मटन बिरयानी की खुशबू अब भी हवा में तैर रही थी। मंत्री जगनमोहन दयाल ने उँगलियाँ धोते हुए तसल्ली से कहा,
“जानकी भाभी—आपके घर जैसी बिरयानी पूरे प्रदेश में कहीं नहीं मिलेगी।”
जानकी देवी पल्लू सही करती हुई बोलीं,
“निर्मला दीदी और बच्चों के लिए एक डब्बा पैक करवा रही हूँ।”
मंत्री दयाल हँसे। “नहीं भाभी, जो बात ताज़ा खाने में है वो अलग ही होती है। उन्हें लेकर ही आऊँगा, यहीं खिलाने।”
“जी, बिल्कुल,” जानकी देवी ने कहा। “आपका ही घर है।”
ठाकुर धुरंधर सिंह मुस्कराए।
“आइए, गोष्ठी में चलते हैं।”
दोनों के बीच वही पुरानी अपनायत थी—सत्ता की, सौदों की और साझा चुप्पियों की।
अंदर गोष्ठी में आवाज़ें धीमी थीं। मंत्री जी ने गिलास से महँगी व्हिस्की का एक सिप लिया और बोले,
“ठाकुर साहब, एक वीडियो भेजा था आपको।”
ठाकुर साहब मुस्कुराये।
“अरे मंत्री जी, मेरा सेलफोन तो जाने कहाँ पड़ा रहता है। इतनी बड़ी हवेली है—कभी इधर, कभी उधर।”
उन्होंने आवाज़ दी,
“हीरा बेटे, मेरा फोन ढूँढ कर ला, जल्दी।”
“जी ठाकुर साहब,” बाहर से आवाज़ आई।
मंत्री जी ने जेब से फोन निकालते हुए कहा,
“मैं अपने फोन में दिखा देता, पर बैटरी लो है।”
ठाकुर साहब हँस पड़े। वह जानते थे—मंत्री जी अपना फोन किसी के हाथ में नहीं देते। पर अब मंत्री जी बार-बार घड़ी देख रहे थे।
उसी पल ठाकुर साहब को याद आया—सौम्या का फोन। वही, जो उनकी जेब में था।
उन्होंने सहजता से कहा, “इस पर भेज दीजिए, मंत्री जी।”
मंत्री जी ने भौंहें उठाईं, “ब्लूटूथ कर देता हूँ।”
ट्रांसफर शुरू हुआ।
“आप तो बड़े टेक्निकल हैं,” ठाकुर साहब ने मज़ाक किया।
“जनता की सेवा के लिए सीखना पड़ता है, साहब,” मंत्री जी बोले। “बेटा जर्मनी में इंजीनियर है। उसी ने थोड़ा-बहुत सिखा दिया।”
सौम्या के फोन की स्क्रीन चमकी। ठाकुर साहब ने क्लिक किया।
वीडियो चल पड़ा—और उनके चेहरे से मुस्कराहट जैसे किसी ने छीन ली।
जंगल के किनारे की एक कंस्ट्रक्शन साइट थी। अधूरा बाँध। मिट्टी में धँसी मशीनें। मज़दूरों और सिक्योरिटी गार्ड्स की लाशें बिखरी पड़ी थीं—तलवारों से कटे-फटे शव।
फिर कैमरा हिला।
अंत में एक नकाबपोश सामने आया। तीखी आँखें।
“मैं डाकू जख्खड़,” आवाज़ सपाट थी। “इन अमीर ज़मींदारों का भक्षक और ग़रीब किसानों का रक्षक।”
पीछे जंगल खड़ा था—गवाह की तरह।
“अगर कोई बड़ा ज़मींदार आपको परेशान कर रहा है, तो हमारी वेबसाइट पर हमें संपर्क करें।”
वीडियो ख़त्म हो गया।
ठाकुर साहब ने फोन बंद किया और बिना कुछ कहे जेब में रख लिया। चेहरे पर चिंता थी।
मंत्री जी ने पास रखा व्हिस्की का गिलास उठाया और एक ही घूँट में खाली कर दिया।
“हमसे ज़्यादा टेक्निकल तो ये चोर डकैत हो गए हैं,” उन्होंने खीज से कहा। “वेबसाइट, ईमेल… सब खोलकर बैठे हैं। पेशा वही— खून और फिरौती।”
एक पल रुककर बोले,
“छह पुलिस हवलदार और चौबीस मज़दूर काट दिए इस हरामखोर जख्खड़ ने। तीसरी बार इस बाँध का काम रुका है। ऐसी मौतों के बाद कौन मज़दूर काम करने आएगा?”
उन्होंने गिलास रख दिया। “कुछ कीजिए, ठाकुर साहब। इस जख्खड़ डाकू का।”
ठाकुर साहब ने मेज़ पर रखा सुनहरा चपटा बक्सा खोला और एक महँगा सिगार निकाला। सलीके से काटा।
“मंत्री जी,” उन्होंने ठहरकर कहा, “हमारे होने वाले दामाद—करण प्रताप सिंह—अमेरिका से जियोलॉजी की डिग्री लेकर लौटे हैं।”
सिगार सुलगाया।
“बहुत प्रतिभाशाली युवक हैं। अगर उन्हें बाँध की देख-रेख में भागीदार बनाया जाए, तो बढ़िया काम करवा देंगे।”
मंत्री जी दाँत दिखाकर हँसे।
“वाह! इलाक़ा आपका, पुलिस आपकी, प्रजा आपकी मर रही है—और आप उस पर भी मलाई खाने की सोच रहे हैं?”
फिर गंभीर हो गए।
“चलिए। करण बाबू को कंस्ट्रक्शन कंपनी में बड़ी पोस्ट दिलवा देंगे। और उनके नाम पाँच प्रतिशत शेयर भी।”
ठाकुर साहब मुस्कराए।
“बस समझिए—डाकू जख्खड़ का काम ख़त्म।”
मंत्री जी उठे और जल्दी में बाहर निकले। हल्की-सी साँस में “हरामख़ोर” बुदबुदाते हुए।
ठाकुर साहब मस्ती में सिगार का कश लेते बाहर आए।
तभी हीरा हाँफता हुआ फोन लिए दौड़ता आया।
“ठाकुर साब—”
“हीरा बेटे, बड़ी जल्दी आ गया तू,” ठाकुर साहब बोले।
कुछ बरामदे पार किए ही थे कि आगे सौम्या और रश्मि खड़ी दिखीं। रश्मि ने आँखों से इशारा किया।
सौम्या आगे बढ़ी और अचानक ठाकुर साहब के पैरों में गिर गई।
“I am sorry, पापा।”
ठाकुर साहब पिघल गए। उन्होंने उसे उठाकर गले से लगा लिया।
“ग़ुस्से में हमारा भी हाथ उठ गया फूल-सी बच्ची पर,” उन्होंने कहा और उसके सिर पर हाथ फेरा। “तेरे भविष्य की ही सोचता हूँ, पगली।”
सौम्या की आवाज़ बहुत धीमी थी।
“I know, पापा।”
वह मुड़कर जाने लगी।
“ले,” ठाकुर साहब ने कहा। “अपना फोन ले जा।”
सौम्या खुशी-खुशी मुड़ी।
ठाकुर साहब ने फोन थमाते हुए आख़िरी बात कही,
“याद है न—घर की बात घर के अंदर।”
सौम्या ने सिर हिलाया।
“जी, पापा।”
ठाकुर साहब ने सिगार का एक लंबा कश लिया।
धुआँ हवेली की रोशनी में घुलता चला गया।