I am my grandparents' darling in Hindi Biography by sapna books and stories PDF | मैं दादा-दादी की लाड़ली

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मैं दादा-दादी की लाड़ली

मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।
उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।
घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,
तो वे दादा-दादी ही होते थे।

उनके लिए मैं केवल उनकी पोती नहीं थी,
बल्कि उनके दिन की शुरुआत
और शाम का सुकून भी थी।

मुझे आज भी याद है,
जब मैं छोटी-छोटी बातों पर रो दिया करती थी,
तो दादा मुझे अपने कंधों पर बिठा लेते थे
और दादी अपने दुपट्टे से
मेरे आँसू पोंछ दिया करती थीं।

उन दोनों के साथ रहते हुए
कभी यह एहसास ही नहीं हुआ
कि ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी भी हो सकती है।

मैं छोटी थी,
पर बहुत ज़िद्दी भी।
जो चीज़ एक बार दिल में आ जाती,
उसे पाना मेरी ज़िद बन जाता।

लोग कहते थे,
“यह लड़की बहुत ज़िद्दी है।”
पर मुझे लगता है
उसी ज़िद ने मुझे
अपनी क़ीमत समझना सिखाया।

शायद उसी ज़िद के पीछे
मेरा खुद से प्यार छिपा हुआ था।
मेरी आत्म-सम्मान की भावना
बचपन से ही मजबूत थी।

मैं जानबूझकर कभी
किसी का दिल नहीं दुखाती थी,
पर खुद को भी
कभी कम समझने नहीं देती थी।

दादा-दादी के प्यार ने मुझे सिखाया
कि प्यार का मतलब
सिर्फ देना ही नहीं होता,
बल्कि खुद को सम्मान देना भी होता है।


स्कूल के दिन – दोस्ती और मस्ती

स्कूल का समय
मेरी ज़िंदगी के सबसे रंगीन
और बेफिक्र दिन थे।

सुबह उठकर बस यही चिंता होती थी
कि यूनिफॉर्म ठीक पहनी है या नहीं,
और शाम को घर आते ही
खेलने की जल्दी रहती थी।

हम पाँच लड़कियाँ थीं—
सिर्फ सहेलियाँ नहीं,
बल्कि सबसे अच्छी दोस्त।

पढ़ाई कम
और मस्ती ज़्यादा होती थी।
हमारी अध्यापिका अक्सर हँसकर कहती थीं,
“तुम लोगों की पढ़ाई कम
और मस्ती ज़्यादा है।”

और हम बस मुस्कुरा देते थे,
क्योंकि हमें लगता था
कि ज़िंदगी बस इतनी-सी ही होती है।

घर से सिर्फ एक रुपया लेकर निकलना,
स्कूल के बाहर कोई छोटी-सी चीज़ लेना,
और फिर टिफ़िन आपस में बाँटकर खाना—
ये सब उस समय बहुत सामान्य लगता था।

लेकिन आज जब पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो समझ आता है
कि वही छोटी-छोटी बातें
मेरी ज़िंदगी की सबसे कीमती यादें बन चुकी हैं।

हमारी दोस्ती इतनी गहरी थी
कि अगर हम पाँच में से
एक भी लड़की स्कूल नहीं आती,
तो बाकी चार भी
स्कूल जाना बेकार समझती थीं।

उस समय लगता था
कि यह बचपना है,
पर आज समझ आता है—
यह बिना शर्त निभाई जाने वाली
वफ़ादारी थी।

अध्यापिका का मुझ पर
एक अलग ही भरोसा था।
उन्हें लगता था,
“यह लड़की कभी गलत नहीं हो सकती।”

उनका वह भरोसा
आज भी मेरे दिल के किसी कोने में
पूरी तरह सुरक्षित है।
जब भी ज़िंदगी मुझे उलझा देती है,
मैं वही भरोसा याद कर लेती हूँ।

वे दिन ऐसे थे
जब दुनिया बहुत सरल थी,
रिश्तों में कोई हिसाब-किताब नहीं था,
और खुश रहने के लिए
किसी वजह की ज़रूरत नहीं होती थी।

मुझे तब नहीं पता था
कि आगे चलकर ज़िंदगी
इतनी जटिल हो जाएगी।

पर एक बात सच है—
मेरा बचपन
और मेरे स्कूल के दिन
बहुत खूबसूरत थे।

इतने खूबसूरत
कि जब भी ज़िंदगी बोझ लगने लगती है,
मैं मन ही मन
उसी स्कूल वाली लड़की के पास
लौट जाती हूँ—
जो दोस्ती, प्यार
और खुद पर भरोसा करना जानती थी।

शायद उसी बचपन ने मुझे यह भी सिखाया
कि ज़िंदगी में चाहे
कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ,
अपनी जड़ों को
कभी नहीं भूलना चाहिए।

दादा-दादी का प्यार,
स्कूल की मासूम दोस्ती,
और वह बेफिक्र हँसी
आज भी मुझे सँभाल लेती है।

जब दुनिया सवाल करती है,
तब मेरा बचपन
मुझे जवाब देता है—
कि मैं कमजोर नहीं हूँ,
बस ज़्यादा महसूस करने वाली हूँ।

और शायद
यही मेरी पहचान है।
मेरे दादा दादी