Shrapit ek Prem Kahaani - 44 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 44

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 44

एकांश वर्शाली का हाथ पकड़ कर कहता है। 

एकांश :- वर्शाली उस रात मैने जो किया वो मेरा कर्तव्य था। पर वर्शाली तुम जो मेरे लिए कर रही हो वो पागलपन है। इसिलिए तुम अपने लोक लौट जाओ। मैरे वजह से तुम अपने आपको खतरे मे मत डालो और यहां से अपने लोक चले जाओ।


 एकांश की बात सुनकर वर्शाली कहती है--
.वर्शाली: - ये आप कैसी बात कर रहे हैं एकांश जी। मै आपको छोड़कर तब तक नही जा सकती एकांश जी। जब तक के ये आने वाला पूर्णिमा पार नहीं हो जाता उस समय तक मैं आपको छोड़कर नही जाउगीं। 


उधर भानपुर के इंद्रजीस और सत्यजीत दोनो साधु बाबा के पास काली मंदिर मे जाता है । गाड़ी चला रहे गिरी इंद्रजीत से पुछता है--


>" मालिक अगर हमारे गांव के पास वाला रक्षा कवच भी अगर किसीने तौड़ दिया तो क्या होगा मालिक ? 


इंद्रजीत :- इसिलिए तो हम यहां साधन बाबा के पास के आऐं है ताकी वो अब कुछ रास्ता निकाल सके। 


इंद्रजीत एक गहरी सांस लेकर कहता है --

>" पता नही ये रक्षा कवच त़को किसने गायब कर दिया और इसके पिछे उसका क्या स्वार्थ है। 


तभी सब काली मंदीर साधु बाबा के पास पहुँच जाता है। गाड़ी सो उतरकर सभी मंदीर के अंदर जाती है । जहां साधु बाबा मंदीर मे सोये हुए थे। इंद्रजीत काली मॉ को प्रणाम करता है। और साधु बाबा से कहता है--

>" बाबा को मेरा प्रणाम। 


इंद्रजीत के इतना कहने पर साधु बाबा दैखता है के वहां इंद्रजीत सत्यजीत और गिरी खड़े थे। साधु बाबा सभी के मन मै डर को देखते हुए कहता है---

>" तुमलोग रक्षा कलच के गायब होने का खबर सुनकर आऐ हो ना। आओ बैठो यहां। 


साधु बाबा के इतना कहने पर सभी हैरान हो जाता है। सत्यजीत हैरानी से साधु बाबा से पूछता है--


>" बाबा क्या आपको ये पता है के रक्षा कवच को किसने तौड़ा है ? 


साधू बाबा कहता है --


>" हां रक्षा कवच के टुटते ही मुझे इस बात का भान हो गया था। इसीलिए मैने ये (साधु बाबा एक कलस निकालकर सत्यजीत को देता है जो लाल कपड़े से बंधी है।) शिध्द कलस को तुम्हारे लिए रखा है। मुझे पता था के तुम यहां जरूर आओगे। 


सत्यजीत कलस को अपने हाथ मै लेकर कहता है। 

>" बाबा इस कलस का मैं क्या करूं। 

साधु :- इसे तुम उसी पैड़ पर बांध देना जहां की शिला गायब है। इसे बांधने से वो देत्य फिर से वही कैद हो जाएगा पर एक बात का ध्यान रहे अगर ये कलस भी गायब हो गया तो उस कुम्भन का क्रोध और भी भयानक होगा। 


 इंद्रजीत :- पर बाबा रक्षा कवच को तोड़ना कुम्भन के लिए असंभव था। तो फिर क्या ये काम किसी मनुष्य को है?

 साधु बाबा कहता है--.

>" हां सत्य कहा तुमने इंद्रजीत । रक्षा कलच को तोड़ना कुम्भन के लिए असंभव था। पर कोई तो है जो कुम्भन को मुत्क करना चाहता है। 

सत्यजीत साधु बाबा से पुछता है --

>" पर क्यो बाबा कुंम्भन जैसा भंयकर दैत्य को मुत्क करके किसी मनुषय का क्या लाभ। 


साधु बाबा कहता है--

>" शक्ति शिला को तोड़ना किसी साधारण मनुष्य का कार्य नही हैं। क्योकीं उममे इतनी साहस ही नही है के कुम्भन जैसै़े दैत्य का भय उनके मने मे ना हो। ये कार्य अवश्य ही कीसी योगी पुरूष का है पंरतु वो क्या चाहता है इसका पता लगाना बहुत जरूरी है। अन्यथा पूरे गांव मे संकट आ जाएगी। 


साधु बाबा इंद्रजीत से कहता है-----


>" इंद्रजीत तुम्हे इस बात की ध्यान रखना है के ये शक्ति कलस अब उस जगह से गायब ना हो। अब सिघ्र जाओ और इस शत्की कलस को उस जगह पर स्थापित कर दो। 


साधु बाबा के इतना कहने पर सभी उन्हें प्रणाम करके वहां से भानपूर की और रवाना हो जाता है। इंद्रीजीत चट्टान सिंह और दक्षराज को फौन करके सब बोलकर सुनाता है। और सभी को पैड़ के पास आने को कहता है।


 इधर के बहुत समझाने के बाद भी वर्शाली अपने लोक जाने को तैयार नही हुई और पूर्णिमा के बाद ही जाएगी ऐसा कहने लगी। एकांश वर्शाली की बात मान जाता है और कहता है----



>" ठीक है वर्षाली पर अगर तुम्हे कुछ हो गया तो मैं कभी अपने आपको माफ वही कर पाऊगां। 


एकांश फिर वर्शाली से पूछता है--

>" वर्शाली उस रात को कौन तुम्हे मारना चाहता था और तुम्हारे पास मणि होने के बाद भी तुम उसका सामना क्यों नही कर पा रही थी?

एकांश के पूछने से वर्शाली अपने उस पल मे चली जाती है। जब तांत्रीक वहां पर साधना कर रहे थे। मध्य रात्री का समय था । वर्शाली सुंदरवन के बाहर भानपूर के सड़क किनारे अकेली बैठकर एक गहरी चिंता मे डूबी थी।


 वर्शाली के मुह से बस एक ही बात निकल रही थी के हर्षाली को कैसे बचाऊं। तुम्हारी मणि को कहां ढुंढू । तभी वहां से दो मनुष्य गुजर रहा था। एक तात्रिकं की वेष भूशा मे था तो दूसरा कुर्ता पजामा पहना हुआ था दौनो को दैखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो दौनो किसी की तलास मे निकला था। 


जिसके ना मिलने के कारण दौनो काफी परेसान था। तभी दौनो की नजर वर्शाली पर पड़ती है। जो अपना सिर झुकाए जंगल की और मुह करते बैठी थी। दौनो ही वर्शाली के पास जाकर कहता है---


>" कौन हो तुम और इतनी रात को यहां इस जंगल मे अकेली क्या रही हो।


 उन दौनो ती बात सुनकर वर्शाली उठ जाती है जिससे वे दौनो वर्शाली को दैखकर चोंक जाता है और हैरानी से कहता है --

>" तुम ! पर तुमतो उस रात मर गया थी ना तो फिर तुम जिंदा कैसे हो गई। दौनो ही हैरानी से वर्शाली को ही दैख रहा था और वर्शाली की सुंदरता दैखकर दौनो ही उसपर मोहित हो जाता है और दौनो के अंदर काम वासना की प्रबल ईच्छा होने लगी थी। वर्शाली सफैद रंग के वस्त्र पहनी हुई थी जो वक्ष से नाभी तक खाली था। जिससे वे दौनो वर्शाली के सुदंर कमर और नाभी को दैख रहा था ।

वर्शाली का नाभी बहुत ही सुंदर थी। और उसकी उभरे बड़े बड़े वक्ष बहोत ही मननोहक थी। दौनो वर्शाली को दैखकर मंत्र मुग्ध हो गया था। तभी वर्शाली हैरानी से दौनो को दैखता है और कहती है----

>" ये आपलोग किसकी बात कर रहे हो। कही हर्शाली की तो नही। क्या वो मणी तुम्हारे पास है ? 


वर्शाली की बात से दौनो हैरान हो जाता है और सोचता है के आखीर ये कौन है जो बिल्कुल उसी परी की तरह दिखती है और ये मणी के बारे मे क्यो पूंछ रही है कही ये वही परी तो नही है। तभी दौनो मे से एक जो कुर्ता पजामा पहने था वर्शाली से कहता है---


>" तुम कौन हो और इस समय यहां क्या कर रही हो? और तुम किस मणी की बात कर रही हो ? 


वर्शाली को लेकर दौनो के मन मे बहुत सारे सवाल थे पर वर्शाली को दैखकर दौनो ने ही अपना आपा खो दिया था और दौनो ही वर्शाली के साथ संभोग करना चाहता था। वर्शाली दौनो की नियत को भांप लेती है। और बिना कूछ बोले ही वहां से भानपूर की और जाने लगती है। 


तभी तांत्रीक कहता है---

>" सुदंरी कहां जा रही हो तुम्हे दैखकर मेरा मन विचलित हो गया है। सूंदरी अब तुम मैरे पास आ जाओ और मैरे इस काम ईच्छा को सांत कर दो। 

तभी वर्शाली गुस्से से कहते है---

>" आप लोग कौन हो ? और इतनी रात्री को यहां मेरा पिछा क्यों कर रहे हो।


 तभी जो कुर्ता पजामा पहने था वर्शाली को कसके पकड़ लेता है जिससे वर्शाली घबरा जाती है। अपने आपको छुड़ाने की कोसिस करती है पर उस आदमी का पकड़ मजबूत होने के कारण वर्शाली अपने आपको नही छूड़ा पाती है। 


तब वर्शाली अपना मणि के शक्ती का प्रयोक करती है जिससे उस आदमी की चींख निकल आती है और वह दूर जाकर गिरता है। वर्शाली के शक्ति प्रहार से तांत्रीक घबरा जाता है। वह वर्शाली की शक्ति को दैखकर हैरान रह जाती है।

तांत्रीक सांतक मणी को दैखकर समझ जाता है के वर्शाली एक परी है। परी को दैखकर दौनो ही हैरान और डर जाता है। उन्हे बार बार एक ही बात परेसान कर रहा था के कहीं ये हर्षाली तो नही तांत्रीक अपने साथी को उठाते हूए कहता है। 


>" ये कैसे संभव है । ये पुनः जीवित कैसे हो सकती 
है। उस दिन तो ये मर चुकी थी । 


तभी दूसरा आदमी कहता है--


>" ये मत भूलो के ये परी है और इनके पास अपार 
शक्तियां होती है। और हमलोग तो इसे ही मृत समझकर ढुंढ रहे थे पर ये जीवित मिली तो अब क्या करें। इसे ऐसे ही जाने दे। 


तांत्रीक कहता है--


." नही ! इसे दैखकर मैरे काम वासना जागृत हो गई है। जो मैं पूरी करके ही रहूँगा। 


इतना बोलकर उस तांत्रीक ने अपने जेब से मुठ्ठी बंद करके कुछ निकालता है और मंत्र बड़बड़ाकर वर्षाली पर के उपर फैंक देता है--

"“ॐ ह्रीं क्लीं — मायाम्, मायाम् — वशं कुरु, वशं कुरु — स्वाहा।”


To be continue....671