main dada dadi ki ladli - 5 in Hindi Biography by sapna books and stories PDF | मैं दादा-दादी की लाड़ली - 5

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मैं दादा-दादी की लाड़ली - 5


यह “मैं दादा-दादी की लाडली” की कहानी का पाँचवाँ अध्याय है।
बचपन की मासूमियत और सपनों के बाद,
अब मेरी ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर आ गई थी
जहाँ मुझे अपने लिए नहीं,
बल्कि हालातों के आगे झुककर फैसला लेना पड़ा।

घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी।
मैंने बहुत मना किया, बहुत समझाया, लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी।
जिस लड़के से मेरी शादी होनी थी, उससे मैंने पहले कभी बात तक नहीं की थी।
घरवालों ने बस इतना कहा —
“शादी के बाद सब ठीक हो जाता है।”

फिर भी… शादी हो गई।

शादी के बाद धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि
हर रिश्ता सिर्फ नाम का नहीं होता, उसे निभाने के लिए सम्मान और समझ जरूरी होती है।
मेरे पति को बहुत गुस्सा आता था।
बात-बात पर चिल्लाना, छोटी-छोटी बातों पर अपमान करना जैसे उनकी आदत थी।
मैं कोशिश करती थी सब ठीक रहे, पर अंदर ही अंदर टूटती जा रही थी।


जब मेरी तबीयत खराब होती,
तो वे मुझे अस्पताल तक नहीं ले जाते थे।
हर बार मेरे मम्मी-पापा ही मुझे डॉक्टर के पास लेकर जाते थे।
मैं पत्नी तो थी,
पर खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती थी

इसी बीच मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ।
घर में यह खबर सुनकर सब खुश थे।
मुझे भी लगा शायद अब सब बदल जाएगा।
मेरे पति भी उस समय खुश दिखाई दिए।

लेकिन एक दिन अचानक उन्होंने कहा —

“यह बच्चा गिरा दो, मुझे नहीं चाहिए।”

उनकी यह बात सुनकर जैसे मेरी दुनिया रुक गई।
लोग कहते हैं कि गर्भवती स्त्री को परेशान नहीं करना चाहिए, पाप लगता है।
पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था।
वे मुझसे गालियों में बात करते, मुझे मानसिक रूप से तोड़ते रहते।
मैं रातों में चुपचाप रोती,
पर अपने पेट पर हाथ रखकर खुद से वादा करती —
मैं अपने बच्चे को हर हाल में जन्म दूँगी।

समय बीतता गया और मेरा बेटा हुआ।
उसे पहली बार गोद में लिया तो लगा जैसे मेरी जिंदगी को जीने का कारण मिल गया हो।
वह मासूमियत से कहता —
“भगवान ने मुझे मेरी माँ के लिए भेजा है।”

लेकिन उसके जन्म के बाद भी हालात आसान नहीं हुए।
मेरे पति का गुस्सा कम नहीं हुआ।
वे उसे खिलौनों से खेलने नहीं देते और कहते —
“हर रोज बीमार रहता है।”

एक बार मेरे बेटे को फूड पॉयज़निंग हो गई।
हम अस्पताल जा रहे थे,
लेकिन रास्ते भर भी उनका गुस्सा कम नहीं हुआ।
उसी दिन मैंने अपने दिल में फैसला कर लिया —


👉 जो मेरे बेटे का नहीं हो सकता,
वह मेरा भी नहीं हो सकता।

तलाक की बात पर सबने मुझे रोका।
“लोग क्या कहेंगे?”
“समाज में इज़्ज़त का क्या होगा?”

लेकिन मेरी माँ और बहन मेरे साथ खड़ी रहीं।

आख़िरकार तलाक हो गया।

तीन साल मैं अपने मायके में रही।
मेरा बेटा खुश था।
घर में शांति थी,
पर सवाल फिर भी उठते थे।

मैं चुप रहती थी।
अपना दर्द किसी से नहीं कहती थी।

बस अपने बेटे को समझाती थी कि मजबूत बनना क्यों जरूरी है।

मैं घर में थी, पर पूरी तरह आज़ाद नहीं।
फिर भी मैंने सीख लिया —
मेरी खामोशी मेरी कमजोरी नहीं,
मेरी ताकत है।

आज मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि मजबूरी की शादी ने मुझे तोड़ा जरूर, लेकिन माँ बनने ने मुझे फिर से बनाया। मेरे बेटे ने मुझे जीना सिखाया, मजबूत बनना सिखाया। अब मैं किसी की दया नहीं, अपनी हिम्मत पर खड़ी हूँ। मैं दादा-दादी की लाडली थी… और अब अपने बेटे की सबसे बड़ी ताकत हूँ। 💛