सूरज की पहली किरणें अभी क्षितिज पर उभरी भी नहीं थीं, लेकिन ऐशा की रूह कांप रही थी। महल की ऊँची, नक्काशीदार दीवारों के बीच हर कोना इतना खामोश था कि ऐशा को अपनी ही पलकों के झपकने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। वह कमरा, जिसे वह अपनी सुरक्षा समझ रही थी, अब उसे दमघोंटू लगने लगा था।
उसने दबे पांव कमरे का दरवाज़ा खोला। गलियारा अंधेरे और हल्की नीली रोशनी में डूबा हुआ था। ऐशा ने महसूस किया कि यह इमारत सिर्फ ईंट-पत्थरों से नहीं बनी थी; इसमें अरमान खान के गुनाहों और राज़ों की गूँज दफन थी। हर कदम पर लकड़ी के फर्श की चरमराहट उसे चेतावनी दे रही थी—वापस जाओ, ऐशा!
जैसे ही वह महल के पिछले हिस्से की ओर बढ़ी, उसे महसूस हुआ कि कोई उसे देख रहा है। वह रुकी, उसकी सांसें गले में अटक गईं। "कौन है?" उसने फुसफुसाया। सन्नाटे ने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन हवा में सिगार की वह जानी-पहचानी महक घुलने लगी थी।
अचानक, अँधेरे से एक साया उभरा। अरमान खान।
वह किसी शिकारी की तरह दीवार से सटकर खड़ा था। उसकी ठंडी, डरावनी आँखें ऐशा के चेहरे पर टिकी थीं। "इतना डर क्यों रही हो, ऐशा? या फिर यह डर नहीं, कुछ और ढूँढने की तलब है?"
ऐशा ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन अरमान ने फुर्ती से उसका रास्ता रोक लिया। "मुझे छोड़ दो, अरमान। मैं यहाँ घुट रही हूँ। मैं कुछ नहीं जानती, मैं बस अपने घर वापस जाना चाहती हूँ!"
अरमान ने एक धीमी, कड़वी मुस्कान दी। उसने आगे बढ़कर ऐशा की कलाई पकड़ी और उसे अपनी ओर खींचा। "सच बोलना यहाँ तुम्हारा पहला नियम है, ऐशा। और तुम्हारा चेहरा चीख-चीख कर कह रहा है कि तुम सच से कोसों दूर हो। तुम यहाँ मेहमान नहीं हो... तुम एक राज़ हो, जिसे मैंने दुनिया से छुपाकर रखा है।"
वह उसे गलियारे के उस हिस्से की ओर ले गया जहाँ लाइटें मद्धम थीं। वहाँ एक भारी, लोहे का दरवाज़ा था जिसके नीचे से एक अजीब सी नीली रोशनी झिलमिला रही थी। ऐशा के कदम वहीं थम गए। उस कमरे से आती ठंडक सामान्य नहीं थी।
"ये कौन सा कमरा है?" ऐशा ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
अरमान का चेहरा अचानक पत्थर जैसा सख्त हो गया। उसने झुककर ऐशा की आँखों में देखा, उसकी आवाज़ अब किसी खंजर की तरह तेज़ थी। "जहाँ मैं जाता हूँ, वहाँ किसी को आने की इजाज़त नहीं होती। और जो उस दरवाज़े को पार करने की कोशिश करता है... वह फिर कभी सूरज की रोशनी नहीं देख पाता।"
ऐशा की धड़कनें बेकाबू होने लगीं। "तो फिर मुझे यहाँ क्यों लाए हो? मुझे ये सब क्यों दिखा रहे हो?"
अरमान ने उसके चेहरे को अपनी उंगलियों के बीच लिया। उसका स्पर्श खुरदरा था, लेकिन उसमें एक ऐसी जलन थी जो ऐशा के शरीर में बिजली की तरह दौड़ गई। "ताकि तुम्हें समझ आ जाए कि इस महल का हर कानून अरमान खान लिखता है। यहाँ सिर्फ दो ही चीज़ें ज़िंदा रहती हैं—मेरी मर्ज़ी या मौत। अगर तुम यहाँ जीना चाहती हो, तो अपनी जिज्ञासा को मारना सीखो।"
तभी, अचानक महल की ऊपरी मंजिल से किसी चीज़ के गिरने की तेज़ आवाज़ आई।
ऐशा कांप उठी, लेकिन अरमान की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी। उसकी आँखों में गुस्सा तो था, लेकिन साथ ही एक गहरी चिंता (Concern) भी झलक गई। उसने तुरंत ऐशा को अपने पीछे किया और सतर्क मुद्रा में आ गया। "शोर मत करो!" उसने फुसफुसाया।
गलियारे के दूसरे छोर पर एक साया तेज़ी से गुजरा। वह अर्मान का गार्ड नहीं था। वह साया फुर्तीला था, जैसे कोई भूत हो जो महल की रगों से वाकिफ हो।
अर्मान की नज़रें उस तरफ जमी थीं, लेकिन उसने अपना हाथ ऐशा के कंधे पर रखा हुआ था—जैसे वह उसे दुनिया के हर खतरे से बचा लेना चाहता हो। उस पल में ऐशा को अर्मान का एक नया रूप दिखा। वह सिर्फ एक जालिम अपहरणकर्ता नहीं था; वह खुद भी किसी चीज़ से डरा हुआ था। शायद वह 'तीसरा शख्स' जिसका साया उसे हर पल सता रहा था।
"यहाँ कोई और भी है, है ना?" ऐशा ने कांपती आवाज़ में पूछा।
अरमान ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया, लेकिन उसकी पकड़ और मज़बूत हो गई। "डर... कभी-कभी इंसान को सुरक्षित रखता है, ऐशा। लेकिन यहाँ ज़िंदा रहने के लिए तुम्हें सिर्फ डरना नहीं, बल्कि चालाक होना होगा।"
हवा का एक ठंडा झोंका गलियारे से गुज़रा, जिससे दीवार पर लगी पेंटिंग्स हिलने लगीं। ऐशा को अहसास हुआ कि अरमान की नफरत और उसका जुनून ही उसका एकमात्र सहारा था, क्योंकि अँधेरे में खड़ा वह दूसरा दुश्मन अरमान से भी ज्यादा खतरनाक था।
तभी अर्मान ने उसे एक बड़े हॉल की ओर धकेला। "अंदर जाओ और दरवाज़ा बंद कर लो। जब तक मैं न कहूँ, बाहर मत आना।"
ऐशा ने देखा कि अरमान अँधेरे गलियारे की ओर बढ़ रहा था, जहाँ वह साया गायब हुआ था। उसे समझ आ गया कि यह महल उसकी कैद तो है ही, पर अब यह एक युद्धक्षेत्र (Warzone) बनने वाला है। और वह, ऐशा, उस युद्ध का केंद्र बिंदु थी।