Sadiyo se Tum Meri - 1 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | सदियों से तुम मेरी - 1

Featured Books
Categories
Share

सदियों से तुम मेरी - 1

घने जंगल के बीचोंबीच फैली वह प्राचीन गुफा आज भी रहस्यों से भरी थी। चट्टानों से रिसता पानी सदियों पुरानी कहानियों का साक्षी था। उसी गुफा की गहराइयों में, जहाँ सूर्य की किरणें भी प्रवेश करने से डरती थीं, नागलोक का राजमहल स्थित था। उस महल के सिंहासन पर बैठा था नागों का सम्राट — नागार्जुन।
नागार्जुन की आँखों में एक अजीब सी खालीपन थी। उसका व्यक्तित्व आज भी उतना ही शक्तिशाली था जितना वर्षों पहले था, पर उसके भीतर का मन जैसे समय में कहीं ठहर गया था। नागलोक के सभी नाग उसकी शक्ति और न्यायप्रियता की प्रशंसा करते थे, लेकिन कोई भी उसके दिल में छिपे उस दर्द को नहीं समझ पाया था जो पिछले कई वर्षों से उसे भीतर ही भीतर खा रहा था।
कई साल पहले, नागार्जुन की जिंदगी में धरा आई थी। धरा एक नाग कन्या थी, जिसकी मुस्कान में जैसे वसंत की कोमलता बसती थी। वह चंचल थी, पर उतनी ही गंभीर भी। नागलोक में सभी जानते थे कि धरा के सौ वर्ष पूरे होने वाले थे, और उसके बाद वह एक इच्छाधारी नागिन बनने वाली थी। वह दिन नागलोक के लिए उत्सव का दिन होने वाला था।
धरा और नागार्जुन का प्रेम नागलोक में किसी कथा से कम नहीं था। दोनों घंटों झील के किनारे बैठकर भविष्य के सपने देखते थे। धरा अक्सर कहती थी कि वह अपने नाग रूप के साथ-साथ मानव लोक को भी समझना चाहती है। नागार्जुन उसकी हर इच्छा पूरी करने का वचन देता था। उसे लगता था कि समय ने उन्हें एक-दूसरे के लिए ही बनाया है।
लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।
धरा के सौवें वर्ष से ठीक एक रात पहले नागलोक में अचानक एक भयावह घटना हुई। नागलोक की सीमा पर एक रहस्यमयी ऊर्जा का विस्फोट हुआ। पूरा लोक कांप उठा। नागार्जुन तुरंत वहां पहुँचा, लेकिन जब तक वह धरा तक पहुँच पाता, सब कुछ खत्म हो चुका था। धरा निर्जीव पड़ी थी, और उसके शरीर से निकलती ऊर्जा धीरे-धीरे विलीन हो रही थी।
नागार्जुन ने पूरी शक्ति लगाकर धरा को बचाने की कोशिश की, लेकिन उसका हर प्रयास असफल रहा। उस रात नागलोक में पहली बार नागार्जुन की गर्जना दर्द में बदली थी। सबसे भयावह बात यह थी कि धरा की मृत्यु का कारण कोई समझ नहीं पाया। कोई घाव नहीं, कोई जहर नहीं, कोई शत्रु का निशान नहीं — बस रहस्यमयी ऊर्जा और मौत।
उस घटना के बाद नागार्जुन ने खुद को दुनिया से लगभग अलग कर लिया। उसने वर्षों तक नागलोक और मानव लोक में धरा की मृत्यु का रहस्य खोजने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसे खाली हाथ लौटना पड़ा। धीरे-धीरे समय बीतता गया, लेकिन नागार्जुन के लिए समय वहीं रुक गया था।
एक रात, जब पूर्णिमा का चाँद आकाश में चमक रहा था, नागार्जुन ध्यान में बैठा था। तभी अचानक उसके चारों ओर ऊर्जा का एक विचित्र कंपन फैल गया। उसकी आँखों के सामने धरा की आकृति उभरने लगी। वह आवाज बहुत हल्की थी, पर स्पष्ट थी।
धरा की आत्मा ने उसे संकेत दिया कि उसका पुनर्जन्म हो चुका है।
नागार्जुन ने तुरंत अपनी दिव्य दृष्टि का उपयोग किया। उसकी आँखों के सामने कई दृश्य तेजी से गुजरने लगे। अंततः उसे एक शहर दिखाई दिया — मानव लोक का एक आधुनिक नगर। वहाँ एक युवती थी, जिसकी आँखों में वही चमक थी, वही मासूमियत थी। उसका नाम अब धरा नहीं था। वह अब दिव्या के नाम से जानी जाती थी।
दिव्या एक सामान्य लड़की की तरह जीवन जी रही थी। वह अपने माता-पिता के साथ रहती थी और एक कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। उसे अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ भी याद नहीं था। लेकिन बचपन से ही उसे साँपों के सपने आते थे। उसे पानी के किनारे बैठना अच्छा लगता था, और कई बार उसे ऐसा महसूस होता था कि कोई अदृश्य शक्ति उसकी रक्षा कर रही है।
नागार्जुन समझ चुका था कि धरा लौट चुकी है। लेकिन उसे यह भी महसूस हुआ कि इस बार खतरा पहले से कहीं अधिक बड़ा है। दिव्य दृष्टि में उसे कुछ छायाएँ दिखाई दीं, जो दिव्या के चारों ओर मंडरा रही थीं। वे कोई साधारण शक्तियाँ नहीं थीं। उनमें विनाश की गंध थी।
नागार्जुन ने निर्णय लिया कि अब वह मानव लोक में जाएगा। वर्षों बाद उसने नागलोक की सीमाएँ छोड़ीं। अपनी शक्ति को छिपाकर उसने मानव रूप धारण किया। उसका उद्देश्य केवल एक था — दिव्या तक पहुँचना और उसकी रक्षा करना।
मानव लोक में प्रवेश करते ही नागार्जुन को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यह दुनिया उसके लिए बिल्कुल अलग थी। मशीनें, भीड़, शोर — सब कुछ अजनबी था। लेकिन उसके मन में धरा की यादें उसे आगे बढ़ने की ताकत दे रही थीं।
दूसरी ओर, दिव्या की जिंदगी में भी अजीब घटनाएँ शुरू हो चुकी थीं। कॉलेज जाते समय उसे कई बार ऐसा महसूस होता कि कोई उसका पीछा कर रहा है। कई बार उसके आसपास अचानक ठंडी हवा चलने लगती। एक दिन उसने अपने कमरे में एक सांप देखा, लेकिन वह सांप उसे नुकसान पहुँचाने के बजाय उसके सामने कुछ देर तक ठहरा और फिर गायब हो गया।
उसी दिन कॉलेज के बाहर दिव्या की मुलाकात पहली बार नागार्जुन से हुई। नागार्जुन ने खुद को एक नए प्रोफेसर के रूप में प्रस्तुत किया था। जब दोनों की नजरें मिलीं, तो समय जैसे कुछ क्षण के लिए थम गया। दिव्या को अचानक अपने भीतर एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई, जैसे वह इस व्यक्ति को कहीं पहले से जानती हो।
नागार्जुन ने भी महसूस किया कि धरा की आत्मा अभी भी दिव्या के भीतर जीवित है। लेकिन वह यह भी समझ गया कि उसे सब कुछ धीरे-धीरे याद दिलाना होगा। अगर वह अचानक सच्चाई बताएगा, तो दिव्या के लिए यह सहन करना मुश्किल होगा।
उसी रात, नागार्जुन को एक और संकेत मिला। उसे पता चला कि धरा की मृत्यु कोई दुर्घटना नहीं थी। किसी प्राचीन शत्रु ने उस ऊर्जा विस्फोट को जन्म दिया था। वह शत्रु अब फिर जाग चुका था और इस बार उसका लक्ष्य केवल धरा नहीं, बल्कि नागलोक और मानव लोक दोनों थे।
नागार्जुन जानता था कि यह यात्रा आसान नहीं होगी। उसे दिव्या का विश्वास जीतना होगा, उसके भीतर छिपी नाग शक्ति को जगाना होगा और साथ ही उस अदृश्य खतरे से लड़ना होगा जो धीरे-धीरे करीब आ रहा था।
दिव्या अभी तक यह नहीं जानती थी कि उसकी जिंदगी जल्द ही पूरी तरह बदलने वाली है। उसे यह भी नहीं पता था कि उसकी आत्मा में छिपी शक्ति उसे एक साधारण लड़की से कहीं अधिक बना सकती है।
नियति ने उनका मिलन तय कर दिया था, लेकिन उस मिलन तक पहुँचने के रास्ते में कई परीक्षाएँ, कई बलिदान और कई रहस्य छिपे थे। नागार्जुन ने आकाश की ओर देखा और मन ही मन प्रण लिया कि इस बार वह धरा को खोने नहीं देगा, चाहे इसके लिए उसे पूरी दुनिया से क्यों न लड़ना पड़े।
और उसी क्षण, अंधकार की गहराइयों में बैठी एक रहस्यमयी शक्ति मुस्कुरा उठी, जैसे वह इस कहानी के अगले अध्याय का इंतजार कर रही हो।