Prem n Haat Bikaay - 6 in Hindi Love Stories by Pranava Bharti books and stories PDF | प्रेम न हाट बिकाय - भाग 6

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 6

6-

           गीता सिंह ने कुछ चमचियों को इक्क्ठा करके अपना एक ग्रुप बनाया हुआ था जिसमें उनकी हमउम्र सहेलियाँ थीं जो उनकी जैसी ही मानसिकता को ओढ़-बिछाकर अपने शिक्षित होने का ठप्पा भी क्या--- अपने गलों में बोर्ड लटकाए घूमती रहती थीं | 

" तुमसे  ही बात कर रही हूँ, बच्चों के स्कूल जाने के बाद कौनसे धंधे में बिज़ी रहती हो?" अनामिका के माथे पर बल पड़ गए—धंधा ! इस औरत को बात करने का सलीका नहीं है, वह जानती थी लेकिन इतनी बदतमीज़ !आना का दिमाग ठनक गया लेकिन उसने सोचा ऐसे इंसान से क्या सिर मारना और चुपचाप बिना कुछ कहे उसकी बात सुनती रही |

“अरे !मेरा मतलब है ऐसे क्या करती रहती हो ?” 

       वो किसीको भी टौंट मारने से चूकती नहीं थीं | इससे पहले का वाक्य तो बड़ी भलमनसाहत और सभ्यता से पूछा गया था अब इतनी जल्दी सुर बदल गया ! ---वैसे, वह यहाँ आने के बाद गीता सिंह की फूहड़ भाषा से परिचित तो हो ही चुकी थी |पड़ौस हो, सब्ज़ी-भाजी वाले हों, घरेलू नौकर हों या उसके पति के कोई चपरासी आदि ---कोई उसकी अभद्र धारदार कटार  जैसी ज़बान से बचकर नहीं निकल पाता  था |पूर्णिमा भाभी के साथ विवेक ने भी उसे समझा दिया था कि बेशक वह उत्तर-प्रदेश की है लेकिन सच में वह ‘उल्टे प्रदेश’ की है, उसे गीता के साथ दोस्ती रखकर पचड़े में पड़ने की ज़रूरत नहीं है | सो, वह गीता से सदा एलर्ट ही रही  ---- 

"जी, मेरे पास समय नहीं है -----" आना यानि अनामिका ने झिझकते हुए कहा | 

 "क्यूँ, ऐसी क्या समाज सेवा कररी हो ---" अपनी असलियत पर उतरकर उन्होंने फिर से उसकी ओर शब्दों की कटार फेंक मारी| 

       आना मुस्कुरा दी, जानती थी वह कि गीता  से तो बस ऊपर वाला ही बचाए | कोई भरोसा नहीं कब अपनी असलियत पर उतर आए | 

"नहीं, समाज सेवा क्या करूँगी, मैंने विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया है ---" उसने यह बात बड़े सहमते हुए बताई थी, जानती थी कोई तो तीर चलेगा | 

"क्यूँ ---अब पढ़ोगी ? बुड्ढी घोड़ी, लाल लगाम ---!" गीता  ने दाँत फाड़े और उसका साथ दिया उसकी ख़ास चमची कल्पना ने जिसे गीता ‘कली’ कहकर पुकारती थी, मन भर की कली थी वह जो सदा उसके साथ-साथ ही फिरकनी बनी घूमती रहती थी | गीता के लिए सुबह को साँझ, तो वही बढ़िया ---उजाले को अँधेरा तो ‘जी हाँ’ और तो और दुर्गंध को भी सुगंध तो बिलकुल ‘जी’ ! यानि वह आँखों से गांधारी थी तो कानों से बहरी भी थी | गीता अकड़कर चलती, वह उसके पीछे -पीछे ---!

     बस, गीता महारानी जी के गाउन की ही कमी थी वरना कल्पना उसका गाउन भी पीछे से पकड़कर चलती |अनामिका कल्पना करती और एक मुस्कान उसके चेहरे पर ठिठकने लगती जिसे वह बड़ी कुशलता से गीता व उसकी चमची से छिपा लेती |   

    पर आज गीता का व्यंग्य सुनकर अनामिका  की आँखों में पानी भर आया जिसे उसने बड़ी खूबसूरती से छिपा लिया | 

"आप तो एम.ए हैं, सोचती हूँ मैं भी एम.ए कर लूँ तो आपके साथ खड़ी होने लायक बन जाऊँगी |"

"हाँ, वो तो मैं हूँ ---" एम.ए उनके चेहरे व शरीर पर ढीठ बनकर चिपक गया | 
"अच्छी लगोगी इस उमर में बच्चों के साथ बैठकर पढ़ने  का ढोंग करती ---?" फिर जैसे उसे हिकारत से झटकती  बोलीं -- 

"हमें क्या, जैसे करो --रहो अकेली, एकलखोरी ------" वह मुँह मटकाकर सीढ़ियाँ उतर गई, उसके पीछे-पीछे कल्पना जी यानि गीता की कली भी अपनी थुलथुली कमर मटकाते हुए चल दीं | 

      कैसे होते हैं लोग ? आना सोचने लगी, कैसे ऎसी बातें बोल जाते हैं किसी के भी लिए!     चुप्पी साध लेना उसकी आदत थी और उस चुप्पी  के सहारे वह बहुत से झंझटों से मुक्ति पा जाती थी | नानी माँ कहा करती थीं ;"एक चुप, सौ को हरावै |"
    आना को उन दोनों महिलाओं के पतियों के बेचारगी भरे चेहरे दिखाई देने लगे ---कैसे सहन करते होंगे वे इन गंवार पत्नियों को ? फिर उसने अपने सिर को एक झटका दिया ---कमाल है ! वह क्यों इनके बीच कूदने की कोशिश कर रही है ? वह क्यों बेकार ही अपने अकल के घोड़े दौड़ाए ??