नष्ट होती पृथ्वी और जीवन के लिए संघर्ष करती मानव जाति। यह एक काल्पनिक कहानी है, जिसे मैंने बहुत सोच समझ कर लिखा है।
लेकिन अगर समय रहते, प्रकृति को नहीं बचाया गया। तो भविष्य में हमारी आने वाली पीढ़ियों को इन सब परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है।
ये कहानी काल्पनिक हो सकती है लेकिन इसका उद्देश्य गलत नहीं है।
मीरा को प्रकृति से बेहद लगाव था। उसने अपने बगीचे में ढेर सारे पेड़-पौधे और फूल लगाए हुए थे। हर रोज़ वो उनका ध्यान रखती समय पर पानी देती, खाद डालती और उनसे बातें भी करती।
शाम होते ही वो अपनी छत पर जाकर आसमान के तारे और चाँद देखती। उसे वो नीला सन्नाटा बहुत सुकून देता था।
एक रात वो यूँ ही छत पर बैठी थी, जब उसने एक चलता तारा देखा। उसे लगा "क्या धरती से बाहर भी कोई दुनिया है? क्या कहीं और भी कोई ऐसा है, जो इसी तरह तारों को देखता होगा ?"
मीरा बचपन से ही जिज्ञासु लड़की थी। उसे हर सवाल का जवाब चाहिए होता था, पर ये भी वो जानती थी कि हर सवाल का जवाब नहीं होता कुछ सवाल बस दिल में रहते हैं... चुपचाप ।
अगले दिन स्कूल में उसने अपने अध्यापक से पूछ ही लिया "सर, क्या पृथ्वी के बाहर भी कोई दुनिया है?
जहाँ जीवन हो?"
अध्यापक मुस्कराए और बोले "ये बात सच हो भी सकती और नहीं भी लेकिन किसी को नहीं पता मीरा, पर खोज जारी है।
लेकिन अध्यापक ने मीरा की सोच और उसके प्रश्न की सराहना की।
कुछ दिनों बाद भी...
मीरा उस जवाब को भूल नहीं पाई। उस दिन उस सवाल ने उसके भीतर कुछ जगा दिया था। वो पढ़ाई में लगन से जुट गई। वो जानती थी कि जो सवाल उसे सोने नहीं देते, शायद उनका जवाब वो ही एक दिन ढूंढेगी।
सालों बाद... मीरा ने एक किताब लिखी। एक ऐसी किताब, जिसमें वो दुनिया थी जो अभी खोज में नहीं मिली पर मीरा के दिल में हमेशा से ज़िंदा थी।
मीरा की किताब का नाम था "एक ओर जीवन"।
उस किताब की पहली पंक्तियां '"धरती अब मर रही थी, जीवन की आख़िरी उम्मीद था टाइटन ग्रह"'
सन 2100 एक ऐसी पृथ्वी है, जो अपनी ही संतानों से थक चुकी है। मानव का लगातार बढ़ता विकास और जनसंख्या ने प्रकृति को भीतर ही भीतर खोखला कर दिया है।
वहीं तकनीकी विकास ने तो मानव जीवन को नई ऊंचाइयों के साथ साथ अपनी जड़े और मजबूत कर ली है।
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंट ने तो मनुष्य को अपना गुलाम बनाया हुआ है। जिस मनुष्य ने अपनी जरूरतों के लिए ai बनाई
आज स्वयं मनुष्य उसके लिए एक खिलौना बनता जा रहा है।
एक तरफ मनुष्य जाति अपनी सफलताओं, नई - नई खोजों और आविष्कारों से प्रसन्न है।
तो दूसरी तरफ...
धरती का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। हिमखंड पिघलने लगे, समुद्र का जल-स्तर चुपचाप शहरों की सीमाएं निगलने लगता है। तूफ़ान अब मौसम नहीं चेतावनी बन चुका था।
ये सब पृथ्वी के धीमे विनाश की निशानियां थी , लोग घबरा रहे थे, किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे अब क्या करें कहां जाएं।
क्योंकि विनाश किसी जगह का नहीं था सम्पूर्ण पृथ्वी का था।
कुछ विकसित देश पहले से धरती छोड़कर किसी और ग्रह पर जीवन की तलाश कर रहे थे। उनके अंतरिक्ष यान, दूर तारों के पार जा रहे थे नई हवा, नया आसमान और नया जीवन ढूँढने।
लोगों की चिंता दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। उन्हें लगने लगा था कि शायद अब यही धरती का अंत है... अब कुछ भी नहीं बचेगा।
इसी अराजकता और डर के बीच, उत्तर पश्चिमी देश में एक लड़की थी - आद्विका।
वो एक छोटे और साधारण परिवार से थी। उसके पिता जॉन, एक किसान थे जिन्हें अपनी मिट्टी से गहरा लगाव था। लेकिन अब, वो भी बदलते मौसम को देखकर टूटने लगे थे।
हर दिन कोई न कोई तूफान आता। बारिश कभी बहुत ज़्यादा, कभी एकदम नहीं। जॉन की मेहनत की फसलें बर्बाद हो रही थी... पर फिर भी - वो अपना खेत छोड़ने को तैयार नहीं थे।
आद्विका अपने पिता का ये दुख देखती, और महसूस करती है कि ये दुख केवल एक पिता का नहीं, पूरी धरती का है।
वो एक अंतरिक्ष विज्ञान की विद्यार्थी थी। उसे पृथ्वी के बाहर की चीजें जाने की बहुत जिज्ञासा थी।
वह पढ़ाई में इतनी अच्छी थी कि हर वर्ष विश्वविद्यालय में सबसे अच्छे अंक हासिल करती।
सालों तक उसने विभिन्न ग्रहों, उपग्रहों और उनकी परिस्थितियों का गहन अध्ययन किया था।
सब कुछ आंखो के सामने देखते हुए...
अद्विका सोचती है कि आज... पढ़ाई से आगे, उसे अपने ज्ञान को ज़मीन पर उतरना होगा– या कहें, आकाश तक ले जाना होगा।
आद्विका ने अपने वर्षों के अध्ययन में कई ग्रहों और उपग्रहों की संभावनाओं को परखा था। लेकिन एक नाम, बार-बार उसके ज़हन में आता था टाइटन।
शनि ग्रह का यह उपग्रह, जहाँ वैज्ञानिकों को जीवन की कुछ हल्की-सी संभावनाएँ नज़र आई थीं।
बहुत कम लोग उसके बारे में जानते थे, लेकिन आद्विका ने उसके बारे में हर छोटी-बड़ी बात पढ़ रखी थी। वो ये सब अपने भीतर ही सोचती रहती उसके सवाल, जवाब, आशंका और उम्मीद... सब भीतर ही चलते रहते।
और ऐसे ही धीरे धीरे समय बीत रहा था। सब अपनी अपनी खोज में लगे हुए थे।
उधर, एक दिन अंतरिक्ष एजेंसी को कई साल पहले भेजे गए एक मिशन से एक रहस्यमय सिग्नल मिल रहा था।
सिग्नल कमजोर था, लेकिन लगातार था।
वैज्ञानिकों में हलचल मच गई। क्या सचमुच उस दूर की दुनिया से कोई जवाब आ रहा है?
सभी उत्साहित थे क्योंकि अगर सिग्नल की पुष्टि होती, तो ये मानव जाति के लिए एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता था।
कुछ दिनों बाद उस सिग्नल की पुष्टि कर ली गई। जो शनि के किसी उपग्रह से मिल रहा था। शायद ये उपग्रह टाइटन था।
हालांकि अभी भी जानकारी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं थी।
लेकिन ये मानव जीवन को बचाने का एक ही रास्ता दिखाई दे रहा था।
इसलिए एक मीटिंग में वहां जाने का निर्णय लिया गया।
किन्तु एक बड़ी चुनौती थी वहाँ जाएगा कौन ?
ये भी सब जानते थे कि टाइटन की सतह पर उतरना आसान नहीं होगा। वहां की वायुमंडलीय स्थितियाँ, तापमान और रसायन से सब अनजान थे।
इस मिशन के लिए उन्हें ऐसे लोग चाहिए थे जो न केवल विज्ञान में निपुण हों, बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत और भावनात्मक रूप से स्थिर हों। अब एजेंसी ऐसे अनुभवी और संकल्पशील लोगों की तलाश में जुट गई थी... जो इस जोखिम भरे, लेकिन ज़रूरी मिशन का हिस्सा बन सकें।
उन्हें किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत थी, जो सिर्फ़ बचने के लिए न, बल्कि कुछ नया रचने के लिए जाए। जो मुश्किल समय में सही निर्णय ले सके।
और सही गणनाएं कर सके।
अंतरिक्ष एजेंसी के कुछ वरिष्ठ वैज्ञानिक एक विशेष उद्देश्य के साथ उसी विश्वविद्यालय पहुँचे, जहाँ से आद्विका ने अध्ययन किया था।
वे वहाँ के विभागाध्यक्ष से मिले और सीधा सवाल किया "हमें ऐसे किसी विद्यार्थी की ज़रूरत है जो न केवल अकादमिक रूप से तेज़ हो, बल्कि समस्या को गहराई से सोचकर उसका हल भी खुद ढूंढ सके। क्या यहाँ कोई ऐसा है?"
वहाँ के प्रोफेसर कुछ क्षण के लिए मुस्कराए। फिर बड़ी दृढ़ता से बोले "हाँ, एक है - आद्विका। वो केवल किताबें नहीं पढ़ती, अपने हर सवाल का जवाब खुद तलाशती है। चाहे वो सवाल धरती से जुड़े हों या अंतरिक्ष से। मेहनती है, लेकिन उससे भी ज़्यादा, जवाबदार।"
वैज्ञानिकों की टीम ने आद्विका के बारे में पूरी जानकारी ली उसके शोध, ग्रेड, प्रोजेक्ट्स, और उसके पर्यावरण के प्रति नजरिए के बारे में। जब वो वहाँ से निकले, तो उनके पास बस एक नाम था आद्विका। और शायद... मानवता की अगली उम्मीद भी।
एक दोपहर अद्विका बैठी अपने खेतों की ओर देख रही थी। तभी उसके फोन की घंटी बजी।
और यह वही समय था जब उसे एक उम्मीद की किरण नज़र आई।
एजेंसी ने जब आद्विका से संपर्क किया तो उसे एक विशेष स्थान पर बुलाया गया। जहां पर दुनिया की नजरों से छुपा कर वर्षों से एक मिशन तैयार किया जा रहा था जिसपर अब इंसानियत की उम्मीद टिकी थी।
अगले दिन आद्विका उनके बताए स्थान पर पहुंच गईं।
वहाँ पहुँचते ही पहले तो वह डर गई कि ये सब क्या है कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ कि वो अकेली नहीं है। उसने वहाँ ऐसे लोगों को देखा, जिनकी आँखों में थकान तो थी, पर हौसला अब भी ज़िंदा था।
वे वैज्ञानिक, इंजीनियर और खगोलशास्त्री जो सालों से टाइटन मिशन पर काम कर रहे थे उस यान की बनावट से लेकर, उसके अंदर काम करने वाले हर उपकरण तक, हर चीज़ से वाक़िफ़ थे।
जब आद्विका वहाँ पहुँची, तो उनमें से कुछ ने उसे देखा और मुस्कराए मानो कह रहे हों, "हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे।"
तभी उनमें से एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने उससे हाथ मिलाते हुए कहा "हम वर्षों से इस मिशन की तैयारी कर रहे हैं... पर अब वक्त आ गया है कि इसे कोई आगे ले जाए। तुम्हारे आने से ये मिशन अब सिर्फ़ तकनीक नहीं, एक इंसानी सपना बन गया है।" आद्विका चुप रही।
उसके मन में कई सवाल थे, पर एक गहरा विश्वास भी - कि अब ये रास्ता सिर्फ़ तारों तक नहीं, धरती की नई सुबह तक जाएगा।
अद्विका वहाँ खड़ी, चारों ओर देख रही थी। हर कोना व्यस्त था कभी किसी मॉनीटर पर डेटा दौड़ता, तो कभी इंजीनियर यान के भीतर कोई अंतिम जाँच करते।
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