No one hears the pain in Hindi Motivational Stories by Wajid Husain books and stories PDF | कोई दर्द नहीं सुनता

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कोई दर्द नहीं सुनता

वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी।     सुबह का सूरज अभी पूरी तरह निकला नहीं था। हल्की पीली रोशनी मजदूरों के अड्डे पर पसरी हुई थी- जैसे रात और दिन के बीच कोई थका हुआ समझौता हो गया हो। कुछ लोग बीड़ी सुलगा रहे थे, कुछ चाय की बाट देख रहे थे और कुछ ऐसे भी थे, जो खाली आंखों से सड़क को ताक रहे थे, मानो वहां कोई राह निकल आएगी। इन्हीं में माधव खड़ा था। उम्र ढल चुकी थी। पीठ झुक गई थी और कपड़ों की सिलाई में गरीबी ने स्थाई घर बना लिया था । आंखों में नींद नहीं, बल्कि कई रातों से जमा हुआ यह  सूनापन था। उसका बेटा रामू -इकलौता सहारा  इसी हफ्ते मर गया था। यह बात वह हर मिलने वाले से कहना चाहता था, पर शब्द बार-बार लौट आते थे।"ओ मजदूर, काम करोगे क्या?" एक कड़क आवाज गूंजी। माधव जैसे चौक कर वर्तमान में लौटा। उसने जल्दी से सिर उठाया और बोला, "हां साब।" आवाज़ में हां कम, डर ज़्यादा था, डर की कहानी आज भी काम न मिला तो रात और लंबी हो जाएगी।वह उस आदमी के साथ चल पड़ा। कुछ क़दम चलने के बाद उसने उसकी ओर देखा। उसके होंठ ज़रा-से हिले। शायद वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक गए।"क्या कहना चाहते हो तुम?" आदमी ने चलते-चलते पूछा।माधव ने ज़बरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कुराहट खींच ली। गला साफ़ किया और फटी हुई आवाज़ में बोला, "मेरा इकलौता बेटा रामू… इस हफ्ते गुज़र गया साहब।"आदमी ने एक पल उसकी ओर देखा, फिर लापरवाही से पूछा, "अच्छा, कैसे मर गया वह?"माधव जैसे इसी सवाल के इंतज़ार में था। वह पूरी तरह उसकी ओर मुड़ा। "क्या कहूं साहब," उसने कहा, "डॉक्टर तो कहते थे—सिर्फ़ तेज़ बुख़ार था। तीन दिन अस्पताल में पड़ा तड़पता रहा। मैं उसके पास बैठा रहा… उसकी सांसें गिनता रहा। फिर एक रात…।" माधव की आवाज़ भर्रा गई। उसने जल्दी से बात संभाली, "भगवान की मर्ज़ी के आगे किसकी चलती है!""ज़रा तेज़ चलो… और तेज़!" आदमी अचानक चिल्लाया, "नहीं तो शाम तक खेत नहीं पहुंच पाएंगे।" उस आदमी की तेज़ चाल और बेरुखी ने उसके शब्दों को पैरों तले रौंद दिया।माधव चुप हो गया। उसने गर्दन सीधी की और तेज़ चलने लगा। खेत में पानी भरा हुआ था। कीचड़ में घसी धान की पौधियां किसी थके हुए जीवन की तरह लग रही थी। मज़दूर चार-चार की टोलियों में धान की पौध लगा रहे थे। आदमी ने इशारे से कहा, "एक टोली में एक आदमी कम है। वहां जाकर काम शुरू कर दो।"माधव ने चारों ओर देखा। फिर चुपचाप उस टोली में जा खड़ा हुआ, जहां एक आदमी कम था। वह झुककर पौध लगाने लगा। मिट्टी ठंडी थी, पर उसके हाथ कांप रहे थे। वह बुदबुदाया, "रामू भी यही काम करता था... जवान था... हंसता था..." पास खड़ा मज़दूर हंस पड़ा -बुढ़ऊ,  बड़बड़ा क्या रहा है?"मेरा बेटा… इस हफ्ते गुज़र गया। हम सबको एक दिन मरना है," उसने खुद से कहा। फिर एक लंबी सांस ली। खांसी का ज़ोरदार दौरा पड़ा। होंठों पर हाथ फेरकर उसने ख़ुद को संभाला।टोली के आगे चल रहा लंबा आदमी उनका मुखिया था। वह पीछे मुड़ा और गरजा, "बुड्ढ़े, हाथ तेज़ चला… और तेज़! अगर पीछे रह गया तो गर्दन तोड़ दूंगा। सुन रहा है?"गालियों की बौछार जारी रही, पर माधव जैसे कुछ सुन ही नहीं रहा था। शब्द उसके कानों से टकराते और बिना असर किए लौट जाते। वह बस "में… में… हें…" करके अजीब-सी हंसी हंस देता। फिर बोला, "आप जवान हैं… भगवान आपका भला करे।"एक मज़दूर ने हल्के मज़ाक में पूछा, "बुढ़ऊ, शादीशुदा हो?"माधव ने उसकी ओर देखा। आंखों में अजीब-सी चमक थी। "मैं? अब तो बस मेरी बीवी ही है। उसने अपनी आंखों से सब कुछ देख लिया है।" वह कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, "मौत बहुत दूर नहीं है। बेटा मर चुका है और मैं ज़िंदा हूं। अजीब बात है… मौत ग़लत दरवाज़े पर चली गई। मेरे पास आने के बजाय वह मेरे बेटे के पास चली गई।"शाम ढल चुकी थी। काम बंद हुआ। मालिक आया और संतोष की सांस लेकर बोला, "शुक्र है भगवान का! सब पौध लग गई।" उसने मज़दूरों को मज़दूरी दी और एक-एक पोटली में रोटी-सब्ज़ी पकड़ा दी फिर फाटक बंद कर लिया।माधव फाटक के बाहर बैठ गया। उसने देखा—एक-एक कर सब मजदूर अंधेरे में गुम हो गए। सन्नाटा फैल गया। थोड़ी देर के लिए उसका दर्द दब गया था, अब फिर लौट आया—और इस बार ज़्यादा भारी होकर। वह सड़क पर आती-जाती भीड़ को देखता रहा। उसे लगता था कि अगर वह किसी एक आदमी को रोक ले, बस एक को -तो शायद उसका सीना हल्का हो जाए। पर कोई नहीं रुका। सबको अपनी-अपनी जल्दी थी।तभी उसने एक फटे कपड़ों वाला भिखारी देखा। वह पास गया। "वक्त क्या हुआ है, भाई?" उसने पूछा।"नौ से ऊपर हो गए हैं," भिखारी बोला। "किसका इंतज़ार कर रहे हो?""आज खेत में काम किया था," माधव बोला। "टांगे और कमर अकड़ गई हैं। सुबह से कुछ खाया भी नहीं।""किस गांव के हो?""परतापुर।""बहुत दूर है। इस हालत में कैसे पहुंचोगे?"माधव ने पोटली खोली। "मेरे पास रोटी है। एक खा लो।""तुमने कुछ नहीं खाया, तुम खा लो," भिखारी बोला।"नहीं दोस्त, एक रोटी तुम खा लो।"भिखारी ने रोटी ली। "भगवान तुम्हारा भला करे।"माधव ने धीरे से कहा, "मेरा बेटा… अब इस दुनिया में नहीं रहा। इसी हफ्ते… अस्पताल में…" वह रुक गया, भिखारी के चेहरे पर असर ढूंढने लगा।पर भिखारी उठ खड़ा हुआ। "मेरे धंधे का समय हो गया।" वह चला गया।आधे पेट और पूरे दुख के साथ माधव लंगड़ाता हुआ सूनी डगर पर चल पड़ा। अब उसे किसी को कुछ सुनाना नहीं था। उसे समझ आ गया था- "दुनिया में कोई दर्द नहीं सुनता।" रात और गहरी हो गई। उसकी परछाई उसके साथ-साथ चलती रही -लंबी, थकी हुई और चुप।348 ए, फाइक एंक्लेव, फेस 2, पीलीभीत बायपास, बरेली (उ प्र) 243006 मो : 9027982074 ईमेल wajidhusain963@gmail.com