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अहमदाबाद में जहाँ अनामिका का घर था, उसकी थोड़ी दूरी पर ही दूसरे ब्लॉक में ही तो गढ़वाली पूर्णिमा भाभी रहतीं थीं | उनके पास एक बेटा और एक बेटी थे, दोनों में मुश्किल से डेढ़ साल का फ़र्क ! भाभी का जब मन होता या उन्हें किसी काम से बाहर जाना होता, अनामिका के पास बच्चों को छोड़ जातीं | उनकी सास भी उनके ही साथ रहती थीं और भाईसाहब, यानि उनके पति विवेक की तरह ही टूर पर रहते | सो, दोनों सरल परिवारों में खूब जमने लगी जिससे आस-पास के लोगों की दृष्टि में चिंता पसरने लगी |होता है न –‘भाई तुम क्यों दुबले ?’ ’सहर के अंदेसे से----‘ लेकिन इन दोनों परिवारों पर कहाँ कोई फ़र्क पड़ा !!
समय के व्यतीत हो जाने का पता ही नहीं चला, अनामिका भी दो प्यारे बच्चों की माँ बन गई और गृहस्थी में रम गई |समय की गाड़ी कितनी तीव्रता से भागती चली जाती है, पता ही नहीं चलता कौन-कौन से स्टेशनों पर गाड़ी की रफ़्तार कम हुई या वह कौन सा स्टेशन था जहाँ गाड़ी रुकी और चाय-समोसे का स्वाद लिया गया !
पूर्णिमा भाभी का परिवार कुछ वर्षों बाद वहाँ से गुजरात के किसी दूसरे शहर में चला गया | वे और अनामिका एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ जुड़ी थीं | कोई परेशानी होती, दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़ी हो जातीं | बच्चों में भी थोड़ा ही अन्तर था, वे भी साथ खेलने लगे थे |हुआ कुछ ऐसा कि स्कूल में भी एक ही में प्रवेश मिल गया तब परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के और भी करीब आ गए | उनके वहाँ से जाने के बाद अनामिका एकाकी सी रह गई |
भाभी को अक्सर पति के बाहर रहने और परिवार बड़ा होने के कारण कभी-कभार पैसे की कमी हो जाती | वे उससे पूछतीं ;
“कुछ रुपये हैं क्या ?”
“हाँ।भाभी बताइए कितने ----?”
ज़रूरत के अनुसार वे एक-दूसरे से रुपये, सामान लेती-देती रहतीं |खाना बनाकर तो अक्सर भेजती ही रहतीं पूर्णिमा भाभी जबकि अनामिका को तो कुछ खास आता ही नहीं था | पूर्णिमा भाभी की ‘डालडा रेसिपी-बुक’ से वह कुछ न कुछ बनाने की कोशिश करती | सबसे पहले खुद चखकर देखती, अच्छा बना तो विवेक के लिए रख लिया वर्ना—उन दिनों फेंकने में भी देर न लगाती | जैसे ही कोई चीज़ फेंकती तुरंत नानी सामने आ खड़ी होतीं ;
“अन्न का एक-एक दाना बड़ा कीमती होता है, देखो उन लोगों को जिन्हें दो टाइम भर पेट खाने को भी नहीं मिलता –बेटा ! कभी अन्न का अपमान मत करना --” वह ठिठक जाती पर उस समय उसके पास और कोई हल न होता उस खराब बने हुए खाने को छिपाने का –उसने बहुत जल्दी ही कम से कम इतना बनाना तो सीख ही लिया था कि उसे फेंकना न पड़े और फिर माँ अन्नपूर्णा ने उसे जल्दी ही अच्छा खाना बनाना सिखा दिया था कि लोग उसकी तारीफ़ करते न थकते | उसने सच में अपनी अनुपस्थित नानी और माँ अन्नपूर्णा को हृदय से धन्यवाद दिया था |
पूर्णिमा भाभी उसकी सबसे बड़ी सहयोगी रही थीं, आना नामक मिट्टी के लौंदे को उन्होंने अच्छा-ख़ासा सुंदर आकार दे दिया था कि उसे खुद पर ही आश्चर्य होता कि यह व्यंजन उसने ही बनाया है ? वह भाभी से भी अपने मन की बात साझा करती और भाभी प्यार से अक टपली उसके सिर पर लगाकर कहतीं ;
“पगली कहीं की ---!” वे लाड़ में आकर उसका मुख चूम लेतीं |
आज भी उसे एक किस्सा याद आता है तो भाभी की याद में वह पिघलने लगती है |
एक बार भाभी को सौ रुपयों की ज़रूरत पड़ी | उन दिनों सौ रुपयों की क़ीमत होती थी |अवसर की बात है, अनामिका के पास छिपे हुए रहते ही थे , काम चल गया| जब पूर्णिमा भाभी लौटाने आईं तो बोलीं ;
“आना ! मैं तुझे 95 रुपए दूँगी, पूरे सौ नहीं -----“
अनामिका की समझ में नहीं आया, ऐसी जल्दी क्या थी---बाद में दे देतीं ----“उसने मन में सोचा |
भाभी उसका चेहरा देखकर हँस पड़ीं ;
“नहीं रे, मैं तुझे पाँच रुपए लौटाने ही नहीं वाली----“
फिर भी वह कुछ नहीं समझी, भला बताओ किसीकी लौटाने की नीयत न होती तो सारे ही न लौटातीं ---ये पाँच रुपए ? एक प्रश्न सा उसके दिमाग में टहलने लगा ;
“अरे! बुद्धू ! तेरे रुपए मुझे फलते बहुत हैं ---ये खर्च नहीं करूँगी , अपनी अलमारी में रखूंगी हमेशा --- “
इस तरह जब वे वहाँ से छोड़कर गईं उससे लिया हुआ वो पाँच रुपए का नोट अपने साथ एक ख़ज़ाने की तरह ले गईं और उसे अकेलापन गिफ़्ट कर गईं |
कितनी अकेली पड़ गई थी वह ! जैसे विवाह होने पर वह मायके को छोड़कर आई थी, कुछ ऐसी ही संवेदना ने पूर्णिमा भाभी के जाने के बाद उसे घेर लिया | जब तक वे उसके साथ थीं, तब तक यह अकेलापन उसे काटता नहीं था लेकिन अब उसकी आँखें कभी भी नम हो जातीं और उसे अनुज के पास खींचकर ले जातीं |
अनुज अहमदाबाद आता, उसे पूर्णिमा भाभी का ममता, स्नेह मिलता और ऐसा लगता कि उसकी दो बड़ी बहनें अहमदाबाद में रहती हैं | हर दिन कोई न कोई नया व्यंजन बनाकर वे अनुज के लिए भेजतीं |
“हाँ, आना दीदी को यहीं बड़ी बहन मिल गई हैं तभी मुझे चिट्ठी लिखनी कम कर दी है –“ शिकायतों का पुलिंदा खोलना तो उसका शगल था, शादी से पहले और बाद में भी !
“अच्छा !तू जो उनके हाथ के बने पकवान चबाकर डकार लेता रहता है, तेरी कुछ नहीं हैं वो ?”आना उसको चिढ़ाती |
“क्यों नहीं ?बड़ी बहन हैं, तभी तो रोज़ मेरे लिए कुछ न कुछ बनाकर भेजती रहती हैं --!”
“तो—मेरे से क्यों चिढ़ता है ?“
“दीदी ! तुम तो उनके पास ही रहती हो न और आपके पास पूनो दीदी हैं तो मेरी परवाह भी नहीं करतीं –मैं ही अकेला पड़ जाता हूँ वहाँ !इसीलिए तो मुझे भूल जाती हो तुम, चिट्ठी भी नहीं लिखतीं ”वह शिकायत करता ही रहता |उसने लाड़ में आकर पूर्णिमा भाभी को पूनो दीदी नामकरण कर दिया था |हर गर्मी की छुट्टियों में वह अहमदाबाद टपक पड़ता |
पूर्णिमा भाभी उसे अपने आँचल में बच्चे की तरह छिपा लेतीं –
“ना –रे, मेरा छोटा सा भइलु ! तू अपनी आना दीदी के पास मत आया कर, सीधे मेरे पास ही आ जाया कर न ! भाई, आना गलत बात है, तू इसे जल्दी-जल्दी चिट्ठी लिखा कर –मेरे बेटा !मेरा बच्चू –देखना तेरी चिट्ठी की बाट जोहते-जोहते धूप में खड़ा-खड़ा श्याम हो गया, मेरा श्वेतांग भी --“ सब खिलखिल दाँत फाड़ देते |
पूर्णिमा भाभी सच में इतना अकेला कर गईं थीं आना को कि अब वे और अनुज उसे बहुत याद आते | फिर अनुज भी गंभीरता से अपने भविष्य के प्रति सचेत हो गया |प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ तो उसे रुड़की विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग में प्रवेश मिल गया |
अनामिका छोटे भाई की तरक्की देखकर फूली न समाती | सप्ताह में एक-दो बार तो बात हो ही जाती घर पर|अनुज के बारे में जानकर आना का चेहरा खिल जाता | उसके आने के बाद कितना गंभीर हो गया था अनुज ! उसने रुड़की विश्वविद्यालय में भी टॉप किया और उसे स्कॉलरशिप पर विदेश के अच्छे विश्वविद्यालय में प्रवेश मिल गया था |
छोटे अनुज ने विदेश में जाकर जैसे अपनी सारी योग्यता ‘कैश’कर ली थी जैसे किसी लॉकर में चाबी से बंद करके रखी हुईं थी उसकी वो ख़ासियत भारत में और विदेश में उसे उस लॉकर की कुंजी मिल गई थी | वहीं उसे ख्याति मिली जो उसके अपने शहर की, अपने स्कूल की और अपने ही माता-पिता के मित्र-परिवार की लड़की थी|भारत में तो एक साथ पढ़ने पर भी दूर–दूर तक कोई गुमान तक नहीं था कि भविष्य के उजाले एक-दूसरे की आँखों में सँजोए हैं प्रारब्ध ने !एक ही शहर के रहने वाले, शिक्षण-क्षेत्र से जुड़े परिवार की बेटी से जब अनुज का संबंध जुड़ा, पूरा परिवार उत्साहित था | प्रारब्ध ही था, बालपन में एक साथ पढ़ने वाले किशोरों के बीच खूब छीना झपटी होती, लड़ाई होती | युवा होने पर उन के बीच अपने देश की धरती पर नहीं विदेश की धरती पर प्रेम का पुष्प खिला था |ये समय भी बहुत बड़ा मदारी होता है, सबको अपनी डोरी में बाँध नचाता रहता है, सबकी नकेल कसे रहता है |
विवाह के बाद जब अनुज ख्याति के साथ बहन के पास आया तब अनामिका के मन में एक बार फिर ज़ोर से तूफ़ान सा उठा |बताओ, ख्याति नहीं है उन जैसे परिवार की ही बेटी ! उसे देखो और खुद को ---एक बार फिर से कुछ करने के लिए उसका मन कुलबुलाने लगा | ख्याति भी तो एक उच्च शिक्षित -परिवार से थी जिसने दिल्ली जाकर पढ़ाई की थी और एक ‘मैं’ ---वह सोचती ---
पूर्णिमा भाभी के वहाँ रहने तक फिर भी वह इतनी गंभीरता से अपने बारे में नहीं सोचती थी |उनके वहाँ से जाने के बाद अकेलेपन का सन्नाटा जैसे उसके मन में भर उठा था |वह स्वयं को खोखला सा महसूस करने लगी थी |
उन्हीं दिनों माँ जी (सासु माँ )का चले जाना उसे और भी अकेला कर गया |वो तो संभव था नहीं कि सामने वाली बिल्डिंग की औरतों की तरह किसी न किसी बेकार की जिरह में घुसकर अपनेको तीसमारखाँ घोषित करती वह !