Sadiyo se Tum Meri - 3 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | सदियों से तुम मेरी - 3

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सदियों से तुम मेरी - 3

कॉलेज का दिन सामान्य रूप से खत्म हो चुका था। सूरज ढलने लगा था और आसमान में हल्की नारंगी आभा फैल रही थी। स्टूडेंट्स अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। दिव्या भी अपनी किताबें बैग में रखकर कॉलेज के गेट की ओर बढ़ रही थी। नेहा किसी काम से रुक गई थी, इसलिए आज दिव्या को अकेले ही घर जाना था।
कॉलेज से उसके घर तक का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था, लेकिन रास्ते में एक पुराना पार्क पड़ता था, जहाँ शाम के समय अक्सर सन्नाटा छा जाता था। दिव्या आमतौर पर उस रास्ते से जल्दी-जल्दी निकल जाती थी। आज भी वह उसी रास्ते से गुजर रही थी, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी बेचैनी थी। हवा में अचानक ठंडक बढ़ गई थी, जबकि मौसम सामान्य था।
दिव्या ने अपने कदम तेज कर दिए। तभी उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई चल रहा हो। उसने पलटकर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने खुद को समझाया कि शायद उसका भ्रम होगा और वह आगे बढ़ने लगी। जैसे ही वह पार्क के बीच वाले रास्ते पर पहुँची, अचानक चारों ओर अजीब सा सन्नाटा फैल गया। पक्षियों की आवाज तक बंद हो चुकी थी।
दिव्या के कदम अपने आप धीमे हो गए। तभी अचानक सामने की लाइटें झिलमिलाने लगीं। हवा का झोंका आया और पेड़ों की टहनियाँ तेज़ी से हिलने लगीं। दिव्या का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे कोई अदृश्य नजर उसे घूर रही हो।
अचानक उसके सामने जमीन पर काली धुंध फैलने लगी। धुंध धीरे-धीरे आकार लेने लगी और उसमें से एक छायादार आकृति उभरने लगी। वह आकृति इंसान जैसी थी, लेकिन उसका चेहरा पूरी तरह अंधकार से ढका हुआ था। उसकी आँखों की जगह दो लाल चमकते बिंदु दिखाई दे रहे थे।
दिव्या डर के मारे पीछे हटने लगी। उसकी आवाज गले में ही अटक गई थी। वह दौड़कर भागना चाहती थी, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे। वह आकृति धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ने लगी। उसके चारों ओर की हवा भारी हो गई थी।
अचानक वह आकृति दिव्या के बेहद करीब आ गई। उसके आसपास काली ऊर्जा घूमने लगी। दिव्या को लगा जैसे उसकी सांस रुक रही हो। उसके दिमाग में अजीब-अजीब दृश्य चमकने लगे—घना जंगल, चमकती झील, और किसी की दर्द भरी आवाज जो उसका नाम पुकार रही थी।
दिव्या की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
उसी क्षण हवा में तेज कंपन हुआ। पार्क की सूखी पत्तियाँ अचानक हवा में उड़ने लगीं। जमीन पर हल्की सुनहरी रोशनी फैलने लगी। जैसे ही वह छायादार आकृति दिव्या को छूने के लिए आगे बढ़ी, अचानक उसके सामने एक तेज रोशनी की दीवार खड़ी हो गई।
वह रोशनी धीरे-धीरे शांत हुई और उसके बीच से अर्जुन सामने आ गया।
अर्जुन की आँखों में अब सामान्य इंसान जैसी शांति नहीं थी। उनमें हल्की सुनहरी चमक उभर आई थी। उसका चेहरा बेहद गंभीर था। उसने दिव्या को अपने पीछे कर लिया और उस छायादार आकृति की ओर देखने लगा।
छाया ने गुस्से में एक अजीब सी आवाज निकाली और अचानक अर्जुन पर हमला कर दिया। काली ऊर्जा तेज़ी से उसकी ओर बढ़ी, लेकिन अर्जुन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। उसके हाथ से निकलती हल्की चमक ने उस ऊर्जा को रोक दिया।
अर्जुन जानता था कि वह ज्यादा देर तक अपनी असली शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकता, क्योंकि मानव लोक में उसकी शक्ति सीमित थी। लेकिन इस समय उसके लिए सबसे जरूरी दिव्या की सुरक्षा थी।
छाया ने फिर हमला किया। इस बार जमीन से काली लपटें उठने लगीं। अर्जुन ने तुरंत अपना संतुलन बनाए रखते हुए दिव्या को पीछे हटने का इशारा किया। लेकिन दिव्या अभी भी डर और हैरानी के कारण वहीं खड़ी थी।
अर्जुन ने तेजी से आगे बढ़कर दिव्या का हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया। जैसे ही वह उसके करीब आई, उसके आसपास हल्की सुरक्षा ऊर्जा फैल गई। दिव्या को अचानक ऐसा महसूस हुआ जैसे कोई परिचित सुरक्षा उसे घेर रही हो।
छाया अब और ज्यादा क्रोधित हो चुकी थी। उसने एक तेज़ गर्जना की और पूरा पार्क अंधेरे में डूबने लगा। अर्जुन की आँखों में इस बार गुस्सा झलक उठा। उसने धीरे से जमीन पर हाथ रखा और कुछ मंत्र जैसा बुदबुदाया।
अचानक जमीन से चमकती हुई रेखाएँ निकलने लगीं, जो उस छाया को घेरने लगीं। छाया कुछ पल तड़पती रही, फिर तेज़ धुएँ में बदलकर गायब हो गई। हवा का दबाव धीरे-धीरे कम हो गया और पार्क फिर सामान्य लगने लगा।
दिव्या अभी भी काँप रही थी। उसने अर्जुन की ओर देखा। उसकी साँसें तेज थीं और आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
“तुम… तुम यहाँ कैसे आए?” दिव्या ने मुश्किल से पूछा।
अर्जुन कुछ पल चुप रहा। वह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश कर रहा था। उसने शांत स्वर में कहा, “मैं यहीं पास से गुजर रहा था… और मैंने देखा कि तुम खतरे में हो।”
दिव्या को उसकी बात पूरी तरह समझ नहीं आई, लेकिन उसे इतना जरूर महसूस हुआ कि अगर अर्जुन समय पर नहीं आता तो शायद कुछ बहुत गलत हो सकता था।
“वो क्या था?” दिव्या की आवाज हल्की काँप रही थी।
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा। वह सच बताना चाहता था, लेकिन वह जानता था कि अभी समय सही नहीं था। उसने धीमे स्वर में कहा, “शायद तुम्हारा भ्रम था… या कोई जंगली जानवर। तुम डर गई थी।”
दिव्या ने सिर हिलाया, लेकिन उसके मन में सवाल अभी भी घूम रहे थे। उसे साफ महसूस हुआ था कि वह कोई साधारण चीज नहीं थी।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “अब तुम सुरक्षित हो। मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूँ।”
दिव्या ने पहली बार बिना झिझक उसकी ओर देखा और हल्के से सिर हिला दिया। दोनों साथ-साथ चलने लगे। रास्ते में दोनों चुप थे, लेकिन उनके बीच एक अजीब सा भरोसा जन्म लेने लगा था।
चलते-चलते दिव्या ने अचानक कहा, “जब तुम पास होते हो… मुझे पता नहीं क्यों, लेकिन डर कम हो जाता है।”
अर्जुन के कदम एक पल के लिए रुक गए। उसके चेहरे पर हल्की भावनाएँ उभरीं, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। उसने सिर्फ इतना कहा, “कभी-कभी… कुछ रिश्ते बिना जाने भी महसूस हो जाते हैं।”
दिव्या उसकी बात समझ नहीं पाई, लेकिन उसे उसकी आवाज में अजीब सी सच्चाई महसूस हुई।
घर के बाहर पहुँचकर दिव्या ने धन्यवाद कहा और अंदर चली गई। अर्जुन कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उसकी आँखों में राहत थी, लेकिन साथ ही चिंता भी।
उसे साफ महसूस हो चुका था कि अंधकार की शक्तियाँ दिव्या तक पहुँच चुकी हैं। इसका मतलब था कि समय बहुत कम बचा है।
दूसरी ओर, उसी खंडहर में काली ऊर्जा फिर से इकट्ठा हो रही थी। वह छाया फिर आकार ले रही थी, लेकिन इस बार उसकी आँखों में गुस्से के साथ एक खतरनाक मुस्कान भी थी।
उस अंधकार से धीमी आवाज निकली, जैसे कोई प्राचीन शत्रु जाग चुका हो और अब वह इस अधूरी कहानी को हमेशा के लिए खत्म करने की तैयारी कर रहा हो।
अर्जुन आसमान की ओर देखते हुए मन ही मन प्रण कर चुका था कि इस बार वह दिव्या को किसी भी कीमत पर खोने नहीं देगा, चाहे इसके लिए उसे अपनी असली पहचान उजागर क्यों न करनी पड़े।
अब नियति ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी थी।