रखर
दूसरा प्रकाश अचानक तेज हो उठता है.
महर्षि का स्वर भारी हो जाता है—
यह आत्मा रक्षक होगी.
जहाँ संतुलन टूटेगा,
वहाँ यह युद्ध बनेगी।
शब्द उभरते हैं—
नाम: व्योमकेतु
शक्ति:
दिव्य पंखास्त्र
अग्नि और वायु का नियंत्रण
नाग- विष प्रतिरोध
प्राक्षिरोध- वध की क्षमता
यह अधिराज का पराक्रम और एकांक्षी का त्याग है।
अधिराज की आँखों में चमक और भय—दोनों थे.
तो.
हमारे बच्चे.
उनकी आवाज भर्रा गई—
त्रिलोक का भाग्य होंगे?
महर्षि ने गंभीरता से कहा—
हाँ महाराज.
पर ध्यान रहे—
इनमें से एक मार्ग दिखाएगा,
दूसरा मार्ग की रक्षा करेगा।
रत्नावली आगे बढती हैं और एकांक्षी के मस्तक पर हाथ रखती हैं.
मेरे पौत्र नहीं.
वे भावुक स्वर में कहती हैं—
ये त्रिलोक के उत्तराधिकारी होंगे।
लेकिन उसी क्षण.
दूर अंधकार में,
प्राक्षिरोध की आँखें खुलती हैं.
तो भविष्य ने अपना नाम पा लिया है.
उसकी हँसी गूँजती है.
अब देखेंगे—
संतुलन टिकता है या टूटता है।
महल के भीतर.
एकांक्षी अपने गर्भ पर हाथ रखती हैं.
मेरे बच्चे.
वे फुसफुसाती हैं—
मैं तुम्हें किसी युद्ध के लिए नहीं.
प्रेम के लिए जन्म दूँगी।
अधिराज आकाश की ओर देखते हैं.
और अगर युद्ध आया.
उनकी आवाज में वज्र था—
तो वो मुझसे होकर जाएगा।
पक्षीलोक की रात अचानक अस्थिर हो उठी थी.
हवाएँ जो सामान्यतः मधुर गीत गुनगुनाती थीं, अब भारी और बोझिल थीं.
आकाश में बादल बिना गर्जना के ही आपस में टकरा रहे थे—
मानो किसी अनकहे संकट की सूचना दे रहे हों.
एकांक्षी अपने कक्ष में ध्यानावस्था में थीं.
उनके गर्भ से निकलती दिव्य आभा आज पहले से अधिक तीव्र थी.
दो प्रकाश—एक शांत, एक उग्र—
धीरे- धीरे उनके भीतर समरस होने का प्रयास कर रहे थे.
अधिराज द्वार के बाहर खडे थे.
उनकी दृष्टि स्थिर थी, पर हृदय अशांत.
ये शांति.
किसी तूफान से पहले की है,
उन्होंने स्वयं से कहा.
उसी क्षण—
महल की सुरक्षा रेखा काँप उठती है.
त्रिलोक शिला पर दरार सी चमकती है.
महर्षि सौमित्र चौंक कर उठते हैं—
महाराज!
नागलोक में हलचल है।
रत्नावली का मुख कठोर हो जाता है.
प्राक्षिरोध?
महर्षि ने सिर झुकाया.
और.
उससे भी गहरा अंधकार।
इसी समय—
एकांक्षी की साँसें तेज हो जाती हैं.
अधिराज.
उनकी आवाज भीतर से गूँजती है.
अधिराज पल भर में उनके कक्ष में पहुँचते हैं.
मैं यहीं हूँ।
एकांक्षी अपने हृदय पर हाथ रखती हैं.
कोई.
इन तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है।
अचानक कक्ष का प्रकाश मंद पड जाता है.
दीवारों पर नागाकार छायाएँ रेंगने लगती हैं.
और फिर—
हवा के बीच से एक परिचित, भयावह स्वर—
वैदेही.
एकांक्षी काँप उठती हैं.
ये नाम.
उन्होंने आँखें बंद कर लीं.
प्राक्षिरोध की आकृति अर्ध- छाया में उभरती है.
उसकी आँखें लाल, और मुस्कान विषैली.
तो तुम फिर जीवन पा गईं.
और इस बार.
दो बार मेरा विनाश बनकर।
अधिराज आगे बढते हैं.
उनके पंख फैलते हैं, आकाशीय अस्त्र जाग उठता है.
एक कदम और बढाया.
तो ये यहीं समाप्त हो जाएगा।
प्राक्षिरोध हँसता है.
मुझे तुम्हारा अंत नहीं चाहिए, पक्षीराज.
मुझे तो केवल वो शक्ति चाहिए—
जो उसके गर्भ में पल रही है।
उसके हाथ उठते हैं.
धरती के भीतर से काले नागाकार ऊर्जा सूत्र उठते हैं—
सीधे एकांक्षी की ओर.
एकांक्षी अचानक अपने गर्भ पर हाथ रखती हैं.
दोनों प्रकाश बिंदु तेजी से चमकते हैं.
व्योमकेतु की ऊर्जा उग्र हो उठती है—
पूरा कक्ष काँप उठता है.
आर्यविहान की ऊर्जा फैलती है—
एक स्वर्ण कवच बन जाता है.
प्राक्षिरोध चौंक जाता है.
अभी से.
नहीं.
ये बहुत जल्दी है!
अधिराज उस क्षण आकाशीय वज्र छोडते हैं.
प्राक्षिरोध पीछे हटता है, पर हँसता हुआ.
ये तो बस दस्तक थी.
असल युद्ध तब होगा—
जब वे जन्म लेंगे।
और वो छाया में विलीन हो जाता है.
क्षण भर बाद—
सब शांत.
एकांक्षी अधिराज की बाँहों में गिर पडती हैं.
मैं डर गई थी.
उन्होंने धीमे से कहा.
अधिराज उन्हें थामे हुए बोले—
और मैं कभी डरने नहीं दूँगा।
महर्षि सौमित्र भीतर आते हैं.
उनका स्वर गंभीर है.
महाराज.
अब यह स्पष्ट है—
इन बच्चों का जन्म
गुप्त रखा जाएगा।
रत्नावली ने दृढ स्वर में कहा—
आज से पक्षीलोक नहीं.
सिर्फ परिवार रहेगा।
एकांक्षी अपने गर्भ पर हाथ रखती हैं.
मेरे बच्चे.
तुम्हारे लिए
मैं फिर से वैदेही बनूँगी।
दूर अंधकार में—
प्राक्षिरोध की हँसी गूँजती है.
भाग्य ने चाल चल दी है.
अब मेरी बारी है।