Lal Ishq - 1 in Hindi Drama by jagni b books and stories PDF | लाल इश्क - 1

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लाल इश्क - 1

बाहर मुंबई की कभी न थमने वाली रफ़्तार थी और केबिन के अंदर एक गला घोंटने वाली खामोशी। पुराने एयर कंडीशनर की घरघराहट ऐसी लग रही थी जैसे कोई वेंटिलेटर पर आखिरी सांसें ले रहा हो। आरंभी शास्त्री के लिए बस वही एक आवाज़ थी जो उसे बेहोश होने से बचा रही थी।

सामने मेज पर फाइलों का अंबार लगा था—सफेद कागजों के वे ढेर किसी 'कब्रिस्तान' की तरह लग रहे थे, जहाँ उसके पिता दिग्विजय शास्त्री के बिजनेस साम्राज्य की लाश दफन थी। आरंभी जैसे-जैसे पन्ने पलटती, वे डिजिटल नंबर्स उसे डसने लगते। बैलेंस शीट कभी बैलेंस नहीं हो रही थी। कर्ज का वह ब्लैक होल हर नई कैलकुलेशन के साथ उसे और भी गहराई में खींच रहा था।

आरंभी ने झुंझलाकर अपना डिज़ाइनर चश्मा उतारा और मेज पर फेंका। उसकी परफेक्ट नाक पर घंटों काम करने की वजह से लाल निशान पड़ गए थे। उसने अपनी 'स्मार्ट वॉच' पर नज़र डाली—रात के १२:१५

खिड़की के पार इंडस्ट्रियल इलाका किसी हॉरर फिल्म के सेट जैसा लग रहा था। स्ट्रीट लाइट्स की पीली रोशनी रह-रहकर फ्लिकर कर रही थी, जिससे सड़क पर डरावनी और लंबी परछाइयां नाच रही थीं। आरंभी अपनी एर्गोनोमिक कुर्सी से उठी, हड्डियों के चटकने की आवाज़ उस सन्नाटे में गूंज गई। वह खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। कांच की ठंडी सतह उसके तपते माथे को थोड़ी राहत दे रही थी।


"आरंभी, पैक अप... तुम्हें घर जाना चाहिए," उसने कांच में दिख रहे अपने थके हुए रिफ्लेक्शन से कहा।


पर 'घर' अब कोई सेफ हेवन नहीं था। घर का मतलब था—उसके डैड, दिग्विजय शास्त्री, जो पूरी रात बेचैनी में घर के चक्कर काटते रहते थे। उनकी आंखों में नींद की जगह सिर्फ रेड ज़ोन था। वे उन खतरनाक लोगों के करोड़ों के कर्ज तले दबे थे, जो वसूली के लिए कानून को अपने जूतों के नीचे रखते थे।

तभी, नीचे अंधेरे में कुछ सरसराहट हुई। आरंभी की नजरें वहीं जम गईं। सामने वाले खंडहरनुमा वेअर हाऊस के दरवाजे से दो परछाईया बाहर निकलीं। एक क्रूर शिकारी और उसका शिकार! एक लंबा-चौड़ा, हट्टा-कट्टा आदमी दूसरे शरीर को कचरे की तरह घसीटते हुए ला रहा था। आरंभी को ऐसा आभास हुआ जैसे जमीन पर घिसटते उन पैरों की आवाज उसे यहाँ तक सुनाई दे रही हो।

अचानक, अंधेरे में एक चिंगारी उठी— 'धप्प!'

बंदूक की वह आवाज साइलेंसर की वजह से दब गई थी, लेकिन आरंभी के दिल की धड़कन रुक सी गई। उस लंबे आदमी ने बड़े ही ठंडे दिमाग से अपनी बंदूक कमर में फंसाई। आरंभी को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसने एक पल के लिए ऊपर खिड़की की ओर देखा हो... और अगले ही पल वह अंधेरे में ओझल हो गया। महज एक सेकंड में एक इंसान का अस्तित्व खत्म हो चुका था।


"मिस आरंभी?"

पीछे से आई एक अचानक आवाज़ ने उसके सिस्टम को हिला दिया। आरंभी के हलक से एक दबी हुई चीख निकली। वह झटके से पलटी, उसका दिल सीने में कैद किसी घायल परिंदे की तरह धड़क रहा था।
दरवाजे पर खन्ना खड़े थे, हाथ में चाय की ट्रे लिए। उनके चेहरे पर गहरी चिंता थी।

"सॉरी, मेरा इरादा आपको डराने का नहीं था," खन्ना ने कमरे में दाखिल होते हुए कहा। "काफी रात हो गई है। आपको देखकर ऐसा लग रहा है जैसे आपने कोई ग्लिच या कोई भूत देख लिया हो।"

आरंभी के पास शब्द नहीं थे। उसका गला पूरी तरह चोक हो चुका था। उसने दोबारा खिड़की के बाहर देखा, लेकिन वहाँ अब कुछ नहीं था। गली खाली थी। वह लाश और वह कातिल... दोनों गायब थे, जैसे उस अंधेरी रात ने उन्हें डिलीट कर दिया हो। वहाँ न खून का कोई पिक्सेल था, न मौत का कोई निशान।

"मैं... मैं बस ओवरवर्क की वजह से थक गई हूँ, मिस्टर खन्ना," उसने अपनी कांपती आवाज़ को कंट्रोल करने की कोशिश की। "मुझे ये नंबर्स और ये हिसाब-किताब... कुछ भी समझ नहीं आ रहा।"

"इसे अब यही रोग दीजिए आरंभी मैम," खन्ना ने चाय का प्याला रखते हुए कहा। "दिग्विजय सर अब तक दस बार कॉल कर चुके है। वो चाहते हैं कि आप तुरंत घर पहुँचें। उन्होंने कहा है कि कल सुबह वो आपको किसी बहुत 'हाई-प्रोफाइल' शख्स से मिलवाने वाले हैं।"

आरंभी के स्पाइन में एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसके डैड उसे किसी से तभी मिलवाते थे जब कोई बहुत बड़ी डील या कोई 'कॉम्प्रोमाइज' दांव पर हो। उसने आखिरी बार उस सूनी गली की तरफ देखा। उस कातिल का वो डार्क सिलुएट उसकी आंखों में अभी भी किसी पुराने जख्म की तरह ताज़ा था।

"वो मुझे किससे मिलवाना चाहते हैं?" उसने पूछा, हालांकि वह जानती थी कि आने वाला कल उसके लिए कोई नई उम्मीद नहीं, बल्की उसकी लाइफ का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट होने वाला है।


आखिरकार दिग्विजय शास्त्री आरंभी को किस्से हिरवाईने वाले हैं? और आरंभीने जो देखा वह सच था या भ्रम?