Adhurapan in Hindi Short Stories by Anup Anand books and stories PDF | अधूरापन

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अधूरापन

1
बरसात की वह शाम न तो बहुत ख़ुशनुमा थी, न ही बहुत उदास।
बस एक अजीब-सी चुप्पी थी—जैसे आसमान कुछ कहना चाहता हो, लेकिन शब्द नहीं मिल रहे हों।
नीरज बरामदे में खड़ा था। सामने सड़क पर पानी जमा हो गया था और उसमें पड़ती स्ट्रीट लाइट की रोशनी टूट-टूट कर बिखर रही थी। उसे हमेशा से लगता था कि ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है—एक रोशनी, जो पूरी तरह कभी दिखाई नहीं देती।
पीछे से चाय की हल्की-सी आवाज़ आई।
“ठंडी हो जाएगी,”
अन्वी ने कहा।
नीरज ने पलटकर देखा। वही सादा सूट, वही खुले बाल, वही आँखें—जिनमें सवाल हमेशा रहते थे, जवाब कभी नहीं।
“अभी पी लूँगा,”
उसने कहा, बिना कुछ महसूस कराए।
अन्वी मुस्कुरा दी।
वह मुस्कुराहट कभी शिकायत नहीं करती थी।
2
उनकी कहानी कोई अचानक शुरू हुई चीज़ नहीं थी।
वह बचपन से एक-दूसरे के आस-पास थे—एक ही मोहल्ला, एक ही स्कूल, एक ही छत पर बैठकर तारे गिनना।
नीरज पढ़ाई में तेज़ था।
अन्वी… समझने में।
जब नीरज को दुनिया समझ नहीं आती थी, अन्वी चुपचाप उसे सुन लिया करती थी।
जब अन्वी को शब्द नहीं मिलते थे, नीरज मज़ाक बनाकर बात बदल देता था।
धीरे-धीरे वह रिश्ता दोस्ती से आगे बढ़ गया—
बिना किसी एलान के, बिना किसी वादे के।
शायद इसलिए वह रिश्ता सबसे ज़्यादा सच्चा था।
3
कॉलेज के दिनों में नीरज बदलने लगा।
नई किताबें, नए लोग, नए सपने।
वह बड़े शहर जाना चाहता था।
नाम कमाना, पहचान बनाना, भीड़ में अलग दिखना।
अन्वी वही थी।
शांत, स्थिर, ठहरी हुई।
वह नीरज के सपनों से कभी नहीं डरती थी,
बस उनसे बाहर रह जाने से डरती थी।
एक दिन उसने पूछा,
“अगर तुम चले गए, तो?”
नीरज हँस पड़ा।
“तो क्या? मैं लौट आऊँगा।”
अन्वी ने फिर कुछ नहीं कहा।
वह जानती थी—कुछ लोग लौटने के लिए नहीं जाते।
4
नीरज का चयन हो गया।
शहर से बाहर, एक बड़ी नौकरी।
घर में मिठाई बँटी।
सब खुश थे।
सिर्फ़ अन्वी के हाथ काँप रहे थे।
उस रात छत पर बहुत देर तक दोनों चुप बैठे रहे।
नीरज बातें करता रहा—शहर, ऑफिस, ज़िंदगी।
अन्वी सुनती रही।
जैसे हर शब्द को यादों में जमा कर रही हो।
“कुछ कहोगी नहीं?”
नीरज ने पूछा।
अन्वी ने आसमान की तरफ़ देखा।
“जो कहना था, वो शायद तुम सुनना नहीं चाहते।”
नीरज को बुरा लगा।
लेकिन उसने भी कुछ नहीं कहा।
कभी-कभी दो लोग इसलिए नहीं बोलते, क्योंकि वे एक-दूसरे को बहुत ज़्यादा समझते हैं।
5
नीरज चला गया।
पहले पत्र आते थे।
फिर कॉल्स।
फिर बस त्योहारों पर एक-दो संदेश।
अन्वी हर दिन वही रास्ता तय करती—घर, काम, घर।
लेकिन हर शाम वह उसी खिड़की से बाहर देखती, जहाँ कभी नीरज खड़ा रहा करता था।
लोगों ने पूछना शुरू किया।
“अब शादी कब करोगी?”
अन्वी मुस्कुरा देती।
कुछ सवालों के जवाब समय नहीं देता।
6
शहर में नीरज सफल हो रहा था।
नाम, पैसा, लोग।
लेकिन जब रात को वह अकेला होता,
तो उसे वही पुराना मोहल्ला याद आता—
वही छत, वही बारिश, वही अन्वी।
उसने कई बार सोचा—
लौटकर सब ठीक कर लूँगा।
लेकिन हर बार कुछ न कुछ ज़रूरी निकल आता।
7
सालों बाद नीरज लौटा।
थोड़े दिनों के लिए।
मोहल्ला वही था,
लेकिन सब कुछ बदला-सा लगा।
अन्वी अब पहले जैसी नहीं दिखती थी।
ज़्यादा शांत, ज़्यादा गंभीर।
“तुम बदल गई हो,”
नीरज ने कहा।
अन्वी ने हल्की-सी मुस्कान दी।
“लोग बदलते नहीं हैं… बस समय उन्हें समझदार बना देता है।”
नीरज कुछ कहना चाहता था,
लेकिन शब्द फिर साथ छोड़ गए।
8
वह मुलाक़ात छोटी थी।
अधूरी।
नीरज वापस चला गया।
कुछ महीनों बाद खबर आई—
अन्वी की शादी तय हो गई है।
नीरज ने बहुत देर तक फोन हाथ में पकड़े रखा।
फिर उसे नीचे रख दिया।
कुछ फैसले इतने देर से लिए जाते हैं
कि वे फैसले नहीं रहते—
सिर्फ़ पछतावे बन जाते हैं।
9
शादी के दिन नीरज नहीं आया।
अन्वी ने बुलाया भी नहीं।
शादी साधारण थी।
बिना शोर, बिना दिखावे के।
अन्वी ने लाल जोड़ा पहना,
लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी नमी थी।
10
सालों बाद।
नीरज अब बहुत आगे निकल चुका था।
लोग उसे जानते थे, मानते थे।
एक दिन पुराने काग़ज़ों के बीच उसे एक डायरी मिली।
अन्वी की लिखावट।
आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“कुछ रिश्ते पूरे इसलिए नहीं होते
क्योंकि अगर वे पूरे हो जाएँ,
तो वे उतने ख़ूबसूरत नहीं रहेंगे।
मैंने नीरज से कुछ नहीं माँगा,
क्योंकि जो बिना माँगे साथ दे,
वही सच्चा होता है।
और शायद
अधूरा प्यार
ही सबसे पूरा होता है।”
नीरज देर तक बैठा रहा।
आँखें नम थीं, लेकिन आँसू नहीं गिरे।
कुछ दर्द इतने गहरे होते हैं
कि वे बाहर नहीं आते—
बस इंसान के अंदर बस जाते हैं।
11
उस रात नीरज फिर खिड़की के पास खड़ा था।
बाहर वही स्ट्रीट लाइट, वही टूटी रोशनी।
लेकिन अब वह समझ गया था—
ज़िंदगी में सबसे बड़ी हार
किसी को खो देना नहीं होती,
सबसे बड़ी हार होती है—
उसे पाने का साहस न कर पाना।
और कहीं दूर, किसी और शहर में,
अन्वी भी शायद उसी आसमान को देख रही होगी—
बिना शिकायत,
बिना उम्मीद,
बस इस यक़ीन के साथ कि
कुछ कहानियाँ
पूरी होने के लिए नहीं लिखी जातीं…
वे अधूरी रहने के लिए होती हैं।