शीर्षक: "हम फिर भी मिलेंगे"
एक अधूरी मुलाक़ात से शुरू हुई पूरी ज़िंदगी की कहानी
बरसात की वह शाम अजीब थी। आसमान जैसे रोना चाहता था, और शहर जैसे जल्दी घर लौट जाना चाहता था। स्टेशन की भीड़ में हर कोई भाग रहा था—सिवाय दो लोगों के।
अनया प्लेटफ़ॉर्म नंबर पाँच पर खड़ी थी, हाथ में टिकट और दिल में अनगिनत सवाल। उसने तय कर लिया था कि आज के बाद वह इस शहर में वापस नहीं आएगी। यह शहर उसके सपनों से ज़्यादा उसकी नाकामियों को जानता था। हर गली में कोई अधूरी याद थी, हर मोड़ पर कोई टूटा हुआ वादा।
वह ट्रेन का इंतज़ार कर रही थी, पर सच तो यह था कि वह किसी चमत्कार का इंतज़ार कर रही थी।
उसी समय उसकी कॉफी किसी से टकराकर गिर गई।
“ओह! सॉरी… मेरी गलती है,” एक लड़के की आवाज़ आई।
वह मुड़ी। सामने एक अजनबी था। भीगे बाल, हल्की दाढ़ी, आँखों में अजीब-सी ईमानदारी।
“कोई बात नहीं,” अनया ने थके हुए लहजे में कहा।
“कम से कम नई कॉफी तो लेने दीजिए। आख़िरी ट्रेन से पहले एक अच्छी कॉफी मिल जाए, तो विदाई थोड़ी आसान हो जाती है।”
“आपको कैसे पता कि मैं जा रही हूँ?”
वह मुस्कुराया, “जो लोग स्टेशन पर ऐसे खड़े रहते हैं, वे या तो किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं… या किसी से भाग रहे होते हैं।”
अनया पहली बार हँसी। कई दिनों बाद।
“और आप?”
“मैं? मैं भागते-भागते थक गया हूँ। अब शायद रुकना चाहता हूँ।”
उसका नाम आरव था।
कॉफी के दो कपों के बीच अजनबियों की बातचीत शुरू हुई, जो धीरे-धीरे अजनबीपन भूलती चली गई। उन्होंने मौसम पर बात की, फिर शहर पर, फिर सपनों पर… और फिर उन चीज़ों पर जिनके बारे में हम आमतौर पर किसी को नहीं बताते।
अनया ने बताया कि वह लेखिका बनना चाहती थी, लेकिन हर प्रकाशक ने उसकी कहानियाँ लौटा दीं।
आरव ने बताया कि वह डॉक्टर है, पर खुद की ज़िंदगी को ठीक नहीं कर पा रहा।
“हम दोनों फेल हैं,” अनया ने कहा।
“नहीं,” आरव बोला, “हम दोनों अभी ‘रास्ते में’ हैं।”
वह वाक्य उसके दिल में कहीं गहरा उतर गया।
ट्रेन लेट हो गई।
फिर और लेट।
फिर अनाउंसमेंट आया—“तीन घंटे की देरी।”
कभी-कभी किस्मत भी कहानी लिखना चाहती है।
तीन घंटे में दो लोग दोस्त बन गए।
दोस्तों से ज़्यादा।
कुछ ऐसा, जिसका नाम देना जल्दी था।
उन्होंने स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठकर बारिश देखी। आरव ने कहा, “अगर आज तुम चली गई, तो शायद हम कभी नहीं मिलेंगे।”
“तो?”
“तो मुझे अफ़सोस रहेगा कि मैंने तुम्हें दोबारा मिलने के लिए नहीं कहा।”
“और अगर मैं रुक गई?”
“तो शायद तुम्हारी कहानी यहीं से शुरू हो।”
उस रात अनया ट्रेन में नहीं चढ़ी।
वह पहली बार किसी अजनबी के लिए नहीं… खुद के लिए रुकी।
दिन महीनों में बदल गए।
कॉफी डेट्स लाइब्रेरी डेट्स बन गईं।
मजाक धीरे-धीरे इज़हार में बदल गया।
आरव हर सुबह उसे मैसेज करता—
“आज क्या लिखोगी?”
और वह जवाब देती—
“तुम्हारे बारे में नहीं।”
पर हर कहानी में वही होता।
लेकिन जिंदगी सिर्फ रोमांस नहीं होती।
आरव को दूसरे शहर में नौकरी मिल गई।
“बस एक साल,” उसने कहा, “फिर वापस आ जाऊँगा।”
लॉन्ग डिस्टेंस।
वीडियो कॉल्स।
मिस्ड कॉल्स।
गलतफहमियाँ।
छोटी-छोटी लड़ाइयाँ।
और वही पुराना डर—
“क्या हम टिक पाएँगे?”
एक रात बहस इतनी बढ़ी कि दोनों चुप हो गए।
कोई “आई लव यू” नहीं।
कोई “गुड नाइट” नहीं।
बस सन्नाटा।
तीन महीने बात नहीं हुई।
अनया ने अपनी पहली किताब लिखी।
नाम रखा—
“हम फिर भी मिलेंगे।”
हर पन्ने में उसकी याद थी।
हर लाइन में उसका इंतज़ार।
बुक लॉन्च वाले दिन भीड़ में उसने उसे देखा।
वही मुस्कान।
वही आँखें।
थोड़ा थका हुआ।
थोड़ा पछताया हुआ।
“मैं वापस आ गया,” उसने धीरे से कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि कुछ लोग शहर से नहीं… दिल से जुड़े होते हैं। और तुमसे दूर रहना… इलाज से बाहर की बीमारी थी।”
अनया हँसी और रो पड़ी एक साथ।
“तुम बहुत ड्रामेबाज़ हो,” उसने कहा।
“और तुम मेरी सबसे अच्छी कहानी।”
बारिश फिर हो रही थी।
उसी स्टेशन के पास।
जहाँ सब शुरू हुआ था।
इस बार कोई ट्रेन नहीं छूटी।
कोई विदाई नहीं हुई।
सिर्फ दो लोग थे…
जो समझ चुके थे—
प्यार परफेक्ट नहीं होता,
पर सही इंसान के साथ
हर अधूरापन भी खूबसूरत लगता है।
समाप्त।
बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हवा में अब भी ठंडक थी। अनया ने आरव का हाथ पकड़ा और मुस्कुराई। कभी-कभी ज़िंदगी हमें सही इंसान देर से देती है, पर बिल्कुल सही समय पर। उस दिन अगर वह ट्रेन पकड़ लेती, तो शायद यह कहानी कभी शुरू ही नहीं होती। अब उसे समझ आ गया था — कुछ लोग किस्मत नहीं, घर होते हैं।
शायद आपकी ज़िंदगी में भी कोई ऐसा इंसान हो… जिसे सोचकर आज भी दिल मुस्कुरा देता है।
अगर इस कहानी ने आपको किसी की याद दिलाई, तो इसे दिल से महसूस कीजिए… और बताइए — आपकी कहानी कौन-सी है?
क्योंकि हो सकता है… अगली कहानी आपकी हो।