part- 5
सुहानी ने मोबाइल को देर तक देखा।
हर्ष का voice note अब भी वहीं था—
सुना हुआ, लेकिन महसूस नहीं किया गया।
उसका मन बार-बार उसी सवाल पर अटक रहा था—
अगर किसी आवाज़ से दिल काँप जाए,
तो क्या उसे सुनना ज़रूरी होता है?
वह जानती थी,
डर हमेशा शोर नहीं करता।
कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।
उधर हर्ष ने लैपटॉप खोला।
सुहानी का मैसेज पढ़ते ही
उसने टाइप करना शुरू किया—
“ज़रूरी नहीं…
लेकिन कभी-कभी सच से भागने का
एक ही तरीका होता है—
उसे सुन लेना।”
मैसेज भेजते ही
उसने स्क्रीन बंद कर दी।
वह इंतज़ार नहीं करना चाहता था।
दोपहर तक
सुहानी ने कोई जवाब नहीं दिया।
काम में मन नहीं लग रहा था।
डैशबोर्ड खुला था,
लेकिन दिमाग़ कहीं और।
उसी बीच
उसके मेल पर एक नया नोटिफ़िकेशन आया।
From: Riya Sharma (Client Coordinator)
सुहानी ने मेल खोला।
“Hi Suhani,
I spoke with Harsh regarding the project changes.
He was really helpful.
Let’s sync again tomorrow.
Also, he seems quite sorted 😊”
सुहानी की उँगलियाँ रुक गईं।
“काफी helpful…”
“Quite sorted…”
एक अजीब सा खिंचाव महसूस हुआ।
वह जानती थी—
यह सिर्फ़ एक प्रोफेशनल मेल है।
लेकिन दिमाग़ हमेशा
वही नहीं समझता
जो दिल समझाना चाहता है।
शाम को
सुहानी ने सोशल मीडिया खोला।
एक स्टोरी दिखी।
Riya tagged Harsh
ऑफिस कॉल के बाद की तस्वीर।
हर्ष मुस्कुरा रहा था।
बस इतना ही था।
लेकिन सुहानी के लिए
इतना काफी था।
उसने मोबाइल लॉक कर दिया।
उधर हर्ष को कोई अंदाज़ा नहीं था
कि एक तस्वीर
किसी के भीतर
कितना कुछ बदल सकती है।
वह बस इतना जानता था
कि सुहानी खामोश है।
और खामोशी
उसे बेचैन कर रही थी।
रात को
हर्ष ने फिर मैसेज टाइप किया।
“आज आप कुछ अलग लग रही हैं।
अगर बात करना चाहें,
मैं यहीं हूँ।”
Seen नहीं हुआ।
उसने फोन साइड में रख दिया।
पहली बार
उसे लगा
कि शायद वह ज़्यादा आगे बढ़ रहा है।
अगले दिन।
एक और मीटिंग।
सुहानी ऑन कैमरा नहीं आई।
उसकी आवाज़ प्रोफेशनल थी,
लेकिन ठंडी।
हर्ष ने नोटिस किया।
उसने मीटिंग के बाद पूछा।
“सब ठीक है?”
सुहानी ने छोटा सा जवाब दिया।
“हाँ,”
हर्ष ने कहा।
“कुछ बदल गया है,”
“और आप बता नहीं रहीं।”
सुहानी चुप रही।
फिर बोली—
“हर बदलाव बताने लायक नहीं होता।”
यह पहली बार था
जब उसकी आवाज़ में
हल्की सी तल्ख़ी थी।
हर्ष ने और कुछ नहीं कहा।
मीटिंग खत्म होते ही
सुहानी ने हर्ष को mute कर दिया।
एक छोटा सा बटन।
लेकिन उसके भीतर
बहुत बड़ा असर।
उस शाम
हर्ष को रिया का कॉल आया।
“Harsh, are you free?
Just wanted to clarify a few things.”
कॉल प्रोफेशनल थी।
साफ़।
सीधी।
लेकिन उसी समय
सुहानी ऑनलाइन थी।
उसने देखा—
Harsh on call
उसका दिल बैठ गया।
“यही तो होता है,”
उसने खुद से कहा।
“जो शांत दिखते हैं,
वही सबसे ज़्यादा छुपाते हैं।”
रात को
सुहानी ने हर्ष को मैसेज किया।
पहली बार
सीधे।
“तुम्हें सबके साथ इतना easy होना
कैसे आता है?”
हर्ष चौंक गया।
“मतलब?”
“मतलब यही।
प्रोफेशनल, पर्सनल…
सब एक जैसा।”
हर्ष ने तुरंत कॉल किया।
सुहानी ने काट दिया।
कुछ सेकंड बाद—
हर्ष:
“अगर मैं गलत समझ रहा हूँ,
तो प्लीज़ बता दो।
खामोशी से बेहतर है।”
सुहानी की उँगलियाँ काँप रही थीं।
उसने टाइप किया—
“मुझे ऐसा नहीं चाहिए
जो सबको एक जैसा लगे।”
और भेज दिया।
हर्ष ने मैसेज पढ़ा।
लंबी साँस ली।
उसने जवाब नहीं दिया।
पहली बार
वह भी चुप हो गया।
अगले दो दिन
कोई मैसेज नहीं।
कोई कॉल नहीं।
सिर्फ़ काम।
लेकिन काम के बीच
नाम बार-बार सामने आता रहा।
सुहानी सोचती रही—
क्या मैंने जल्दी जज कर लिया?
हर्ष सोचता रहा—
क्या मैंने ज़्यादा उम्मीद कर ली?
तीसरे दिन
सुहानी को एक सिस्टम नोटिफ़िकेशन मिला।
“Harsh has requested to be removed from the project.”
उसका दिल तेज़ हो गया।
“क्यों?”
उसने खुद से पूछा।
और उसी पल
उसके मोबाइल पर
एक आख़िरी मैसेज आया—
हर्ष:
“शायद दूरी
इस वक्त बेहतर है।
टेक केयर, सुहानी।”
सुहानी स्क्रीन को देखती रह गई।
ब्लू टिक लग चुका था।
लेकिन इस बार
उसे रोका नहीं जा सका।
उसी रात,
सुहानी ने अचानक
वह पुराना voice note फिर से खोला—
जिसे उसने सुना था…
या शायद सुना ही नहीं था।
और जैसे ही उसने प्ले दबाया,
उसे एहसास हुआ—
उसने हर्ष को गलत समझ लिया था।
लेकिन तब तक
बहुत देर हो चुकी थी…
आगे जानने के लिए हमारे साथ बने रहिए ।
By..............Vikram kori ..