शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ान
भाग 2 (बैकस्टोरी): “रक्तपंख का जन्म”
[दृश्य 1 – महानगर का पिछड़ा इलाका, प्रातः]
टूटी-फूटी झुग्गियाँ। नालियों की दुर्गंध। धूप में बच्चे पानी की टूटी बाल्टी के चारों ओर खेल रहे हैं। अर्जुन किशोर अवस्था में है, कबाड़ बीनते हुए घर लौटता है। उसकी माँ बीमार चारपाई पर लेटी है।
माँ (कमज़ोर स्वर में):
“बेटा… आज दवा ले आया?”
अर्जुन (मुस्कराकर):
“आज ज़रूर ले आऊँगा, माँ। कल से हालात बदलेंगे।”
वह बाहर निकलता है। आँखों में उम्मीद है।
[दृश्य 2 – कारख़ाना मालिक का धोखा]
पुराने कारख़ाने में मज़दूरों की भीड़। मालिक मजदूरी देने से मना कर देता है।
अर्जुन के हाथ में पसीने से भीगे नोटों की जगह खाली मुट्ठी है।
मालिक:
“आज काम नहीं, कल आना।”
भीड़ बिखर जाती है। अर्जुन अपमानित महसूस करता है।
अर्जुन (स्वगत):
“मेहनत की कोई क़ीमत नहीं यहाँ।”
[दृश्य 3 – अँधेरी रात का हादसा]
रात। कूड़े का मैदान। अर्जुन कबाड़ खोज रहा है। कुछ बदमाश उसे घेर लेते हैं।
बदमाश 1:
“जो मिला है निकाल।”
अर्जुन मना करता है। बदमाश उसे मारते हैं। वह ज़मीन पर गिर जाता है।
उसी समय ऊपर से गिद्धों की चीत्कार सुनाई देती है।
अर्जुन (दर्द में):
“माँ…”
[दृश्य 4 – रक्त का मिलन]
तेज़ वर्षा शुरू होती है। पास ही एक घायल गिद्ध गिरकर मर जाता है। उसका रक्त अर्जुन के घावों में मिल जाता है। बिजली चमकती है। हवा में अजीब कंपन होता है।
अर्जुन (अर्धमूर्छित):
“ये… क्या हो रहा है…”
आकाश में गिद्धों का झुंड गोल घेरा बनाकर मँडराता है। उनकी चीत्कार के साथ धरती में कंपन बढ़ता है।
[दृश्य 5 – जागरण का स्वप्न]
अर्जुन बेहोशी में स्वप्न देखता है—काले आकाश में एक विशाल गिद्ध, जिसकी आँखें अग्नि-सी दहक रही हैं।
विशाल गिद्ध (गंभीर स्वर):
“जो मृतकों के बीच गिरा… वह जीवन की दूसरी उड़ान पाएगा।
मेरे रक्त से तू बँधा… अब तू मेरी दृष्टि और मेरे पंखों का वाहक है।”
अर्जुन हाथ बढ़ाता है। स्वप्न में उसके कंधों से पंख उग आते हैं।
[दृश्य 6 – पहला जागरण]
भोर। अर्जुन हाँफते हुए उठता है। पीठ में असहनीय पीड़ा होती है। धीरे-धीरे काले पंख प्रकट होते हैं। वह डर और विस्मय में अपने पंखों को छूता है।
अर्जुन:
“मैं… मैं क्या बन गया हूँ?”
वह खड़ा होने की कोशिश करता है। हवा उसके चारों ओर घूमती है। गिद्ध दूर आकाश में मंडराते हैं, मानो उसे स्वीकार कर रहे हों।
[दृश्य 7 – शक्ति की कीमत]
अर्जुन उड़ान भरने का प्रयास करता है। कुछ दूर जाकर गिर पड़ता है। उसका घुटना छिल जाता है। वह दर्द से कराहता है, पर फिर उठ खड़ा होता है।
अर्जुन (स्वगत):
“अगर यह शक्ति मुझे मिली है… तो इसकी कीमत भी मुझे ही चुकानी होगी।”
[दृश्य 8 – व्रत]
अर्जुन शहर की ओर देखता है। धुएँ के बादल उठ रहे हैं। कहीं दूर चीखें सुनाई देती हैं। वह अपने पंख फैलाता है।
अर्जुन (दृढ़ स्वर में):
“जो अँधेरा कमज़ोरों को नोचता है…
मैं उसी अँधेरे का शिकारी बनूँगा।”
वह पहली बार स्थिर उड़ान भरता है और आकाश में विलीन हो जाता है।
अर्जुन धीरे धीरे अपनी शक्तियों को समझता हे । और उसे समझ अता हे शहेर पर आने वाली समस्या को उसे ही दुर करना हे । वह प्रेक्टीस करता हे और एक सुट भी बनाता हे ।और शहेर का रक्षक वल्चर बन जाता हे । और शहेर को नरकविर से बचाता हे ।