Velentine day, Ek Adhuri Suruaat - 1 in Hindi Love Stories by vikram kori books and stories PDF | वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 1

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वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 1

पार्ट - 1

‎सुहानी को भीड़ पसंद नहीं थी, लेकिन अकेलापन उससे भी ज़्यादा डराता था।
‎शहर की यह शाम भी कुछ वैसी ही थी—आधी भागदौड़ में डूबी हुई, आधी थकी हुई।
‎वह कैफ़े के कोने वाली कुर्सी पर बैठी थी। सामने मेज़ पर कॉफी का कप रखा था, जिसमें से उठती भाप जैसे उसकी उलझी हुई सोच को और गहरा कर रही थी। मोबाइल उसकी हथेली में था, लेकिन स्क्रीन देखे बिना ही वह उसे घुमाए जा रही थी।
‎ज़िंदगी बाहर से जितनी सुलझी हुई दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई होती है—
‎सुहानी इसका जीता-जागता उदाहरण थी।
‎उसी वक्त कैफ़े का दरवाज़ा खुला।
‎एक साधारण सा लड़का अंदर आया। न ज़्यादा तामझाम, न कोई दिखावा।
‎कंधे पर लैपटॉप बैग, कानों में ईयरफ़ोन, और आँखों में एक अजीब सी थकान।
‎हर्ष।
‎वह रोज़ यहाँ नहीं आता था। आज बस घर की दीवारें कुछ ज़्यादा ही भारी लग रही थीं।
‎वर्क फ्रॉम होम का मतलब आराम नहीं होता—कभी-कभी इसका मतलब होता है, दिन और रात का फर्क मिट जाना।
‎उसने काउंटर से कॉफी ऑर्डर की और इधर-उधर नज़र दौड़ाई।
‎कैफ़े लगभग भरा हुआ था।
‎बस एक कुर्सी खाली थी—सुहानी के सामने।
‎हर्ष ने हल्की झिझक के साथ पूछा,
‎“एक्सक्यूज़ मी… क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
‎सुहानी ने सिर उठाकर देखा।
‎पहली नज़र में कुछ भी खास नहीं लगा।
‎लेकिन दूसरी नज़र…
‎दूसरी नज़र में एक अजीब सी सादगी थी, जो दिखावा नहीं करती।
‎उसने हल्के से सिर हिला दिया।
‎हर्ष बैठ गया।
‎दोनों के बीच कुछ पल की ख़ामोशी थी—वही ख़ामोशी जो अजनबियों के बीच होती है।
‎कॉफी आई।
‎हर्ष ने कप उठाया, लेकिन शायद उसका ध्यान कहीं और था।
‎हल्का सा धक्का लगा और कॉफी का थोड़ा सा हिस्सा मेज़ पर फैल गया।
‎“ओह! सॉरी…”
‎वह तुरंत बोला।
‎सुहानी ने बिना ज़्यादा कुछ कहे नैपकिन बढ़ा दिया।
‎“कोई बात नहीं।”
‎उसकी आवाज़ में न गर्मजोशी थी, न बेरुख़ी—बस एक ठहराव।
‎हर्ष ने पहली बार ध्यान से उसकी ओर देखा।
‎साधारण कपड़े, खुले बाल, और आँखों में कोई कहानी छुपी हुई।
‎“आप यहाँ अक्सर आती हैं?”
‎सवाल अपने आप निकल गया।
‎सुहानी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
‎“नहीं… जब ज़्यादा सोचने लगती हूँ, तब।”
‎हर्ष हल्का सा हँसा।
‎“तो फिर हम एक ही वजह से यहाँ हैं।”
‎सुहानी ने हैरानी से देखा।
‎“आप भी?”
‎“हाँ,”
‎उसने कहा,
‎“कोड की लाइनों से थोड़ा ब्रेक लेने।”
‎सुहानी ने अंदाज़ा लगाया।
‎“सॉफ्टवेयर इंजीनियर?”
‎हर्ष ने सिर हिलाया,
‎“जी,”
‎“वर्क फ्रॉम होम। और आप?”
‎“कभी-कभी लगता है, मैं भी वर्क फ्रॉम माइंड करती हूँ।”
‎सुहानी ने हल्के व्यंग्य के साथ कहा।
‎पहली बार दोनों हँसे।
‎वह हँसी छोटी थी, लेकिन अजीब तरह से सुकून देने वाली।
‎कुछ मिनटों तक इधर-उधर की बातें होती रहीं—मौसम, कैफ़े की कॉफी, शहर की भीड़।
‎कोई निजी सवाल नहीं, कोई दख़ल नहीं।
‎फिर सुहानी का फोन वाइब्रेट हुआ।
‎उसकी मुस्कान गायब हो गई।
‎आँखों में कुछ बदल गया—जैसे कोई पुरानी याद अचानक जाग गई हो।
‎हर्ष ने नोटिस किया, लेकिन कुछ कहा नहीं।
‎सुहानी ने फोन पलटकर मेज़ पर रख दिया,
‎जैसे उससे दूर भागना चाहती हो।
‎“सब ठीक है?”
‎हर्ष ने धीरे से पूछा।
‎सुहानी ने सिर हिला दिया।
‎“हाँ… बस एक पुरानी आदत है, जो पीछा नहीं छोड़ती।”
‎हर्ष समझ गया—या शायद समझना चाहता था।
‎कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिन्हें वहीं छोड़ देना बेहतर होता है।
‎कुछ देर बाद सुहानी उठी।
‎“मुझे जाना होगा।”
‎हर्ष भी खड़ा हो गया।
‎“आपसे मिलकर अच्छा लगा।”
‎“हम्म…”
‎वह रुकी, फिर बोली,
‎“मुझे भी।”
‎एक पल की झिझक।
‎फिर हर्ष ने कहा,
‎“अगर… फिर कभी?”
‎सुहानी ने उसकी ओर देखा।
‎उस नज़र में डर भी था, और जिज्ञासा भी।
‎“शायद,”
‎उसने कहा,
‎“अगर किस्मत चाहे।”
‎और वह चली गई।
‎हर्ष वहीं खड़ा रह गया।
‎कैफ़े फिर से शोर से भर गया, लेकिन उसके अंदर कुछ अजीब सा शांत था।
‎उसने मेज़ पर देखा।
‎सुहानी अपना मोबाइल चार्जर भूल गई थी।
‎हर्ष ने उसे उठाया।
‎एक छोटी सी चीज़—लेकिन अचानक बहुत बड़ी लगने लगी।
‎उसने दरवाज़े की ओर देखा,
‎पर सुहानी जा चुकी थी।
‎हर्ष ने चार्जर अपने बैग में रखा और मन ही मन सोचा—
‎शायद किस्मत ने “फिर कभी” का रास्ता खुद ही बना दिया है।
‎हर्ष को नहीं पता था कि
‎जिस लड़की का चार्जर आज उसके बैग में है,
‎वह लड़की जल्द ही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी उलझन बनने वाली है…
‎और सुहानी को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था
‎कि वह आज सिर्फ़ अपना चार्जर नहीं,
‎बल्कि अपने दिल का एक छोटा सा हिस्सा भी पीछे छोड़ आई है।
‎ आगे की कहानी जानने के लिए next पार्ट का इंतजार करे जल्दी नेक्स्ट पार्ट आयेगा । 
‎BY.............Vikram kori ...................