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बीस वर्ष की थी जब विवाह हुआ था अनामिका का | एक साल में बेटा दृष्टांत, उसके लगभग डेढ़ साल बाद बिटिया दृष्टि का जन्म हो गया |लीजिए, हो गई गृहस्थी भी पूरी !
छुटकी यानि दृष्टि के जन्म के समय जब सबसे बड़ी व सबसे छोटी नन्द भाभी की डिलीवरी पर आईं, छोटी ने तो हँसते-हँसते कह भी दिया था ;
“भाभी जी, हमारी चचिया सास कह रही थीं कि बड़ी लिखी-पढ़ी और पढ़े-लिखे परिवार की हैं तुम्हारी भाभी ---फिर हर साल कलैंडर क्यों छाप रही हैं ?”
वह खिसिया गई थी, क्या उत्तर देती उनकी चचिया सास के प्रश्न का ! कैसे होते हैं लोग भी, उसने सोचा था लेकिन तहज़ीब की तालू उसकी ज़बान से चिपकी रह गई | उसने पूर्णिमा भाभी से इस बात का ज़िक्र किया था और उन्होंने हँसकर कहा ;
“एक कान से सुन, दूसरे से निकाल दे ---“और उसे रूई के दो बड़े-बड़े गोले पकड़ा दिए थे |
“ये क्या है भाभी ?”आना ने इधर-उधर देखकर पूछा था | कहीं सास या नन्द कुछ सुन लें तो उन्हें लगेगा कि चुगली कर रही थी जबकि ऐसा तो कुछ था नहीं | केवल अपने मन में फँसी फाँस उसने पूर्णिमा भाभी के सामने निकाली थी | दीदी से तो कुछ कह नहीं सकती थी |वैसे दीदी के मुँह से भी तो उनकी चचिया सास की बात बस कुछ यूँ ही निकल गई थी, बाद में उन्होंने ‘सॉरी’भी महसूस किया था—बात तो तीर सी निकल ही गई थी और अनामिका के दिल में चुभ भी गई थी | कम उम्र में विवेक की भी तो कमी हो जाती है, सो दुखी हो गई थी अनामिका |
“जब कोई कुछ कहे तो कान में लगा लेना ---जी नहीं दुखेगा ---“फिर उसके सिर पर प्यार से टपली मारकर बड़ी प्यारी सी मुस्कुरा दी थी पूर्णिमा भाभी |
अनामिका की बेटी सर्जरी से पैदा हुई थी, जब छोटी दीदी यहाँ आईं, वे भी गर्भ से थीं | जब तक वे यहाँ पहुँचीं थीं, अनामिका की बिटिया ने संसार में आँखें खोल लीं थीं |उसकी सर्जरी का पता चलते ही, दीदी को घबराहट में ब्लीडिंग शुरू हो गई | उन दिनों सर्जरी से डिलीवरी होना बहुत बड़ी व खतरनाक बात मानी जाती थी |बेचारी दीदी ! उनका गर्भ ख़राब हो गया था, उनका भी चैक-अप और इलाज़ हुआ | विवेक ने उसी डॉक्टर से बहन का ठीक से इलाज़ करवाया जहाँ अनामिका की डिलीवरी हुई थी लेकिन उनके गर्भ गिरने का सबके मन पर एक बोझ बना रहा |यहाँ तक सोच लिया गया था कि उनके गर्भ में ज़रूर बेटा ही था ।बेटी होती तो हिलती भी नहीं ! एक बिटिया तो पहले ही थी उनके | उस समय अनामिका को अपने माँ के परिवार और ससुराल के परिवार की सोच में फ़र्क महसूस हुआ था |अनदेखे बच्चे का अफ़सोस मना रही थीं सास और जो जीती-जागती बच्ची उसकी गोद में थी, उसके कारण ऐसा हुआ, वे मान रही थीं |उसकी बुद्धि में नहीं आया कि दोनों में क्या संबंध है ?पूर्णिमा भाभी ने उसके मन पर सांत्वना का लेप लगाया था |लगभग डेढ़ महीने बाद विवेक की दोनों बहनें वापिस चली गईं थीं |
शुरू-शुरू में तो बड़ी परेशान—!दोनों ऊपर-नीचे के बच्चों को पालने में अनामिका की हालत पस्त हो जाती ! दोनों बच्चे एक से ही काम करते | एक ने दूध की बॉटल फेंकी तो दूसरी ने भी उसकी नकल कर डाली | पूर्णिमा भाभी व एक गुजराती आया की सहायता से किसी तरह अनामिका अपनी गृहस्थी मैनेज कर सकी थी |
कुछ वर्षों बाद शर्मा परिवार यानि पूर्णिमा भाभी के परिवार के स्थानांतरण तक उनके व उसके बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ रहे थे, उनके जाने के बाद वातावरण में बहुत उदासी भर उठी |बच्चे जैसे और बड़े होते गए, खालीपन काटने लगा | पुस्तकों की, कॉलेज की, माता-पिता की, सहेलियों की याद आने लगी |विवेक की व्यस्तता और बढ़ती ही जा रही थी, उसे अकेले ही सब संभालना पड़ता |
अनामिका जब अकेली होती तब अक़्सर गुनगुनाती रहती ---
'याद न जाए बीते दिनों की, जाके न आएँ जो दिन दिल क्यूँ बुलाए उन्हें, दिल क्यूँ बुलाए--, बहुत सी बार सुना विवेक ने फिर बोल ही तो पड़े ---
"क्यों भई ! कब तक याद करोगी --?देख लो अनुज अपनी दीदी को --"उन दिनों अनुज सपत्नीक अहमदाबाद आया हुआ था |
"सच, आज लगता है --माँ-पापा हमारी पढ़ाई को लेकर कितनी चिंता करते थे और हम बेशर्म ---अब वो दिन याद आते हैं आना दी ---"अनुज भी पिछले बरख टटोलने लगा, ऐसे समय में कभी भी वह उदास हो उठती थी |
"अरे ! फिर वापिस आएँगे दिन ---तुम कोशिश कर रही हो न ! ले तो रही हो एडमीशन !"
“वाह, दीदी ! बहुत बढ़िया –अरे ! पढ़ाई की कोई उम्र होती है क्या ?बहुत अच्छा !”ख्याति ने भी उसे प्रोत्साहित किया और उसे लगने लगा कि अब तो बस ----‘लेकिन –पर-परंतु’ राह में रोड़े अटकाए खड़े थे |
बहुत घबरा रही थी अनामिका जब उसने इतने वर्षों बाद विद्यापीठ में प्रवेश लिया| उसके पति ने उसकी इच्छाओं को सदा मान दिया था | वे जानते थे कि विवाह से पूर्व उनकी पत्नी को पढ़ने में कोई बहुत रुचि नहीं थी | आना ने पहले ही उन्हें बताया था किन्तु अब न जाने क्यों वह अपने पीछे छूटे हुए दिनों की याद में अनमनी सी हो जाती थी |
"कितना चाहते थे मम्मी-पापा ---मैं खूब पढ़ूँ, कम से कम पीएच. डी कर लूँ, पर ध्यान ही नहीं देते थे हम पढ़ाई पर ---" वह बार-बार उदास हो उठती |
"एक उम्र होती है आना , नहीं समझ पाते कुछ बच्चे सही समय में | अब जो हो गया, वो वापिस तो आ नहीं सकता | हाँ, अब अगर पढ़ना शुरू करो तो कर सकती हो ---बच्चे बड़े हो गए हैं, अब फ़्री हो ----"
पतियों को लगता है, उनकी पत्नियाँ बच्चों के बड़े होने के बाद फ़्री हो जाती हैं जैसे घोड़े बेचकर सोना ही उनका काम रह जाता है |कमाल है न ! पतियों को भला क्या पता बच्चे माँ के सामने हमेशा बच्चे ही बने रहते हैं | वे पिता व दूसरे लोगों के सामने बड़े बन जाते हैं ---पर --माँ के सामने ---!
वह विवेक के सामने चुप ही बनी रही, सोचती हुई अपने बारे में कि सच में, बहुत समय सबको दिया --अब भी देना ही है, खुद को भी दे ले न थोड़ा समय ! हर्ज़ क्या है ?
ख़ैर महिलाएं फ़्री तो कहाँ हो पाती हैं अपनी घर-गृहस्थी से, यह तो दिल बहलाने की बात है किन्तु न जाने क्या सोचकर अनामिका ने एडमिशन ले ही लिया |कितनी घबराई हुई थी वह ! सब उससे छोटे और वह ---दो किशोर होते बच्चों की माँ ! विवेक का ही संबल था उसे वर्ना मुश्किल था फिर से पढ़ाई करना |