शीर्षक: तुम्हारा अंश...!!
आज पूरे डेढ़ वर्ष बीत चुके थे,
जब आराध्या और अरुण पहली बार प्रेम में थे।
छठ बीतते ही आराध्या और अरुण अपने-अपने कर्मभूमि की ओर प्रस्थान कर रहे थे।
तभी रेलवे स्टेशन पर एक गर्भवती का स्नेहिल स्पर्श आराध्य को अवाक कर दिया , "जरा साइड हो जाओ बहिनी,पेट में बालक लिए है न.."
आराध्या "ओह,सॉरी सॉरी मैडम मैने आपको देखा नहीं,आप ठीक तो है ,, लीजिए यहां बैठ जाइए।"
आराध्या बेंच से उठकर वहीं पास खड़ी हो जाती है।
तब तक अरुण उसके लिए पके हुए भुट्टे पर नींबू मसलते हुए ला रहा था..,
दोनों ने भुट्टे खाए।
जाना दोनों को एक ही शहर था,
फिर भी एक स्टेशन की दूरी उन्हें मीलों की लग रही थी।
आमने सामने की सीट पर बैठे दोनों एक दूसरे को निहार रहे थे,
आराध्या ना सिर्फ अरुण को निहार रही थी बल्कि उसमें खो चुकी थी।उसका शरीर वहीं था, पर चेतना उस बेंच पर छूट गई थी,जहाँ एक गर्भवती स्त्री अपने अजन्मे बच्चे को
स्पर्श में पाल रही थी,
और अपने हाथों में पूरी मातृत्व-ममता उँडेल रही थी।
अरुण ने पूछा क्या देख रही हो इतनी देर से?
आराध्या का ध्यान टूटा , और मुंह से निकला "वो बच्चा..!" अरुण ने पूछा "कौन बच्चा ?"
आराध्या "वही जो हमारा तुम्हारा है।"
"पागल हो गई हो क्या.??" अरुण ने हंसते हुए कहा।
आराध्या हां और अब इस पागल को ,पागल करने के लिए एक बच्चा चाहिए, अरुण मुझे बच्चा चाहिए।
अरुण आराध्या की ओर देखता है और चुप हो जाता है शायद अरुण की इस चुप्पी में छुपी होगी आराध्या के हृदय की वो पीर जो एक अजन्मे बालक के लिए मां के भीतर उत्पन्न होती है।
वहां मौजूद एक 60 वर्षीय बूढ़ी स्त्री मन ही मन मुस्कुरा रही थी और सोच रही थी।
कितनी अचंभे की बात है —
एक बिन ब्याही स्त्री के भीतर
प्रियसी और पत्नी के प्रेम के सिवा
अब मातृत्व भी जन्म ले चुका है।
जैसे भरी गागर धीरे-धीरे
छलक कर उसके प्रेमी पर गिर रही हो।
शायद प्रेम जब अपने पराकाष्ठा पर हो और प्रेमी प्रियसी में लीन तो ऐसे भावों का उत्पन्न होना लाज़मी होता होगा।
आराध्या उतर चुकी थी जहांगीर पूरी रेलवे स्टेशन और अरुण तुगलकाबाद।
वर्ष बीतने को है पर आराध्या की ज़िद है कि समाप्त ही नहीं होती।
"तुम जानते हो अरुण मुझे कैसा बालक चाहिए.??"
"नहीं..! तुम ही जानो..!" अरुण ने नजर अंदाज करते हुए बोला।
" ओफ्फो.. तो सुनो न कि कैसे बच्चे चाहिए मुझे..।
दो,चार छः ग्यारह और 20 नहीं बस एक इकलौता..।
जानते हो क्यों..., पहली बात तो मै तुम्हारा प्रेम बांटना ही नहीं चाहती।"
"मैं नहीं चाहती इस संसार में कोई ऐसा आए
जो मुझे तुमसे ज़्यादा प्रिय हो जाए।
क्योंकि यह विधि का विधान है,
प्रेम से जन्मा बच्चा, प्रेमी से भी बड़ा हो जाता है।"
इस लिए मै नहीं चाहती कि मेरे जीवन में मुझे कोई तुम से अधिक प्रिय हो।
पर मै ये भी चाहती हूं कि तुम्हारा बचपना जो मैने कभी देखा ही नहीं, उसे नया आकार देकर उस बच्चे के भीतर महसूस करूं।
एक बालक मेरे अंगने में तुम्हारे नाम का चाहिए
थिरके तो उसके पैरों की आहट से तुम्हारा नाम गूंजना चाहिए।
मम्मी बोलें– उसके आंखों की चमक,चेहरे की रौनक देख आईना भी फीका पड़ जाए वह अपने बाप से तनिक भी कम नहीं होना चाहिए।
अरुण हंस कर मजाक उड़ा देता है "तो तुम बहकी हो"
पर सच कुछ और था वो कोई हार्मोनल बदलाव नहीं थे वह अपने करुण स्वर को और भारी कर बोलती है
"तुमसे ब्याह कर,
तुम्हारा बचपन देखने का सुख चाहिए और यदि न ब्याही गई तो मुझे मेरे जीने की वजह चाहिए अरुण !! "
"बिल्कुल तुम्हारे जैसा,
न उन्नीस, न बीस
बस तुम्हारा ही।"
अरुण बोला —
"पर तुम जानती हो न, हमारी कुछ मर्यादाएँ भी हैं आराध्या।"
आराध्या जैसे पहले से ही सब समझ बुझ कर तैयार बैठी हो।
" तुम अपना अंश कहीं समय के हाथों सौंप देना,
जब समाज मुझसे मुँह मोड़ ले,
तब मैं उसे अपनी कोख में जगह दे लूँगी। "
आराध्या एक सांस में लगातार बोली जा रही थी–
"तुम बस मेरा सहारा बनना, क्योंकि मैं तो कमाती तो हूं नहीं…पर उस प्रयोग में पैसे तो चाहिए ही होंगे न तुम लगा देना मगर मुझे मेरा बाबू जरूर ला देना। "
वो किसी और को मम्मी कहने का अधिकार न हो ये अधिकार बस मुझे देना।
क्योंकि मैं नहीं चाहती मेरे मन में थोड़ा भी सौतेलापन उपजे उस अजन्मे बालक के लिए।
तुम पूरा करोगे न?
अरुण हँसकर बोला —
अभी नहीं मिलेगा, सारी दुकानें बंद हो चुकी हैं।
तुम्हारी कल्पनाओं की दुकान ही खुली है बस।
खा पी के सूत रहो तुम्हारी दिमागी हालत ठीक नहीं।
अरुण हँस रहा था,
पर उसकी हँसी के पीछे डर था—
डर ज़िम्मेदारी का,
डर परिवार और समाज का,
और सबसे ज्यादा डर —
कि वह आराध्या को उतना चाह नहीं पा रहा,
जितना चाहे जाने की उसे आदत पड़ चुकी है।
पर वह नहीं मानी...,
अब तक ऐसी ही बाते करती रहती है,
हर रोज देवताओं से प्रार्थना में बस उसके साथ का जीवन ही मांगती है ।
आराध्या चाहती है
हर्ष–उल्लास,
नयन–नक्श,
राजा सब तहरे पऽ जाए।
गूंजे वाला किलकार मन के अंगना में–
संस्कार तहरे समाए ।
थिरके नंगे पाँव भरसक भुईंया में उऽ—
बस ओकरा में, तोहार बचपन लवट के आए।
आराध्या चाहती है कि वो अरुण से सिर्फ ब्याही नहीं जाए बल्कि उसके बुढ़ापे की मौजूद गवाह बने वह चाहती है दोनों के चेहरे की झुर्रियां और सिर के सारे बाल एक साथ चांदी हो और एक दिन दोनों के प्रेम की निशानी से जन्मा आर्या भी अपने पिता की तरह उसके सामने वर्दी में खड़ा हो।
वो रंग रूप कद काठी सब अपने बाप वाला धारण करे, और उसके चेहरे की लालिमा इतनी तेज हो कि उगते सूर्य की तरह सारे आसमान को प्रकाशित करे।
वो चाहती है हमारे बाद हमारी गढ़ी हुई प्रेम कहानियां इसी तरह इस धरती पर पुनःदोहराई जाए आर्य के जीवन में भी कोई आए और नेह का फूल खिलाए।
और बारी आए जब आराध्या के इस मृत्युलोक से दूर जाने की,तो फिर से नई दुल्हन की तरह वो बनारस की शाम में नहाती हुई,
वह काशी के आकाश में घुल कर,
और अरुण की बाँहों में
फिर से वही आराध्या बन जाए
जिसे कभी गर्भवती स्त्री ने छू लिया था।
और अंत में वह अपने वनवास की सजा कुछ यूं अरुण को दे जाए कि अरुण चाहे उस तक पहुंचना पर आसमान से आराध्या इतनी तेज चिल्लाए कि
"नही,अभी नहीं। अभी तो आपको आर्या की ढेर सारी कहानियां लिखनी बाकी है।"
जिसे मिल कर वो दोनों स्वर्ग में सुनाए।
अरुण इन सारी बातों को सुनकर समझकर भीतर ही भीतर आराध्या से दूर होने की ठान लेता है।
उसे लगता आराध्या की इच्छाएं और प्रेम दोनों ही अब आसमान छू रहीं है, उसके पांव अब धरती पर टिक नहीं रहें।
और इधर अरुण के पांव शायद जिम्मेदारियां ,परिवार के प्रति कर्तव्य उनकी इच्छाएं,उनकी हामी और सामाजिक बंधनों ने जकड़ रखा है।
अरुण सोचता था —
“मैं उसे खोना नहीं चाहता,
पर अगर उसे पा लिया
तो खुद को खो दूँगा।"
इस लिए पहले उसने देर से जवाब देना शुरू किया,
फिर जवाब छोटे होते गए,
और एक दिन शब्द ही खत्म हो गए
बस एक टिक और खामोशी बची।
आराध्या अब हर तरफ से ब्लॉक हो चुकी थी, सारे संपर्क टूट चुके थे किन्तु कौन समझाए अरुण को की प्रेम का बीज एक बार अंकुरित हो जाए तो दिन प्रतिदिन फलते फुलाते ही रहता है।
ये आज कल का आकर्षण तो नहीं जो समय के साथ समाप्त हो जाता है।
ये तो वह इंतजार है जिसमें प्रिय आत्मा की अर्थी भी सज जाए तो भी आंखों में इंतजार जीवित रह जाता है।
पर अंत में ये सवाल रह जाता है कि
क्या किसी को छोड़ देना आसान है,
या उसके साथ खुद को खो देने से डर जाना?