Sadiyo se Tum Meri - 4 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | सदियों से तुम मेरी - 4

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सदियों से तुम मेरी - 4

अगली सुबह दिव्या देर तक सो नहीं पाई। रात की घटना बार-बार उसकी आँखों के सामने घूम रही थी। वह छाया, वह डर… और फिर अर्जुन का अचानक सामने आ जाना। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सबसे ज्यादा असर उस डर का था या उस सुरक्षा का, जो अर्जुन के पास होते ही उसे महसूस हुई थी।
कॉलेज पहुँचते ही उसने अर्जुन को ढूँढना चाहा, लेकिन खुद पर ही झुँझला गई। वह क्यों किसी नए स्टूडेंट को इतनी अहमियत दे रही थी? उसने खुद को सामान्य रखने की कोशिश की और क्लास में जाकर बैठ गई।
कुछ ही देर में अर्जुन क्लास में आया। आज उसका चेहरा पहले से ज्यादा शांत था, जैसे रात की घटना ने उसे और गंभीर बना दिया हो। उसकी नजरें अनायास ही दिव्या पर ठहर गईं। एक पल के लिए दोनों की आँखें मिलीं। दिव्या ने तुरंत नजरें फेर लीं, लेकिन उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।
अर्जुन अपनी सीट पर बैठ गया, लेकिन उसका मन कहीं और था। रात उसने नागलोक की शक्तियों से संकेत पाए थे। वह छाया कोई साधारण अंधकार नहीं थी। वह वही शक्ति थी, जिसने वर्षों पहले धरा को उससे छीन लिया था। फर्क बस इतना था कि इस बार अर्जुन तैयार था।
क्लास के बाद अर्जुन ने पहली बार पहल की। वह दिव्या के पास आया और धीमे स्वर में बोला, “क्या… आज तुम ठीक हो?”
दिव्या ने उसे देखा। उसकी आँखों में दिख रही चिंता उसे अजीब तरह से छू गई। “हाँ,” उसने कहा, “लेकिन कल जो हुआ… वो सामान्य नहीं था।”
अर्जुन कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “अगर मैं कहूँ कि तुम्हारी ज़िंदगी में कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें तुम अभी नहीं समझ पाओगी… तो क्या तुम मुझ पर भरोसा कर पाओगी?”
दिव्या ने उसे ध्यान से देखा। उसका दिल कह रहा था कि यह इंसान झूठ नहीं बोल रहा। “मुझे नहीं पता क्यों,” उसने धीरे से कहा, “लेकिन लगता है… मैं कर सकती हूँ।”
यह सुनकर अर्जुन के भीतर कुछ हिल गया। सदियों पहले धरा ने भी ठीक ऐसे ही उस पर भरोसा किया था।
उस दिन के बाद अर्जुन और दिव्या के बीच एक अजीब सा जुड़ाव बनने लगा। अर्जुन हर वक्त उसके आसपास रहता, लेकिन कभी ज़रूरत से ज़्यादा करीब नहीं आता। वह उसकी पसंद-नापसंद समझने लगा था। दिव्या को किताबें पसंद थीं, बारिश में भीगना अच्छा लगता था, और झील या नदी के पास बैठते ही वह अनजाने में शांत हो जाती थी।
एक शाम कॉलेज के बाद अर्जुन ने उससे पूछा, “क्या तुम्हें नदी के किनारे चलना पसंद है?”
दिव्या थोड़ी चौंकी। “हाँ… लेकिन तुम्हें कैसे पता?”
अर्जुन हल्का सा मुस्कुरा दिया। “बस अंदाज़ा।”
वे दोनों शहर से थोड़ी दूर बहती नदी के किनारे बैठे थे। सूरज ढल रहा था और पानी पर सुनहरी रोशनी फैल रही थी। दिव्या को वहाँ बैठते ही अजीब सी अपनापन महसूस हुआ, जैसे यह जगह उसकी अपनी हो।
“कभी-कभी,” दिव्या ने कहा, “मुझे लगता है कि मैं अधूरी हूँ… जैसे मेरा कोई हिस्सा कहीं खो गया हो।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में नमी आ गई, जिसे उसने तुरंत छुपा लिया। “शायद,” उसने धीरे से कहा, “कुछ चीज़ें समय पर मिलती हैं।”
दिव्या ने उसकी ओर देखा। “तुम हमेशा ऐसे क्यों बात करते हो, जैसे सब कुछ जानते हो?”
अर्जुन ने नदी की ओर देखते हुए जवाब दिया, “क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम्हें फिर कभी दर्द मिले।”
यह शब्द अर्जुन के मुँह से अपने आप निकल गए। दिव्या चुप हो गई। उसका दिल अचानक भारी हो गया, लेकिन अजीब तरह से सुरक्षित भी।
उस रात दिव्या को फिर सपना आया। इस बार सपना साफ था। वह एक झील के किनारे खड़ी थी, सामने अर्जुन जैसा ही कोई व्यक्ति, लेकिन उसके पीछे विशाल फन फैले हुए थे। उसकी आँखों में वही प्यार था, जो आज अर्जुन की आँखों में दिखता था।
नींद से जागते ही दिव्या की साँसें तेज़ थीं। “ये सब क्या है?” उसने खुद से पूछा।
दूसरी ओर अर्जुन नागलोक की सीमा पर खड़ा था। उसने स्वीकार कर लिया था कि वह अब अपने भावनाओं से भाग नहीं सकता। यह सिर्फ कर्तव्य नहीं था। यह प्रेम था — वही प्रेम, जो उसने धरा से किया था, और जो पुनर्जन्म के बाद भी कम नहीं हुआ था।
अर्जुन जानता था कि उसका प्यार साधारण नहीं हो सकता। वह दिव्या को छूकर अपना नहीं बना सकता था। उसका प्यार रक्षा में था, इंतज़ार में था, और उस दिन में था जब दिव्या खुद सच्चाई को स्वीकार कर सके।
अगले दिन कॉलेज में एक छोटी-सी घटना ने सब बदल दिया। एक स्टूडेंट सीढ़ियों से फिसल गई। भीड़ में अफरा-तफरी मच गई। दिव्या भी वहीं खड़ी थी। अचानक उसे लगा कि वही काली ठंडक फिर लौट आई है।
अर्जुन ने तुरंत उसे अपने पीछे कर लिया। किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन दिव्या ने साफ महसूस किया कि अर्जुन की मौजूदगी में वह ठंडक गायब हो गई।
उस पल दिव्या ने पहली बार महसूस किया कि अर्जुन सिर्फ एक दोस्त नहीं है। वह कुछ और है… बहुत गहरा।
शाम को जाते समय दिव्या ने खुद अर्जुन को रोका। “अगर कभी मुझे सच्चाई जाननी हो,” उसने कहा, “तो क्या तुम बताओगे?”
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा। “हाँ,” उसने दृढ़ता से कहा, “लेकिन सिर्फ तब, जब तुम खुद तैयार हो।”
दिव्या ने सिर हिलाया। उसके मन में डर था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा भरोसा।
दूर कहीं अंधकार में वह शक्ति फिर से हरकत में थी। उसे समझ आ गया था कि अर्जुन का प्यार ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है — और शायद उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
और अर्जुन… वह जानता था कि उसका प्यार अब परीक्षा में पड़ने वाला है।
क्योंकि सच्चा प्रेम सिर्फ मिलन नहीं माँगता — वह बलिदान भी माँगता है।
शाम का समय था। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और हल्की-हल्की हवा में ठंडक महसूस हो रही थी। कॉलेज के पीछे का वह पुराना बगीचा, जहाँ दोनों कभी अकेले बैठते थे, आज फिर उनका रास्ता बना। दिव्या अपनी किताबें बैग में रखते हुए वहाँ पहुँची, और अर्जुन पहले से ही वहीं खड़ा था, पेड़ के नीचे।
उसने जैसे ही दिव्या को देखा, उसकी आँखों में हल्की मुस्कान आ गई। दिव्या ने भी उसे देखा, और उसके दिल में अचानक वही अजीब गर्माहट दौड़ गई जो अर्जुन के पास होते ही हमेशा महसूस होती थी।
“तुम जल्दी आ गए,” दिव्या ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
“शायद,” अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा, “मैं हमेशा समय से पहले आ जाता हूँ… जहाँ तुम्हें इंतज़ार करना न पड़े।”
दिव्या की आँखें थोड़ी बड़ी हुईं। उसके मन में अचानक यह बात बस गई कि अर्जुन हमेशा उसके बारे में सोचता है।
वे दोनों धीरे-धीरे बगीचे में चलने लगे। पेड़ों की पत्तियाँ हवा में हिल रही थीं, और दूर कहीं पक्षियों की आवाज़ कम सुनाई दे रही थी।
अर्जुन ने हल्की साँस ली और अचानक रुक गया। उसने दिव्या की ओर देखा, उसकी आँखों में गंभीरता और आत्मविश्वास दोनों थे।
“दिव्या…” उसने कहा, “मुझे तुमसे कुछ कहना है। मैं अक्सर चुप रहता हूँ, क्योंकि मुझे लगता था कि सही समय का इंतज़ार करना चाहिए। लेकिन अब… अब और इंतज़ार नहीं कर सकता।”
दिव्या ने अपनी आँखें चौड़ी कर लीं। उसके दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “मैं… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। बहुत समय से। किसी शब्द में नहीं बाँध सकता कि कितना, लेकिन यह हमेशा सच रहा है। और मैं चाहता हूँ कि तुम जानो, तुम्हें हमेशा सुरक्षित और खुश देखने की मेरी ख्वाहिश ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।”
दिव्या के गाल हल्के लाल हो गए। उसने तुरंत कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द नहीं निकल रहे थे। उसकी आँखों में डर नहीं था—सिर्फ उस अजीब सी गर्माहट और अपनापन की भावना थी।
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराया। “और मैं यह नहीं चाहता कि तुम मेरे प्यार को… किसी तरह का बोझ समझो। मैं सिर्फ इतना चाहता हूँ कि तुम जानो… चाहे कुछ भी हो, मैं हमेशा तुम्हारे लिए यहाँ रहूँगा। तुम्हें किसी भी खतरे से बचाऊँगा। और जब तुम चाहोगी, मैं हमेशा तुम्हारा साथ दूँगा।”
दिव्या की आँखों में आँसू भर आए। वह अपनी भावनाओं को रोक नहीं पा रही थी। उसने धीरे से कहा, “तुम… सच में ऐसा महसूस करते हो?”
अर्जुन ने सिर हिलाया। “हाँ। और मैं अब और छिपा नहीं सकता। यह प्रेम… यह मेरे लिए सिर्फ शब्द नहीं है। यह हर कदम, हर सांस में है। और मैं इसे केवल तुम्हें देना चाहता हूँ। यह मेरा वादा है।”
दिव्या ने अपने हाथ धीरे से उसके हाथ पर रखा। उसकी साँसें अभी भी तेज थीं, लेकिन उसके भीतर वह विश्वास और सुरक्षा महसूस हुई, जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
“मैं… मुझे यह जानकर अच्छा लग रहा है,” उसने धीरे से कहा, “कि कोई है जो मेरे लिए ऐसा सोचता है।”
अर्जुन ने हल्का सा मुस्कुराया। उसकी आँखों में चमक थी, लेकिन उसके चेहरे पर वही गंभीरता भी बनी रही। “यह सिर्फ शुरुआत है,” उसने कहा। “हमारा रास्ता आसान नहीं होगा। लेकिन मैं तुम्हारे साथ हर मुश्किल का सामना करूंगा, चाहे कुछ भी हो।”
दिव्या ने फिर उसका हाथ कसकर पकड़ा। उसका दिल जान रहा था कि अर्जुन का प्यार सिर्फ शब्द नहीं—वह वादा था, सुरक्षा थी, और अटूट विश्वास था।
वो दोनों धीरे-धीरे बगीचे के बीच में खड़े रहे। आसमान में सूरज ढल चुका था और सिर्फ हल्की नीली आभा रह गई थी। चारों तरफ सन्नाटा था, लेकिन उनके लिए यह सन्नाटा शांति और अपनापन लेकर आया था।
अर्जुन ने मन ही मन महसूस किया कि यह पल — यह स्वीकार करना, यह प्यार साझा करना — अब उनका सबसे मजबूत हथियार है। और दिव्या की मुस्कान उसे वह ताकत दे रही थी, जो उसे आने वाले अंधकार और खतरे का सामना करने के लिए चाहिए थी।
अभी तक उसने उसे अपने अतीत, नागलोक या पुनर्जन्म के बारे में कुछ नहीं बताया। क्योंकि अभी उसके लिए सबसे जरूरी था कि दिव्या उस पर भरोसा करे, उसका प्यार महसूस करे।
और दिव्या… उसने अपने भीतर पहली बार महसूस किया कि अर्जुन सिर्फ कोई दोस्त नहीं—वह उसका हिस्सा है, उसकी सुरक्षा है और अब शायद उसका सबसे बड़ा सहारा भी।
बाहरी दुनिया चाहे कितनी भी खतरनाक क्यों न हो, इस बगीचे में, इस समय, उनका प्यार सिर्फ उनका था।