Zindagi Ke Rang Hazar - 19 in Hindi Anything by Kishanlal Sharma books and stories PDF | जिंदगी के रंग हजार - 19

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जिंदगी के रंग हजार - 19

कुछ बाते पहले स्कूल के दिनों की

बहुत से लोग होते है जिन्हें स्कूल की बाते याद रहती है।मुझे याद है लेकिन कम

मेरी स्कूल की पढ़ाई टुकड़ो मे हुई पिता रेल में नौकर थे और उनके ट्रांसफर होते रहते थे।मेरी तीसरी क्लास तक कि पढ़ाई गुजरात मे हुई।चौथी क्लास बांदीकुई।पांचवी अछनेरा।छ व सात बांदीकुई।आठ व नो अजमेर।दसवीं ब्यावर।11 वी आबूरोड में।

दसवीं क्लास में उस स्कूल में को एडुकेशन थी।कई लड़कियों के साथ पढ़ने का अवसर मिला लेकिन नाम अब मुझे एक का भी याद नही है।ह हायर सेकेंडरी में आबूरोड में आ गया।पिताजी का ट्रांसफर ब्यावर से आबूरोड हो गया था।कई लड़कियां  साथ पढ़ती थी।माया,चंदा, मिथिलेश आदि।लेकिन चर्चित माया ही थी।मेरी कभी उससे बात नही हुई।अगर यह कहूँ की मैने  कभी किसी लडक़ी से बात नही की तो यह गलत नही होगा।शायद मन मे आया हो पर बात नही कर पाया जबकि कहानी में मैने जरूर बात की है।

उन दिनों ही मुझे साहित्य पढ़ने का शौक भी लगा। उन दिनों दिल्ली प्रेस के अलावा साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग,अरुण,साथी, चंदा मामा पत्रिका भी खूब चलती थी। इनके साथ मे उपन्यास भी पढ़ने लगा। उन दिनों पिताजी की पोस्टिंग आबू रोड मे थी। पहले आर पी एफ ऑफिस स्टेशन के बाहर था और उससे कुछ दूर रेलवे स्कूल था।

उन दिनों आबू कोई बड़ा नहीं था। रेलवे कॉलोनी एक तरफ थी और बाजार स्टेशन की तरफ। स्कूल भी उधर ही था। स्कूल हमें स्टेशन पर होकर जाना पड़ता था। आबूरोड से अंबाजी का मंदिर दूर नहीं था। अंबाजी जाने के लिए आबूरोड से बस, जीप जाती थी। निजी वाहन भी मिल जाते थे।

माउंट आबू सिर्फ एक हिल स्टेशन ही नहीं हे, यहां पर देलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर है, ब्रह्मा कुमारी का भी यहां केंद्र है, और सूर्यास्त का भी बिंदु हे। यहां जाने के लिए भी ट्रेन से आबूरोड तक आना पड़ता है।

मैने आबू के रेलवे स्कूल से हायर सेकंडरी पास की। फिर कॉलेज की पढ़ाई के लिए फालना और सिरोही में एडमिशन लेने को गया लेकिन फिर जोधपुर यूनिवर्सिटी में बी एस सी में एडमिशन लिया और हाई कोर्ट रोड पर मुरलीधर जोशी भवन में कमरा किराए पर लेकर रहा। उस समय जोधपुर यूनिवर्सिटी को बने ज्यादा समय नहीं हुआ था।कमला नेहरू जो लड़कियों के लिए था अलग था। और सब फैकल्टी अलग थी। मुरलीधर जोशी भवन में कमरे बने हुए थे जिसमें लड़के रहते थे। अभी कुछ नाम याद है। नागौर का शिव चंद जोशी और राम प्रकाश और मकराना का असलम था।

उन दिनों जमाना सस्ता था। आय भी लोगो की कम थी। उस समय जोधपुर की मावे की कचौड़ी मशहूर थी, जो तीस पैसे की आया करती थी। प्याज की कचौड़ी उन दिनों केवल शनिवार को ही बनती थी।

आबूरोड से जोधपुर के लिए सीधी गाड़ी नहीं थी। मारवाड़ से ट्रेन बदलनी पड़ती थी। मारवाड़ से जोधपुर के बीच में लूनी जंकशन पड़ता है। उस समय यहां के सफेद रसगुल्ले बहुत मशहूर थे।

जोधपुर में नीचे बाजार था। जोधपुर में पढ़ाई के दौरान के कुछ किस्से बताना जरूरी हे। हमे इंग्लिश अमर सिंह पढ़ाते थे। जैसे आप तारक मेहता में पोपट को देखते है, वैसे ही वह छाता रखते थे।