Shrapit ek Prem Kahaani - 45 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 45

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 45

उस तांत्रीक ने अपने जेब से मुठ्ठी बंद करके कुछ निकालता है और मंत्र बड़बड़ाकर वर्षाली पर के उपर फैंक देता है--

"“ॐ ह्रीं क्लीं — मायाम्, मायाम् — वशं कुरु, वशं कुरु — स्वाहा।”

जिसे वर्शाली को कमजोरी महसूस होने लगती है। तांत्रीक वर्शाली को पकड़ने के जैसे ही आगे अपना कदम बड़ाती है के वर्शाली उस पर भी मणी से शक्ति प्रहार करती है जिसे तांत्रीक बेहोस हो जाता है। 


वर्शाली के आगे अब अंधेरा छा गया था और वो बेहोसी के हालत मे उसके कदम डगमगाने लगती है जिसका फायदा वो दुसरा आदमी उठाना चाहता है। वो आदमी वर्शाली को पकड़ लेता है और उसे जमीन पर लीटा देता है। वर्शाली बैहोसी की हालत मे कुछ कर नही पाती वो अब बहुत कमजोर महसूस कर रही थी। 
वर्शाली इतना कमजोर हो चुकी थी के वो अपने आपको बचा भी नही पा रही थी । वर्शाली सौचती है --


>" ये क्या हो रहा है मुझे , मैं हिल क्यो नही पा रही हूँ । उस ने ऐसा क्या कर दिया । जो मैं अपने आपको बचा भी नही पा रही हूँ । हे इश्वर सहायता किजिए । "


अब वो आदमी वर्शाली के उपर आ जाता है और एक टक नजर से वर्शाली की खूबसुरती को देखने लगता है। वर्शाली उस आदमी से कह रही थी --


>" मुझे छौड़ दो दुष्ट वरना इसका परिणाम बहोत भंयकर होगा। "

 पर वो कहां सुनने वाला था वो तो बस अपनी कामुकता को बस सांत करना चाहता था। वो अब अपना हाथ जैसे ही वर्शाली के वक्ष के वस्त्र पर जाता है। के तभी वहां एकांश आ जाता है। 


एकांश सर मे पट्टी बंधी थी जिसे दैखकर ऐसा लग रहा था के उसके सर पर गहरी चौट लगी थी। एकांश को दैखकर वो आदमी डर जाता है। एकांश इन सबसे अनजान होकर वहां पर लधु संका करने लगता है। उस आदमी ने वर्शाली के मुह को अपने हाथ से दबा कर रखा था। ताकि वर्शाली एकांश को आवाज ना लगा सके। 


एकांश लघु शंका करके वहां से जाने लगता है तब वर्शाली उस आदमी को धक्का देकर अपने उपर से गिरा देती है और एकांश को आवाज लगाते हूए कहती है--


>" कौई है मैरी सहायता किजीए । 


एकांश के कान तक ये आवाज चली जाती है । एकांश जल्दी से अपना कदम उस आवाज की और बड़ाता है। एकांश वहां पहुँच कर दैखता है के एक बहोत ही सुदंर कन्या बैहोसी की हालत मे जमीन पर गीरी पड़ी थी और उसके वक्ष अर्ध नग्न थे। एकांश झट से वर्शाली के पास जाता है और उसे होश मे लाने की कोसिस करता है।


 एकांश ने इतनी सुंदर लड़की आज से पहले कभी नही दैखा थी। कुछ दैर के एकांश भी वर्शाली सी खुबशुरती को एक टक नजरो से दैखने लगता है । 


फिर एकांश जैसे तैसे अपने आपतो संभालता है और वर्शाली को जमीन से उठा लेता है। वर्शाली एकांश की और दैखता है और कहती है--


>" मैरी सहायता किजिए ।


 एकांश कहता है --

>" पर किससे यहां तो कोई नही है। और तुम इतनी रात को यहां क्या कर रही हो। 


वर्शाली कहती है---


>" वो वो तांत्रीक और वो मनुष्य मैरे साथ संभोग करना चाहता है। मैरी रक्षा किजिए। 


एकांश कहता है--

>" तुम्हे डरने की जरूरत नही है। तुम अब सुरक्षीत हो ।


 एकांश दैखता है के वर्शाली के वक्ष से वस्त्र निचे हो 
गए थे । जिस कारण वर्शाली के सुंदर गौरे वक्ष एकांश के सामने अर्ध नग्न थी।

 एकांश पहली बार कीसी स्त्री के वक्ष दैख रहा था । वर्शाली की खुबशरती को दैखकर एकांश मदहोस हो जाता है। वर्शाली की खुबशरती को दैखकर एकांश की भी काम इच्छा जागृत हो जाती है।


 आज से पहले उसने किसी स्त्री को ऐसी अवस्था मे नही दैखा था। वर्शाली अपने वक्ष को ढकने की कोसिस करती है पर नही ढक पाती। वर्शाली समझ जाती है के एकांश भी उसे ही दैख रहा है ।

एकांश अपने काम इच्छा को काबु ने करके वर्शाली के वक्ष को ढक देता है। तभी एकांश को पीछे से तांत्रीक एक जोरका धक्का मारता है। जिससे निचे जमीन पर गिर जाता है। एकांश गुस्से से उठता है तो दैखता है के दौ आदमी अपना चैहरे को छुपाए खड़ा था। तभी उनमे से एक एकांश से कहता है---


>" चला जा यहां से वरना अपने जान से हाथ धौ बौठोगे। 


एकांश कहता है--


>" एक स्त्री के मन के विरूध्द तुम लोग उसके साथ गलत करना चाहते हो ? कैसे पुरूष हो तुम दौनो। छीः ! अब यहां से जाते हो या मार खाके ही मानोगे। 


एकांश के इतना कहने पर उन तीनो मे काफी दैर तक हातापाई होती है जिससे वे दौनो एकांश से बूरी तरह मार खाकर घायल हो जाता है। एकांश के बहुत कोशिस के बाद भी वो उन दोनो का चेहरा नही दैख पाता है। 


 लड़ाई में एकांश काफी घायल हो जाता है और फिर वो दोनो एकांश से मार खाकर डर से वहां से भाग जाता है। एकांश को भी काफी चोंटे आई थी और वो लंगड़ाती हुआ वर्शाली को ढुंढने लगता है पर एकांश को वहां पर वर्शाली कहीं नही दिखाई देती। 


वर्शाली एक झाड़ी के पिछे छुपी हुई थी वो डर से बाहर नही निकल पा रही थी वर्शाली एकांश को दैखकर हैरान हो जाती है के इसके जैसे मनुष्य भी है इस पृथ्वी पर जो दुसरे के प्राण बचाने के लिए अपने प्राण दांव पर लगा दे। पर फिर भी वर्शाली एकांश के पास जाने से डर रही थी क्यूंकी वर्शाली ने एकांश की काम ईच्छा को भांप लिया था ।


जब एकांश ने वर्शाली के वक्ष को देखा था। इसिलिए वर्शाली एकांश पर भरोसा नही कर पा रही थी। एकांश वर्शाली को बहोत ढुडता है पर वर्शाली कही नही मिलती तब एकांश लंगड़ाते लंगड़ाते वहां से चला जाता है।


वर्शाली की बात पर एकांश नाराज होकर कहता है--

>" वाह ! क्या बात है। मैं वहां तुम्हे बचाने के लिए गया था ना की तुम्हारे साथ वो सब करने । 


वर्शाली कहती है--


>" परतुं आपके मन मे ये ख्याल तो आया ना थी एकांश जी और एक भयभीत अकेली स्त्री और कर भी क्या सकती है। बस यहीं सौचकर मैं आपके सामने नही आ पाई परतुं उस दिन से मैं प्रत्येक दिन आपके आने का इंतजार कर रही थी।


 एकांश कहता है--


>" हां ये सच है के मैं तुम्हारे वो देखकर बहक गया था जो स्वाभाविक था पर इसका मतलब ये नही था के मैं भी उनके तरह तुम्हारा फायदा उठाउंगा । 


वर्शाली एकांश से पुछती है--

>" पर मुझे देखकर आपकी काम इच्छा क्यों जाग्रीत हो गई थी ये मुझे पता है और ये आपको क्यों आपको स्वाभाविक लगता है। 


एकांश मजा किया अंदाज मे कहता है--


>" अच्छा अब तुम्हें ये भी पता चल गया था। 


वर्शाली कहती है--!


>" हां एकांश जी आप घूर घूर कर मेरे वक्ष को ही देख रहे थे जो निवस्त्र थी। किसी भी स्त्री के निवस्त्र शरीर को केवल उसके वर ही देखते है एकांश जी। पर मेरे शरीर तो आपने देख लिया है। (वर्षाली अपने मन मे कहती है । पर मेने तो अब आपको अपना वर मान लिया हूँ एकांश जी।) 


वर्शाली की बात सुनकर एकांश चुप हो जाता है। और फिर कुछ दैर सैचकर कहता है--


>" वर्शाली मेने उस दिन जानबुझकर तुम्हारे (एकांश वक्ष जैसे शब्द को बोलने मे हिचकिचा रहा था।) वो उसे देखने की कोशिस नहीं किया था वो अपने आप तुम्हारे कपड़े मेरे सामने खुल गए थे तो वो मैने ...दैख लिया ।

 एकांश की बात सुनकर वर्शाली हल्की मुस्कान देकर कहती है---


>" हा हा हा हा । अच्छा तो आपके कहने का अर्थ ये है के मेरा वक्ष आपको देखकर स्वमं निवस्त्र हो गया और एकांश जी और आपने दैख लिया , क्यों आप अपना आंख बंद नही कर सकते थे ।

एकांश कुछ दैर चुप रहता है तो वर्शाली फिर कहती है --

>" आप कितना शर्माते हो।

 एकांश वर्शाली के बातों से शरमाने लगता है एकांश का गाल शरम से लाल हो गया था वर्शाली जैसी सुंदर परी से इस तरह से बात करने से एकांश बेकाबु होने लगता है एकांश अपवे हाथ मे मणि लिए बात को बदलते हूए कहता है--


>" वर्शाली ये तुम्हारी मणि । इसे लो रख लो ।


इतना बोलकर एकांश मणि को लेकर अपना हाथ वर्शाली की और बड़ाता है। वर्शाली समझजाती है के एकांश कामुक बातों से घबरा रहा था के कही एकांश की काम इच्छा फिरसे जाग ना जाए। 


वर्शाली कहती है ---


>" ये क्या एकांश जी आप नेे तो मणि को मुझे वापस लौटा रहे हो ? जबकी मैने ये मणि आपको दे दी थी। 


एकांश कहता है---


>" नहीं वर्षाली ये जानते हूए भी के इस मणि मे तुम्हारी सारी शक्ति हैं मे इसे नहीं ले सकता। तुम्हें तुम्हारी शक्तियों की जरुरत है ।

To be continue.....687