शादी में पाँच दिन बाकी थे।
सौम्या का फोन अचानक कंपन करता है। वह चौंकती है। स्क्रीन पर करण का नाम चमकता है। एक वीडियो फ़ाइल—ऊपर अंग्रेज़ी में लिखा है: तुम और मैं।
वह एक पल हिचकती है, फिर उँगली फिसल जाती है।
फ़ाइल खुलते ही एक अश्लील वीडियो सामने आ जाता है—देहों का कंपन, बेहूदगी। उसकी साँस अटक जाती है। वह झटके से फोन एक ओर फेंक देती है।
कुछ सेकंड बाद स्क्रीन काली हो जाती है।
Disappearing message.
वीडियो अपने आप मिट चुका है।
सौम्या के कानों में करण के शब्द गूँजते हैं—“हर रात। हर रात।”
वह सिकुड़कर पलंग के कोने में बैठ जाती है। दोनों हाथ घुटनों पर टिके हैं। कंधे काँप रहे हैं। वह रोती है—बिना आवाज़ के, जैसे रोना भी किसी नियम के ख़िलाफ़ हो।
दरवाज़ा हल्के से खुलता है।
रश्मि भाभी भीतर आती है। “क्या हुआ?” वह पूछती है, पर जवाब का इंतज़ार नहीं करती। सौम्या के पास बैठ जाती है।
“सौम्या… ये मर्द,” रश्मि धीमे स्वर में कहती है, “सब साले ऐसे ही होते हैं। तेरे राजीव भैया भी कम नहीं हैं।”
सौम्या सिर उठाती है। उसकी आँखें लाल हैं।
“देह मेरी है,” रश्मि आगे बोलती है, शब्द चुनते हुए, “पर वो अपने ही मन की करते हैं।” वह रुकती है। “मेरे पीरियड्स के दौरान तो मुझे—”
वाक्य अधूरा रह जाता है।
एक पल की ख़ामोशी।
“बाद में बाथरूम में छिपकर उल्टियाँ करती हूँ,” रश्मि कहती है। “किसी से कुछ कह नहीं सकती। और अगर विरोध करूँ तो…”
वह चुप हो जाती है। फिर अपने ब्लाउज़ का कोना और ब्रा की स्ट्रैप ज़रा-सा उठाती है।
कंधे पर लाल निशान है—ताज़ा।
वह तुरंत कपड़ा ठीक कर लेती है। जैसे कुछ दिखा ही न हो।
बाहर से जानकी देवी की आवाज़ आती है, “रश्मि!”
“जी, माँजी,” रश्मि जल्दी से कहती है। वह उठती है, सौम्या की तरफ़ एक नज़र डालती है—नज़र जिसमें सहारा नहीं, बस साझा चुप्पी है—और बाहर दौड़ जाती है।
कमरे में फिर वही सन्नाटा।
फर्श पर पड़ा फोन बुझा हुआ है।
–
अगली सुबह ग्यारह बजे।
धूप तेज़ थी। बाँध की साइट पर हलचल थी—इंजीनियर, अफ़सर, गाड़ियाँ, और हँसी-मज़ाक।
ठाकुर धुरंधर सिंह आगे-आगे चल रहे थे। उनके साथ करण था—साफ़ सूट, आँखों में आत्मविश्वास। बगल में करण के ताऊजी, पशुपति बाबू—सफेद धोती-कुर्ता, कंधे पर डिज़ाइनर शॉल, मोटी सफ़ेद मूँछें और पीछे को सँवारे बाल। राजनीति की वही पुरानी ठसक, जो जगह को अपनी बना लेती है।
“काम बढ़िया चल रहा है,” पशुपति बाबू बोले।
“रुकावटें तो आती रहती हैं,” ठाकुर साहब हँसे। “अब सब ठीक हो जाएगा।”
दूर, झाड़ियों में—जख्खड़ दूरबीन लगाए बैठा था। उसके साथ एक स्नाइपर तैनात था, लंबी राइफल कंधे पर।
“भैया जी,” स्नाइपर फुसफुसाया, “किसे गिराना है?”
जख्खड़ ने दूरबीन से लाल गाड़ी को साधा। “गिराना नहीं,” उसने शांत स्वर में कहा, “डराना है। वो देख—लाल गाड़ी। उसकी टंकी।”
“जो हुक्म, भैया जी।”
नीचे, बातचीत पूरी हो चुकी थी। लोग हाथ मिलाने लगे। करण और पशुपति बाबू अपनी महँगी लाल मर्सिडीज़ की तरफ़ बढ़े। ठाकुर साहब उन्हें छोड़ने आए।
ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला।
अगले ही पल—सीं की एक तीखी सनसनाहट।
गोली सीधी टंकी में लगी।
एक सेकंड भी नहीं लगा। आग फूटी—और फिर धमाका। लाल गाड़ी झटके से उछली। पास खड़ा ड्राइवर वहीं चिथड़ों में बदल गया। धूल, मिट्टी और काला धुआँ हवा में भर गया।
पशुपति बाबू, करण और ठाकुर साहब सूखे पत्तों की तरह पीछे उछले। ज़मीन पर गिरे—काले सूट और सफ़ेद कपड़े धूल-सूट से लथपथ।
आस-पास खड़ी गाड़ियों के काँच फटने लगे। हॉर्न अपने आप बज उठे। चीख-पुकार फैल गई।
ठाकुर और करण के आदमी झाड़ियों की तरफ़ अंधाधुंध फायर करने लगे। अफ़रातफ़री मच गई। बॉडीगार्ड्स ने तीनों को घेर लिया, घसीटते हुए एक दूसरी गाड़ी तक लाए और बैठा दिया।
पशुपति बाबू गुस्से से दहाड़ रहे थे, “इस हरामज़ादे जख्खड़ का कुछ कीजिए, ठाकुर साहब! आपका ही पाला हुआ कुत्ता हम सबको काट रहा है।” उन्होंने उँगली हिलाई। “जब तक इसकी लाश नहीं गिरेगी, आपकी बेटी की डोली नहीं उठेगी।”
गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गई।
ठाकुर धुरंधर सिंह की आँखें आग उगल रही थीं। जबड़ा भींचा हुआ था।
आज धमकी नहीं—चुनौती मिली थी।
दूर, झाड़ियों में जख्खड़ ने दूरबीन नीचे रखी। धुआँ अभी उठ रहा था।
“बस,” उसने कहा। “आज के लिए काफ़ी है।”
हवा में डर फैल चुका था।