Mera Pyar - 5 in Hindi Love Stories by mamta books and stories PDF | मेरा प्यार - 5

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मेरा प्यार - 5

​एपिसोड 4: बेनाम लगाव और ऊँची दीवारें

​वक़्त पंख लगाकर उड़ रहा था। ज़ोया और अज़ीम के बीच अब वह हिचकिचाहट खत्म हो चुकी थी। वे अब हर शाम मिलते—कभी दरिया के किनारे, तो कभी शहर की पुरानी गलियों में। उनके बीच जो था, उसे 'प्यार' का नाम देना शायद जल्दबाज़ी होती, पर वह दोस्ती से कहीं बढ़कर था। वह एक ऐसा 'लगाव' था जहाँ दो रूहें एक-दूसरे की खामोशी में भी बात कर लेती थीं।

​ज़ोया को अज़ीम की सादगी से लगाव था, और अज़ीम को ज़ोया की उस मासूमियत से, जो उसके रईसाना लिबास के पीछे छुपी थी।

​एक सुकून भरी दोपहर:

एक दिन वे एक पुराने खंडहरनुमा बगीचे में बैठे थे। ज़ोया ने अज़ीम की तरफ देखते हुए कहा, "अज़ीम, मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी के साथ बिना बोले घंटों बैठना भी इतना सुकून दे सकता है।"

​अज़ीम ने मुस्कुराते हुए ज़मीन पर पड़ी एक सूखी पत्ती उठाई। "साहिबा, जब बातें दिल की हों, तो जुबान की ज़रूरत कम ही पड़ती है। आप मेरे लिए उस मुसाफिर जैसी हैं जो रास्ता तो भटक गया था, पर जिसने मुझे मेरी ही राह के फूल दिखा दिए।"

​पिता की एंट्री और कड़वाहट:

लेकिन यह सुकून ज़्यादा दिन नहीं टिकना था। ज़ोया के पिता, मिस्टर खन्ना, जो सिर्फ मुनाफे और रुतबे की भाषा समझते थे, उन्हें अपनी बेटी का एक मामूली दुकानदार के साथ 'लगाव' नागवार गुजरा। उनके लिए रिश्ते भी एक 'इन्वेस्टमेंट' थे।

​एक रात जब ज़ोया घर लौटी, तो मिस्टर खन्ना लिविंग रूम में उसका इंतज़ार कर रहे थे। उनके हाथ में कुछ तस्वीरें थीं जो उनके जासूसों ने खींची थीं।

​मिस्टर खन्ना: (तस्वीरें मेज़ पर पटकते हुए) "यह क्या तमाशा है ज़ोया? खन्ना खानदान की वारिस एक सड़क किनारे बैठने वाले लड़के के साथ साइकिल पर घूम रही है? लोग क्या कहेंगे?"

​ज़ोया: "डैड, वो मेरा दोस्त है। और उसके साथ रहकर मुझे जो खुशी मिलती है, वो आपकी इन बिजनेस डील्स में नहीं है।"

​मिस्टर खन्ना: (चिल्लाते हुए) "दोस्ती? बराबरी वालों में होती है ज़ोया! उस लड़के की हैसियत क्या है? वो तुम्हें अपनी बातों के जाल में फँसा रहा है ताकि तुम्हारी दौलत तक पहुँच सके। मुझे ऐसे लोग अच्छे से पता हैं, वे कंफर्टेबल जोन ढूँढते हैं रईस लोगों के पास।"

​ज़ोया की आँखों में आँसू आ गए। "वो वैसा नहीं है डैड। उसने तो आज तक मेरा सरनेम तक नहीं पूछा।"

​मिस्टर खन्ना: "मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। कल सुबह से तुम शहर से बाहर जा रही हो। और उस लड़के को... मैं खुद समझा दूँगा कि अपनी औकात में रहना किसे कहते हैं।"

​एपिसोड का अंत (सस्पेंस):

ज़ोया को कमरे में बंद कर दिया गया। वह खिड़की से बाहर देख रही थी, उसका दिल अज़ीम के लिए कांप रहा था। उसे पता था कि उसके पिता किस हद तक जा सकते हैं।

​अगले दिन, अज़ीम की दुकान के सामने एक काली लग्जरी गाड़ी रुकती है। मिस्टर खन्ना का पीए (PA) बाहर निकलता है और अज़ीम के सामने एक चेक (Check) रखता है।

​"ये लो अपनी कीमत, और आज के बाद ज़ोया साहिबा के आसपास भी मत दिखना। ये दोस्ती तुम्हें बहुत महंगी पड़ेगी।"

​अज़ीम ने उस चेक को देखा और फिर उस दरिया को, जहाँ से ज़ोया आती थी। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी उदासी थी।