Lal Ishq - 4 in Hindi Drama by jagni b books and stories PDF | लाल इश्क - 4

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लाल इश्क - 4

शादी की रस्में अग्नि और मंत्रोच्चार के शोर में किसी 'बफरिंग' होती मेमोरी की तरह धुंधली लग रही थीं। आरंभी को महसूस हुआ कि उसका शरीर किसी 'ऑटो-पायलट' मोड पर चलने वाली कठपुतली की तरह रस्में पूरी कर रहा था, लेकिन उसका मन एक 'एनक्रिप्टेड फायरवॉल' के पीछे कैद होकर चीख रहा था।

जब भी अग्नि में आहुति देने के लिए उनके हाथ एक-दूसरे को छूते, आरंभी को किसी 'हाई-वोल्टेज' शॉर्ट सर्किट जैसा झटका लगता। आर्यवर्धन अग्निहोत्री ने अपनी नजरें उससे एक सेकंड के लिए भी नहीं हटाई थीं। वह उसे किसी 'क्लीनिकल इन्वेस्टिगेशन' की तीव्रता से देख रहा था, मानो उसके चेहरे के हर 'माइक्रो-एक्सप्रेशन' का रियल टाइम में 'डेटा एनालिसिस' कर रहा हो।

"वधु और वर अब सप्तपदी पूर्ण करेंगे," पंडित ने घोषित किया।

आर्यवर्धन उठा और उसने एक 'फोर्स कमांड' के साथ आरंभी को ऊपर खींचा। उस अंधेरी गली में वह जितना खूंखार दिखा था, अब उससे कहीं अधिक अकल्पनीय—एक 'डार्क एम्पायर' के पहाड़ जैसा महसूस हो रहा था। जब उन्होंने अग्नि के चारों ओर अपना पहला कदम रखा, आर्यवर्धन उसके कान के पास झुका। उसकी गर्म सांसों का स्पर्श आरंभी की गर्दन के बालों को 'ट्रिगर' कर रहा था।

"तुम्हारे डैड ने मुझे बताया था कि तुम बहुत शांत लड़की हो," वह बेहद धीमी और रौबदार आवाज में फुसफुसाया। "But they missed a very important detail, आरंभी... तुम एक 'Watcher' (गवाह) हो।"

आरंभी की सांस किसी 'सिस्टम एरर' की तरह अटक गई। "क... क्या आपने मुझे देखा था?" वह कांपते स्वर में बुदबुदाई।

आर्यवर्धन के होंठों पर एक क्रूर मुस्कान उभरी। "I monitor every single 'bit' of data in my empire, मिस आरंभी। विशेष रूप से तब, जब तुम्हारे जैसी लड़की आधी रात को खिड़की से मेरा 'Live Execution' (हत्याकांड) देख रही हो।"

तीसरा फेरा... चौथा फेरा... आरंभी ने दूर खड़े दिग्विजय शास्त्री की ओर देखा। वे पसीना पोंछते हुए मुस्कुरा रहे थे—जैसे कोई कठिन 'लॉजिस्टिक ट्रेड' सफल होने की वीभत्स खुशी हो। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि उन्होंने अपनी बेटी को एक इंसान के हाथ में नहीं, बल्कि एक ऐसे 'किंगपिन' के हवाले किया है, जिसके लिए इंसान की जिंदगी सिर्फ एक 'एंट्री' थी।

"क्यों?" आरंभी ने कांपती आवाज में पूछा। "मैं ही क्यों?"

आर्यवर्धन ने उसकी पकड़ और मजबूत कर ली। "Because you didn't look away. जब दुनिया बदसूरत होती है, तो ज्यादातर लोग 'System Shutdown' कर लेते हैं या आंखें मूंद लेते हैं। लेकिन तुम्हारी आंखें खुली थीं। I liked that audacity. मुझे ऐसे ही पार्टनर की जरूरत थी who can look straight into the darkness without blinking."

सातवां फेरा पूरा हुआ। आर्यवर्धन ने आगे बढ़कर आरंभी के चेहरे का भारी काला घूंघट (Veil) हटाया। उसकी उंगलियों का ठंडा स्पर्श आरंभी के गालों पर होते ही उसकी चेतना जैसे लुप्त होने लगी। उसने नीचे झुककर आरंभी के माथे पर एक चुंबन अंकित किया। यह प्रेम नहीं था; यह उसकी सत्ता का 'ब्रांड लोगो' था।

"You are only mine." वह बस इतना ही बुदबुदाया।

लोकेशन: रिसेप्शन हॉल, द गॉथिक फोर्ट

समय: ००:०० (मध्यरात्रि)

वह रिसेप्शन हॉल किसी शादी का जश्न कम और सिलिकॉन वैली की कोई 'कोल्ड वॉर रूम' ज्यादा लग रहा था। चारों ओर नीली और सफेद नियॉन लाइट्स का पहरा था। आरंभी मुख्य टेबल पर किसी 'अनरिस्पॉन्सिव ऐप' की तरह सुन्न बैठी थी। सामने सजा खाना किसी राजसी दावत जैसा था, लेकिन उसकी नजरों में वह एक 'मैलवेयर' जैसा था। टेबल पर सिर्फ मांस का बोलबाला था—खून जैसा गाढ़ा लाल सॉस, भुना हुआ मांस और उसकी दम घोंटने वाली उग्र गंध।

उस गंध ने आरंभी के दिमाग में पुराने यादों का एक 'करप्टेड फोल्डर' खोल दिया। उसे वह काली रात और गलियों में बिखरा हुआ खून याद आने लगा। उसका सिस्टम 'ओवरहीट' हो रहा था। उसने उम्मीद से अपने पिता की ओर देखा, लेकिन वे मदिरा और सौदों के 'लूप' में फंसे थे। उनके दिमाग से आरंभी का 'वेजिटेरियन डेटा' हमेशा के लिए डिलीट हो चुका था।

तभी आर्यवर्धन उसकी बगल वाली कुर्सी पर 'लॉग-इन' हुआ। शेरवानी की जगह अब वह एक 'शार्प मैट-ब्लैक' ब्लेज़र में था। वह किसी निर्दयी टेक-टाइकून जैसा दिख रहा था जिसकी नजरें किसी 'बग' को ढूंढ रही हों। उसने आरंभी की खाली प्लेट और उसके सफेद पड़े चेहरे को देखा।

"खा क्यों नहीं रही हो?" उसका स्वर किसी 'कमांड प्रॉम्प्ट' जैसा ठंडा था। "Is the menu not compatible with your taste?"

आरंभी का गला सूखकर 'डेड सिग्नल' जैसा हो गया था। "मु... मुझे भूख नहीं है। मुझे घर जाना है।"

आर्यवर्धन ने हाथ में पकड़ा क्रिस्टल ग्लास घुमाया, जिसमें रेड वाइन किसी डिजिटल डेटा की तरह चमक रही थी। "Welcome to the reality, मिस आरंभी। तुम अब अपने ही घर में हो। Everything is 'Owned by me'। और याद रखना, मेरे नेटवर्क से 'Log out' करने का कोई रास्ता एक्झिस्टन्स में नहीं है।"

आर्यवर्धन को यह नहीं पता था कि आरंभी शाकाहारी है; उसे लगा वह नखरे कर रही है। उसने मांस का एक टुकड़ा उठाया और आरंभी के होंठों के पास ले गया। यह एक 'साइलेंट कमांड' था। आरंभी ने अपना मुंह कसकर बंद कर लिया, आंखों में दहशत थी।

"Eat," वह हुकुमी लहजे में बोला। "'Obedience' तुम्हारी जिंदगी बहुत आसान बना देगी। अगर तुम खुद नहीं खाओगी, तो मुझे तुम्हें 'Force-Feed' करना पड़ेगा। And trust me, तुम्हें वो तरीका पसंद नहीं आएगा।"

सत्ता के उस अगाध अंधेरे के आगे आरंभी बेबस थी। उसने कांपते हाथों से वह टुकड़ा स्वीकार किया, क्योंकि वह जानती थी कि इस सिस्टम में विरोध का अर्थ अपना विनाश बुलाना था।

"Good," आर्यवर्धन उठते हुए बोला। "मुझे आज रात बहुत काम है। कुछ 'Corrupted Files' को ठीकाने लगाना है। काव्या तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखाएगी। मैं सुझाव दूंगा कि तुम 'Sleep Mode' पर चली जाओ। हमारी असली जिंदगी कल से शुरू होगी।"

वह अपने गार्ड्स के साथ अंधेरे में ओझल हो गया। महल के ठंडे और खामोश गलियारों से गुजरते हुए आरंभी को अहसास हुआ कि वह एक ऐसे इंसान के जाल में है जो इंसानी जिंदगी को सिर्फ एक 'लेजर बुक' की एंट्री समझता है—जिसे या तो 'बैलेंस' किया जाता है या 'मार्क एज़ डेड'।

उसने अपनी जेब में हाथ डाला और घड़ी की 'टिक-टिक' महसूस की। वक्त अब भी चल रहा था, भले ही आरंभी के संसार का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' आज पूरी तरह बदल गया था।