जैसे-जैसे Sneha घर के करीब पहुँच रही थी, उसके मन में एक अजीब-सी उम्मीद जाग रही थी।
उसे लग रहा था—शायद घर पहुँचते ही इस परेशानी से छुटकारा मिल जाएगा। शायद मम्मी सब ठीक कर देंगी।
जैसे ही Sneha ने घर की चौखट के अंदर कदम रखा, सामने आँगन का रोज़ का ही दृश्य था—
दादा और दादी चारपाई पर बैठे हुक्का और चिलम पी रहे थे।
मम्मी भैंसों के पास काम कर रही थीं।
Sneha धीरे-धीरे सबकी नज़रों से बचते हुए मम्मी की तरफ बढ़ी।
वह बस मम्मी की गोद में छुप जाना चाहती थी—जैसे बचपन में हर डर से बच जाती थी।
जैसे ही मम्मी की नज़र Sneha पर पड़ी—और उसके कमर पर बँधे दुपट्टे पर—वह एक पल के लिए सहम गईं।
वह धीरे-धीरे उसके पास आईं।
गाँव में बातों को फैलते देर नहीं लगती—चाहे बात छोटी हो या बड़ी।
और शायद यही डर उनके मन में था।
उन्हें खुद भी पूरी तरह समझ नहीं था कि यह क्यों होता है।
मम्मी Sneha को अंदर ले गईं।
फिर अंदर जाकर एक साफ कपड़े का टुकड़ा लेकर आईं और बोलीं—
“पहले नहा ले… फिर इसे लगा लेना।”
एक अनपढ़ माँ क्या समझाती?
उन्हें बस इतना पता था कि गाँव में इसे अक्सर बीमारी की तरह ही देखा जाता है।
Sneha नहा कर बाहर आई।
उसने अपने कपड़े अच्छे से धोए… जब तक कि लाल निशान साफ नहीं हो गए।
लेकिन कपड़ों से दाग मिट गए थे—
क्या वह उन्हें अपनी यादों से मिटा पाएगी?
उसे कक्षा की हँसी याद आ रही थी…
वो निगाहें… वो फुसफुसाहट।
कुछ दाग कपड़ों से हट जाते हैं…
पर दिल और यादों से नहीं।
थोड़ी देर बाद Sneha को पेट में दर्द होने लगा।
उसने मम्मी से कहा, तो मम्मी ने उसे दही का कटोरा पकड़ा दिया—
“इसे खा ले… ठीक लग जाएगा।”
तभी दादी वहाँ आ गईं।
दादी गाँव की पुरानी सोच और परंपराओं में विश्वास रखने वाली थीं।
उन्होंने पूछा—
“क्या हुआ छोरी को? आज स्कूल से इतनी जल्दी कैसे आ गई?”
मम्मी ने धीरे से उनके कान में सारी बात बता दी।
दादी का चेहरा बदल गया।
उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा—
“जब तक ये ठीक नहीं हो जाती… मंदिर के पास मत जाना।
और रसोई के आस-पास भी मत भटकना।”
घर में खामोशी छा गई।
Sneha सब सुन रही थी।
उसे लगा—जैसे वह खुद ही अपने घर में अलग कर दी गई हो।
उसके मन में सवाल उठने लगे—
क्या वह अब अलग हो गई है?
क्या वह गलत है?
उसकी आँखें भर आईं…
लेकिन वह चुप रही।घर में अजीब-सी खामोशी छाई हुई थी।
आँगन वही था… लोग वही थे…
लेकिन Sneha को सब कुछ बदला-बदला लग रहा था।
दादी अपने काम में लग गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मम्मी रसोई के बाहर खड़ी कुछ सोच रही थीं।
Sneha कमरे के कोने में चुपचाप बैठ गई।
उसके हाथ अब भी हल्के-हल्के काँप रहे थे।
उसे बार-बार कक्षा का वो पल याद आ रहा था—
हँसी… फुसफुसाहट… और वो डर।
उसे समझ नहीं आ रहा था—
ये सब अचानक कैसे हो गया?
शाम धीरे-धीरे ढलने लगी।
घर के बाहर बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी।
लेकिन आज Sneha का मन बाहर जाने का नहीं था।
मम्मी धीरे से उसके पास आईं।
उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा—
लेकिन कुछ कहा नहीं।
उनकी आँखों में चिंता साफ दिख रही थी।
शायद वह खुद भी डर और उलझन में थीं।
कुछ देर बाद उन्होंने धीरे से कहा—
“आराम कर ले… सब ठीक हो जाएगा।”
Sneha ने सिर हिला दिया—
लेकिन उसे खुद नहीं पता था कि क्या ठीक होगा… और कब।
रात होने लगी।
आसमान में तारे दिखने लगे।
Sneha चारपाई पर लेटी थी…
लेकिन नींद उससे दूर थी।
उसके मन में बार-बार वही सवाल आ रहा था—
अगर ये हर लड़की के साथ होता है…
तो फिर इसके बारे में कोई बताता क्यों नहीं?
उसे Radha की बात याद आई—
“डर इसलिए लगता है… क्योंकि हमें इसके बारे में बताया नहीं जाता।”
शायद Radha सही थी।
शायद डर चीज़ से नहीं…
बल्कि चुप्पी से पैदा होता है।
Sneha ने आँखें बंद कर लीं।
आज का दिन उसके लिए बहुत अलग था।
डर भी था… दर्द भी था…
लेकिन कहीं न कहीं…
एक छोटा-सा सवाल भी जन्म ले चुका था।Sneha ने करवट बदली।
उसके पेट में हल्का दर्द अभी भी था…
और मन में उससे भी गहरा डर।
तभी बाहर आँगन में किसी के कदमों की आहट हुई।
Sneha ने धीरे से आँखें खोलीं…
दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
कौन आया होगा?
और क्या कल का दिन… आज से अलग होगा?
Sneha को अभी बहुत कुछ जानना था…
लेकिन उसे ये नहीं पता था—
कि आने वाले दिन उसकी ज़िंदगी को कितनी गहराई से बदलने वाले थे…