दृश्य १ – मुंबई पोर्ट टर्मिनल | रात २:१३ बजेबाहरी – मुंबई पोर्ट कंटेनर यार्ड – रातमुंबई का विशाल कंटेनर यार्ड। अरब सागर से आती नम हवा, और ऊपर से टूटती बारिश। ऐसा लग रहा है मानो आसमान फट पड़ा हो। बारिश की बूंदें इतनी घनी हैं कि दस फीट की दूरी पर भी कुछ साफ नहीं दिखता। दूर कहीं बिजली चमक रही है, उसकी गड़गड़ाहट कंटेनरों के बीच गूंज रही है।लोहे के कंटेनरों पर बारिश टकराकर एक अजीब धात्विक आवाज़ पैदा कर रही है – जैसे कोई अदृश्य ढोलकिया लगातार थाप दे रहा हो। कंटेनर तीन-तीन मंजिल ऊंचे रखे गए हैं, उनके बीच संकरे रास्ते। यह जगह अपने आप में एक भूलभुलैया है।यार्ड के बिल्कुल बीच में एक सफेद फॉर्च्यूनर खड़ी है। उसकी बोनट पर बारिश की बूंदें टकराकर छिटक रही हैं। चारों ओर बारह आदमी। उनके चेहरे पर बारिश और तनाव दोनों साफ दिख रहे हैं। कुछ ने रेनकोट पहने हैं, कुछ भीग रहे हैं। सबके हाथों में हथियार – AK-47, डबल बैरल शॉटगन, 9mm पिस्तौल। कुछ के पास टॉर्च भी हैं, उनकी रोशनी बारिश की बूंदों को चीरती हुई आगे बढ़ रही है।एक मोटा आदमी, गोविंदा (४५, मूंछें, गंजा सिर, मैली बनियान के ऊपर रेनकोट), ट्रक के पहिये के पास खड़ा सिगरेट जलाने की कोशिश कर रहा है। माचिस की तीली बारिश में चार बार बुझ चुकी है। पांचवीं बार वह अपने रेनकोट के अंदर हाथ छिपाकर तीली जलाता है। सिगरेट सुलगती है। वह गहरा कश लगाता है, धुआं उसके मुंह से निकलता है और बारिश में घुलकर गायब हो जाता है।उसके पास खड़ा एक दुबला-पतला लड़का, चेतन (२२, बाल चिपके हुए, आंखों में डर), घबराई निगाहों से इधर-उधर देख रहा है।चेतन: (आवाज में हल्की कंपन)"गोविंदा भाई, वो आज आएगा? या बस अफवाह है? रात के ढाई बजे हैं। दो घंटे से खड़े हैं हम। सुबह होने वाली है।"गोविंदा सिगरेट का एक और कश लेता है। फिर धीरे से धुआं छोड़ता है। उसके चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान आती है।गोविंदा: (ठहाकेदार हंसी)"चेतन, तू नया है इस लाइन में, इसीलिए डरता है। कोई भूत नहीं है वो। आदमी है। हड्डी-मांस का बना आदमी। और आदमी को गोली लगती है। एक गोली, दो गोली, दस गोली – फर्क नहीं पड़ता। बस लगनी चाहिए। गोली लगते ही आदमी मर जाता है। चाहे वो कितना भी बड़ा क्यों न हो।"चेतन: "लेकिन कहते हैं ना भाई... उसने अकेले दम पर दस आदमी मार दिए थे। नागपुर में। पंद्रह सेकंड में। और उससे पहले दिल्ली में, बीस आदमियों को..."गोविंदा: (बीच में काटते हुए)"कहते हैं, कहते हैं, कहते हैं... लोग क्या नहीं कहते? मैं कहता हूं कल सुबह चाय की दुकान पर बैठकर अखबार पढ़ेंगे – 'मुंबई पोर्ट पर मुठभेड़, बदमाशों ने खाकी को दी मात'। अखबार वाले झूठ नहीं लिखते चेतन। झूठ सिर्फ किंवदंतियों में होता है। और वो सब – नागपुर, दिल्ली, पटना – सब किंवदंतियां हैं। बस कहानियां।"गोविंदा अपनी सिगरेट फेंकता है। वह बारिश में गिरती है और फुस्स की आवाज़ के साथ बुझ जाती है। उसकी लाल बत्ती अंधेरे में गायब हो जाती है।अचानक...सड़क की लाइट, जो अब तक स्थिर जल रही थी, टिमटिमाने लगती है। एक बार... दो बार... तीन बार... चार बार... फिर पूरी तरह बुझ जाती है। चारों तरफ घना अंधेरा। केवल बारिश की आवाज़ और दूर बिजली की चमक। दस सेकंड बीतते हैं। फिर लाइट फिर जलती है – और भी तेज रोशनी के साथ।हवा का एक तेज झोंका आता है। इतना तेज कि कंटेनरों के बीच सीटी बजने लगती है। गार्डों के कपड़े फड़फड़ाते हैं। एक का रेनकोट का हुड उड़ जाता है। बारिश सीधे उसके चेहरे पर पड़ती है।चेतन: (घबराई हुई निगाहों से इधर-उधर देखता हुआ)"गोविंदा भाई... ये हवा... इतनी रात को? और बिजली गुल?"गोविंदा: (हंसने की कोशिश करता है, लेकिन उसकी हंसी में डर झलकता है)"बारिश है, बिजली जाती है, हवा चलती है। ये सब होता है।"तभी...SUV की हेडलाइट्स खुद-ब-खुद जल उठती हैं। तेज रोशनी अंधेरे को चीरती हुई सामने के कंटेनरों पर पड़ती है। कुछ पल के लिए पूरा यार्ड रोशन हो जाता है।सब एक साथ चौंक जाते हैं। चारों तरफ हलचल मच जाती है। बंदूकें तनी जाती हैं।गोविंदा: (चिल्लाते हुए)"किसने किया ये? कौन है वहां? बोलो, नहीं तो गोली मार दूंगा!"कोई जवाब नहीं। सिर्फ बारिश की आवाज़ और दूर बिजली की गड़गड़ाहट। हेडलाइट्स जलती रहती हैं, किसी अदृश्य शक्ति की तरह।गोविंदा ने अपनी पिस्तौल निकाल ली है। वह धीरे-धीरे SUV की ओर बढ़ता है। उसके हाथ कांप रहे हैं, लेकिन वह कोशिश कर रहा है कि बाकियों को पता न चले। बाकी आठ-दस आदमी भी उसके पीछे-पीछे चलते हैं। उनके कदम कीचड़ में धंस रहे हैं।गोविंदा: (पास जाकर, गाड़ी के चारों तरफ देखता है)"कोई नहीं है। अंदर भी कोई नहीं। तो हेडलाइट्स कैसे जली?"चेतन: "भाई... यहां कुछ गड़बड़ है। चलो यहां से हटते हैं।"गोविंदा: "बेवकूफ! पैसे लिए हैं तो काम तो करना पड़ेगा। बस दो घंटे और। फिर सुबह होते ही ये माल चला जाएगा और हम करोड़पति। समझा?"चेतन चुप रहता है। लेकिन उसकी आंखें डर से फैली हुई हैं।तभी...दूर से ट्रक की ब्रेक की हल्की सी आवाज़ आती है। बहुत हल्की, लगभग हवा में दबी हुई, लेकिन फिर भी साफ। उस आवाज़ में एक अजीब सी धात्विक गूंज है।सब एक साथ उस दिशा में मुड़ते हैं।लगभग सौ मीटर दूर, अंधेरे में एक काला ट्रक खड़ा है। एक बड़ा, पुराना मॉडल का ट्रक। उसकी हेडलाइट्स बंद हैं। वह कंटेनरों के बीच इस तरह खड़ा है जैसे अंधेरे ने उसे जन्म दिया हो। एक सेकंड पहले वहां कुछ नहीं था, अब है।गोविंदा: (हकलाते हुए)"वो... वो ट्रक कहां से आया?"कोई जवाब नहीं देता। सब सन्न हैं।ट्रक का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलता है। चर्र-चर्र की आवाज़, जो बारिश में भी साफ सुनाई देती है। जंग लगे कब्ज़ों की आवाज़। दरवाज़ा पूरा खुल जाता है।धीरे... बहुत धीरे...एक काला चमड़े का जूता पहले जमीन पर पड़ता है। कीचड़ में धंस जाता है। फिर दूसरा।एक आदमी ट्रक से उतरता है।वह काले रंग का सूट पहने है। बिल्कुल सटीक कट का, महंगे कपड़े का। सूट बारिश से पूरी तरह भीग चुका है, उसके शरीर से चिपका हुआ। उसके बाल गीले हैं, माथे पर चिपके। चेहरा बारिश से लथपथ।उसकी उम्र लगभग ३५ के आसपास है, लेकिन उसकी आंखें उससे कहीं ज्यादा बूढ़ी हैं। उसकी आंखों में कोई भाव नहीं है – कोई डर नहीं, कोई गुस्सा नहीं, कोई उत्सुकता नहीं। बिल्कुल स्थिर, जैसे किसी मूर्ति की आंखें हों। शून्य। खालीपन।वह खड़ा होता है। अपने सूट के कॉलर को ठीक करता है – एक आदतन हरकत। फिर वह अपनी बाईं कलाई उठाता है। वहां एक डिजिटल घड़ी है – बड़ी, मोटी, मिलिट्री मॉडल। उसकी उंगली एक बटन दबाती है।घड़ी की स्क्रीन जलती है – हरे रंग के अंक चमकते हैं: ००:६०वह एक पल घड़ी को देखता है। फिर धीरे-धीरे अपनी निगाहें उठाता है और SUV के आसपास खड़े गार्डों की ओर देखता है। उनके बीच की दूरी – करीब पचास मीटर। बारिश। अंधेरा। बीस हथियारबंद लोग।उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आती है – बमुश्किल ध्यान देने योग्य। फिर वह चलना शुरू करता है।आर्यव (वॉइसओवर): (धीमा, ठंडा, बिना किसी भाव के, मानो कोई रिकॉर्डिंग हो)"साठ सेकंड। हर सेकंड की कीमत होती है। किसी के लिए यह चाय पीने का समय है। किसी के लिए सोचने का। मेरे लिए... यह काम का समय है। आज ये साठ सेकंड बारह लोगों के हैं। बारह लोग, जिन्होंने कभी मुझे देखा नहीं, मुझे जाना नहीं, लेकिन आज रात मेरा नाम सुनेंगे। और फिर... कुछ नहीं सुनेंगे।"---दृश्य २ – एक्शन शुरूबाहरी – कंटेनर यार्ड – रात (लगातार)गार्डों में से एक, भीमा (३५, तगड़ा, छोटे कद का, हाथ में टॉर्च), अंधेरे में झाँकता है। उसकी टॉर्च की रोशनी अंधेरे में झूलती है, कंटेनरों की दीवारों पर पड़ती है। वह आगे बढ़ता है, दो-तीन कदम।भीमा: (चिल्लाता है)"कौन है वहां? बोल, नहीं तो गोली मार दूंगा! मैं वॉर्निंग दे रहा हूं!"ठप्प।एक हल्की सी आवाज़। साइलेंसर से निकली गोली की वह खास आवाज़ – दबी हुई, लेकिन फिर भी साफ। बारिश की आवाज़ में दब गई, लेकिन अनुभवी कान इसे पहचान सकते हैं।भीमा के माथे के ठीक बीच में एक काला छेद बन जाता है। वह एक पल खड़ा रहता है, उसकी आंखें फैल जाती हैं, जैसे समझ ही नहीं पा रहा कि हुआ क्या। फिर उसके हाथ से टॉर्च छूट जाती है। वह कीचड़ में गिरती है और बुझ जाती है। भीमा घुटनों के बल गिरता है... और फिर मुंह के बल कीचड़ में धंस जाता है।बाकी गार्डों को कुछ समझ नहीं आता। चेतन भीमा को देखता है, फिर अंधेरे की ओर। उसे कुछ दिखाई नहीं देता।चेतन: (चीखता हुआ)"भीमा! भीमा क्या हुआ?" फिर जोर से, "वो यहीं है! वो आ गया! अलर्ट! अलर्ट!"अराजकता फैल जाती है।गोलियां चलने लगती हैं। AK-47 की तड़तड़ाहट – एक के बाद एक लगातार फायर। शॉटगन की धमाकेदार आवाज़, जो सीने में गूंजती है। पिस्तौल की चिंघाड़। चिंगारियाँ अंधेरे में उड़ती हैं – जहां गोलियां कंटेनरों से टकराती हैं। धातु पर धातु की टक्कर, गोलियों का रिकोषेट होना।आर्यव दौड़ना शुरू करता है। उसकी चाल में कोई जल्दबाजी नहीं है। हर कदम मापा हुआ, हर मूवमेंट कैलकुलेटेड। वह बारिश में इस तरह दौड़ रहा है जैसे उसके पैरों में आंखें हों – हर गड्ढे से बचता हुआ, हर कीचड़ से बचता हुआ।वह दौड़ते हुए एक कंटेनर की ओर बढ़ता है। गोलियां उसके पीछे-पीछे आ रही हैं, कंटेनरों पर लग रही हैं, धातु के परदे फाड़ रही हैं। वह कंटेनर की दीवार को छूता हुआ दौड़ता है – उसकी उंगलियां ठंडे लोहे को महसूस कर रही हैं।एक गार्ड, मोनू (२८, पतला, हाथ में शॉटगन), सामने से आता है। वह आर्यव को देखता है और शॉटगन तानता है – उसकी आंखों में डर और अचानक मिली सफलता की खुशी दोनों हैं।मोनू: "मर गया साला!"वह ट्रिगर दबाने ही वाला है।लेकिन आर्यव का हाथ बिजली की गति से उसकी कलाई पकड़ लेता है। एक झटका – इतना तेज कि मोनू को समझ में नहीं आता कि हुआ क्या। शॉटगन की नली ऊपर की ओर हो जाती है और गोली हवा में चली जाती है। धमाका – बारिश के बीच गूंजता हुआ।अगले ही पल आर्यव का घुटना मोनू के पेट में धंस जाता है। मोनू की सांस फूल जाती है, उसका मुंह खुलता है, हवा के लिए हांफता है। उसकी आंखों से पानी बहने लगता है। आर्यव उसके कंधे पर पैर रखता है – एक छलांग के लिए तैयार। मोनू उसके वजन से नीचे झुक जाता है।आर्यव उसके कंधे पर पैर रखकर हवा में उछलता है – एक परफेक्ट फ्लिप। उसका शरीर हवा में घूमता है, बारिश की बूंदें उसके चारों तरफ बिखरती हैं। धीमी गति में यह देखने लायक होता।हवा में ही वह अपनी दोनों पिस्तौलें निकालता है – कमर से, एक साथ, बिजली की गति। उसकी आंखें लक्ष्य पर टिकी हैं। नीचे गिरने से पहले ही दो शॉट।पहली गोली – दाएं ओर से आ रहे गार्ड की गर्दन में। वह चिल्लाता भी नहीं, बस गिर जाता है। उसका हाथ अभी भी ट्रिगर पर है, एक आखिरी गोली हवा में चली जाती है।दूसरी गोली – बाएं ओर से फायरिंग कर रहे गार्ड की छाती में, ठीक दिल के ऊपर। वह पीछे की ओर गिरता है, उसकी AK-47 हाथ से छूटकर दूर जा गिरती है।आर्यव जमीन पर पैर रखता है – बिल्कुल बिल्ली की तरह, बिना किसी आवाज़ के। उसके पैर कीचड़ में हल्का-सा धंसते हैं और वह तुरंत संतुलन बना लेता है।घड़ी: ००:४१एक गार्ड, सुल्तान (४०, बड़ी कद-काठी, कम से कम ९० किलो, चेहरे पर चोट के निशान), पीछे से आकर आर्यव पर हमला करता है। उसके हाथ में चाकू है – एक बड़ा, खूंखार चाकू। वह आर्यव की गर्दन पर वार करना चाहता है। उसकी चाल में अनुभव है – वह पेशेवर है।लेकिन आर्यव को पीछे देखने की जरूरत नहीं है। वह सिर्फ महसूस करता है। हवा के उस हल्के झोंके को, जो चाकू के आने से पहले आता है। वह बिना मुड़े अपना बायां हाथ पीछे ले जाता है – ठीक उसी समय, ठीक उसी कोण पर – और सुल्तान की कलाई पकड़ लेता है।सुल्तान की आंखें फैल जाती हैं – हैरानी से। वह अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करता है, लेकिन आर्यव की पकड़ लोहे की है।फिर एक तेज मोड़। आर्यव की बांह की मांसपेशियां तन जाती हैं।चटाक्।हड्डी टूटने की आवाज़ बारिश में भी साफ सुनाई देती है – एक सूखी, भयानक आवाज़। सुल्तान चीखता है – एक दर्द भरी चीख जो पूरे यार्ड में गूंजती है। उसका हाथ बेकार हो जाता है, अप्राकृतिक कोण पर लटक जाता है। चाकू उसके हाथ से छूटकर कीचड़ में गिरता है।आर्यव सुल्तान का हाथ और घुमाता है – उसकी ही पिस्तौल अब सुल्तान की ओर है। सुल्तान अपने बचे हुए हाथ से आर्यव को धकेलने की कोशिश करता है, लेकिन बेकार।तीन शॉट – एक के बाद एक, बिल्कुल सटीक।पहली गोली – पेट में। दूसरी – सीने में। तीसरी – फिर सीने में, ठीक दिल के पास।सुल्तान गिरता है – एक बड़े पेड़ की तरह। उसका शरीर कीचड़ में धंस जाता है। उसकी आंखें खुली हैं, बारिश की बूंदें उनमें भर रही हैं।घड़ी: ००:२९अब बाकी बचे ६ गार्ड। वे आर्यव को घेर लेते हैं। एक अर्ध-गोलाकार घेरा, जो धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है। उनके चेहरों पर डर है, लेकिन साथ में यह भी कि वे छह हैं और वह अकेला। उनकी बंदूकें तनी हुई हैं।बारिश और तेज हो जाती है – मानो प्रकृति भी इस तमाशे को देखना चाहती हो, और अपनी रोशनी बढ़ा रही हो। अब बारिश इतनी तेज है कि सामने देखना मुश्किल हो रहा है।एक गार्ड, जॉर्ज (३२, गोरा रंग, हाथ में AK-47), फायर करता है। गोली आर्यव के कंधे को छूती हुई निकल जाती है – बस एक इंच के फर्क से। आर्यव के काले सूट पर गहरा लाल दाग फैल जाता है। खून और बारिश का पानी मिलकर उसके कंधे से बहता है, उसकी बांह से होता हुआ उंगलियों तक जाता है।आर्यव के चेहरे पर कोई दर्द नहीं है। कोई बदलाव नहीं। उसकी आंखों में वही शून्यता है। वह बस अपने बाएं कंधे को एक बार घुमाता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो, जैसे उसे गोली न लगी हो। वह अपने कंधे को एक बार और घुमाता है – मांसपेशियों को रिलैक्स करते हुए।उसकी निगाहें चारों तरफ घूमती हैं – हर गार्ड की पोजीशन, हर बंदूक की दिशा, हर संभावित रास्ते को नोट करती हैं।वह तेजी से पीछे मुड़ता है और पास के एक कंटेनर का दरवाज़ा खोलता है। दरवाज़ा चर्र-चर्र करता है। अंदर घना अंधेरा – काला कोयला जैसा।दो गार्ड – जॉर्ज और लखन (३०, काला रंग, मूंछें, हाथ में शॉटगन) – उसके पीछे अंदर घुस जाते हैं। उनके चेहरों पर उत्साह है – उन्हें लगता है उन्होंने उसे फंसा लिया।अंदर – कंटेनर – रातपूरा अंधेरा। कुछ दिखाई नहीं देता। सिर्फ आवाज़ें। जॉर्ज और लखन की सांसें। उनके पैरों के नीचे धातु का फर्श। बारिश की आवाज़ अब बाहर से दबी हुई आ रही है।लखन: (फुसफुसाते हुए)"कहां है? दिख नहीं रहा।"जॉर्ज: "चुप रह। टॉर्च जला।"लखन टॉर्च जलाता है – रोशनी अंधेरे को चीरती है। वे चारों तरफ देखते हैं।कोई नहीं।फिर...धप्प।जॉर्ज गिर जाता है। बिना आवाज़ किए। उसके सिर पर वार हुआ है।लखन घबरा जाता है। वह टॉर्च इधर-उधर घुमाता है।"जॉर्ज! जॉर्ज!" कोई जवाब नहीं।तभी एक छाया उसके पीछे से उठती है। एक हाथ उसकी कलाई पकड़ता है, घुमाता है। लखन चीखने लगता है, लेकिन उसकी चीख अधूरी रह जाती है।चटाक्।घुटने की आवाज़। गर्दन मुड़ने की आवाज़। फिर सन्नाटा।बाहर – कंटेनर यार्ड – रातआर्यव कंटेनर से बाहर निकलता है। उसके हाथ में अब एक अतिरिक्त पिस्तौल है – जॉर्ज की। उसके कपड़ों पर और खून के धब्बे हैं – उसका अपना और दूसरों का। उसकी आंखें अब भी वैसी ही स्थिर हैं।घड़ी: ००:०८आखिरी बचा गार्ड – चेतन – भाग रहा है। वह पागलों की तरह दौड़ रहा है, गिरता-पड़ता, कीचड़ में लथपथ। उसकी बंदूक कहीं गिर गई है। वह पीछे मुड़कर देखता है। आर्यव वहीं खड़ा है, उसके पीछे नहीं भाग रहा। बस खड़ा है। उसे देख रहा है। बारिश में एक काली मूर्ति की तरह।चेतन: (चिल्लाते हुए, रोते हुए, आवाज़ बदल गई है डर से)"मुझे छोड़ दो भाई! पैसे दूँगा! जितने चाहिए उतने! मेरा कोई मतलब नहीं है! मैं तो बस काम करता हूं! किराए पर काम करता हूं! मेरे घर पर मां है, बीमार है! प्लीज़! मैं तुम्हें कभी नहीं देखूंगा, किसी को नहीं बताऊंगा!"आर्यव खड़ा रहता है। वह धीरे-धीरे अपनी पिस्तौल उठाता है – जॉर्ज वाली। एक पल रुकता है। वह चेतन को देखता है – भागते हुए, गिरते हुए, कीचड़ में सनी पीठ।फिर धीमी सांस लेता है।शॉट।गोली चेतन की पीठ में लगती है – ठीक कंधे के ब्लेड के बीच। वह आगे की ओर गिरता है, कीचड़ में धंसता जाता है। उसका हाथ एक बार हवा में लहराता है, जैसे किसी को पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। फिर स्थिर हो जाता है। बारिश उसकी लाश पर गिरती रहती है।घड़ी: ००:००सन्नाटा।सिर्फ बारिश की आवाज़। दूर बिजली की गड़गड़ाहट। और आर्यव की सांसें – धीमी, स्थिर।आर्यव घड़ी बंद करता है। वह धीरे-धीरे चलता है, लाशों के बीच से गुजरता है। एक... दो... तीन... गिनता हुआ। बारह। बारह लाशें। बारह।वह SUV के पास पहुंचता है। उसकी डिक्की खोलता है।अंदर एक आदमी बंधा हुआ है – सूरज सक्सेना (५०, महंगा सूट, अब गंदा और फटा हुआ, हाथ पीछे बंधे, मुंह पर टेप)। उसकी आंखें डर से फैली हुई हैं, सफेद हिस्सा अब लाल हो गया है। वह आर्यव को देखता है, जैसे किसी भूत को देख रहा हो। उसका शरीर कांप रहा है।सूरज के मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही। वह बस सहमा हुआ है, हिल नहीं सकता। आर्यव उसके मुंह पर लगा टेप हटाता है – एक झटके में, जिससे सूरज की त्वचा खिंच जाती है।सूरज: (कांपती आवाज़ में, बमुश्किल बोल पा रहा है)"तुम... कौन हो? किसने भेजा तुम्हें? कितने पैसे लिए? मैं दूना दूँगा... तिगुना... दस गुना... जितना चाहो! नाम बताओ अपना! मैं अमीर हूं, बहुत अमीर!"आर्यव उसे देखता है। उसकी आंखों में अब भी वही शून्यता है।आर्यव: (शांत स्वर में, बिना किसी उतार-चढ़ाव के, मानो मशीन बोल रही हो)"मैं नाम नहीं बताता। मैं सिर्फ निशान छोड़ता हूं। तुम्हारा काम किसी और ने दिया है। मैं सिर्फ पहुंचाने वाला हूं। तुम मेरे लिए कोई मायने नहीं रखते।"वह डिक्की बंद करने लगता है।सूरज: (जल्दी-जल्दी, आखिरी उम्मीद से)"प्लीज़... मेरी बेटी की शादी है अगले महीने... मैं उसे बाप बनकर नहीं ले जा पाऊंगा अगर... प्लीज़, तुम भी किसी के बाप होगे..."आर्यव के चेहरे पर एक हल्का-सा झटका आता है। सूरज की बात ने उसे छू लिया। लेकिन अगले ही पल वह फिर वही हो जाता है। वह डिक्की बंद कर देता है। धम्म की आवाज़। सूरज की आवाज़ बंद हो जाती है।आर्यव मुड़ता है। अब उसे जाना है।तभी उसकी नज़र ज़मीन पर पड़ती है। कीचड़ में कुछ चमक रहा है। एक छोटा-सा धातु का टुकड़ा। बारिश में चमकता हुआ।वह झुककर उसे उठाता है। बारिश के पानी से धोकर देखता है।एक चिप। छोटी-सी, लगभग दो इंच की। धातु की, भारी। उस पर एक निशान उकेरा है – एक बाज़। उड़ता हुआ बाज़, जिसके पंख फैले हैं, नीचे झपट्टा मारने को तैयार। नक्काशी बहुत बारीक है – किसी माहिर कारीगर का काम लगता है।आर्यव की आँखें पहली बार बदलती हैं। उस स्थिरता में एक हल्का-सा झटका। एक पल के लिए उसके चेहरे पर कुछ आता-जाता है – हैरानी? याद? डर? पहचान?वह चिप को घूरता है। बारिश उसके चेहरे पर बह रही है, लेकिन वह उसे महसूस नहीं कर रहा। उसकी सांसें थोड़ी तेज हो जाती हैं। उसका हाथ हल्का-सा कांपता है – पहली बार।आर्यव (वॉइसओवर): (पहली बार उसकी आवाज़ में भाव है – हल्का सा, दबा हुआ, लेकिन है)"यह चिन्ह... मैंने इसे पांच साल पहले आखिरी बार देखा था। उस रात... जब मेरी ज़िंदगी खत्म हुई थी। जब मेरी अन्या... मेरी मीरा... मैंने सोचा था यह चिन्ह मर गया, खत्म हो गया। लेकिन यह यहां है। आज। इस जगह। इस वक्त। यह कोई आम कॉन्ट्रैक्ट नहीं था। यह संदेश था। मेरे लिए। कोई मुझे बुला रहा है। कोई जो पांच साल पहले की बात जानता है।"वह चिप को मुट्ठी में बंद कर लेता है – इतनी जोर से कि धातु उसकी हथेली में गड़ जाती है, खून निकल आता है। फिर वह धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो जाता है।बारिश जारी है। बिजली चमकती है – उसकी रोशनी में लाशें दिख जाती हैं। फिर अंधेरा।---दृश्य ३ – आर्यव का ठिकाना | रात ३:४५ बजेबाहरी – गोवंडी की झुग्गियां – रातमुंबई के गोवंडी इलाके की घनी बस्तियां। संकरी गलियां, ऊपर बिजली के तारों का जाल, नीचे नालियां। इस वक्त रात का समय है, लेकिन कहीं-कहीं लाल बत्तियां जल रही हैं।एक झुग्गी के बाहर आर्यव खड़ा है। उसने अपने खूनी कपड़े बदल लिए हैं – अब उसने एक साधारण फटी जीन्स और काली टी-शर्ट पहनी है। उसके कंधे पर पट्टी बंधी है – उस गोली के निशान की। वह चारों तरफ देखता है, फिर झुग्गी के दरवाजे से अंदर घुस जाता है।अंदर – आर्यव का कमरा – रातएक छोटा-सा कमरा, लगभग दस फीट गुना दस फीट। बाहर से देखने पर यह बिल्कुल साधारण झुग्गी लगती है। अंदर... सब कुछ व्यवस्थित है। एक सिंगल बेड, एक छोटी टेबल, एक कुर्सी। दीवार पर मुंबई का बड़ा नक्शा लगा है, जिस पर कई जगह लाल निशान लगे हैं। एक कोने में एक छोटी-सी अलमारी। और उसके पीछे...आर्यव अलमारी को सरकाता है। पीछे दीवार में एक छोटा-सा तिजोरी जैसा हिस्सा है। वह उसे खोलता है – अंदर हथियार। पिस्तौल, चाकू, गोलियां, ग्रेनेड, साइलेंसर। सब साफ, व्यवस्थित, नंबरिंग के साथ।वह अपनी पिस्तौल निकालता है, उसे साफ करना शुरू करता है – एक आदतन प्रक्रिया। उसकी उंगलियां मशीन की तरह काम कर रही हैं – पुर्जे अलग, सफाई, तेल, फिर जोड़ना।उसकी नज़र टेबल पर रखी चिप पर जाती है। वह उसे उठाता है, फिर से देखता है। बाज़ का निशान। वह उसे बार-बार पलट रहा है।फिर वह उठता है, अलमारी से एक डिब्बा निकालता है। पुराना, गंदा डिब्बा। वह उसे खोलता है।अंदर तस्वीरें हैं – अन्या की, मीरा की, उन तीनों की। एक तस्वीर में वे तीनों समुद्र किनारे हैं – अन्या हंस रही है, मीरा उसकी गोद में, आर्यव पीछे से दोनों को गले लगाए हुए। सब खुश हैं। सब जिंदा हैं।आर्यव तस्वीर देखता है। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं, लेकिन उसकी आंखें कुछ कह रही हैं। वह तस्वीर को छूता है – अन्या के चेहरे को, मीरा के गालों को। उसकी उंगलियां कांपती हैं।वह तस्वीर वापस रखता है, डिब्बा बंद करता है। फिर वह लैपटॉप खोलता है।लैपटॉप की स्क्रीन पर कई फोल्डर हैं। वह एक फोल्डर खोलता है – नाम है "कबीर राणा"। अंदर दर्जनों फाइलें, तस्वीरें, वीडियो, दस्तावेज।सबसे ऊपर एक तस्वीर है – कबीर राणा की। अब वह इंस्पेक्टर नहीं है। वह बड़ा आदमी है – एसीपी, मुंबई पुलिस। वर्दी में, सीने पर मेडल, चेहरे पर अहंकार। उसके नीचे जानकारी है – ठिकाने, रूटीन, सुरक्षा व्यवस्था, कमजोरियां। उसके दोस्त, दुश्मन, रिश्तेदार। सब कुछ।आर्यव स्क्रीन देखता है। फिर वह अपनी घड़ी देखता है।सुबह के ४:३२।वह घड़ी का बटन दबाता है। टाइमर शुरू होता है – ००:६०। वह स्क्रीन पर टाइमर को देखता है – सेकंड गिने जा रहे हैं। ५९... ५८... ५७...आर्यव (वॉइसओवर): "पांच साल। पांच साल मैंने इंतज़ार किया। सबूत का, मौके का, सही वक्त का। पांच साल मैंने इस आदमी के बारे में सब कुछ जाना – उसकी आदतें, उसके दोस्त, उसकी कमजोरियां। पांच साल मैंने खुद को तैयार किया – एक हथियार की तरह। और अब... अब वक्त आ गया है। कबीर राणा, मैं आ रहा हूं। और इस बार कोई कोलेटरल डैमेज नहीं होगा। इस बार सिर्फ तुम हो।"टाइमर ००:०० पर आता है। आर्यव लैपटॉप बंद करता है। वह अपनी पिस्तौल उठाता है, चेक करता है, कमर में रखता है। फिर वह चिप को जेब में डालता है, और कमरे से बाहर निकल जाता है।बाहर सुबह हो रही है। मुंबई जाग रही है। चाय की दुकानें खुल रही हैं, लोकल ट्रेनों की आवाज़ें दूर से आ रही हैं, भीड़ इकट्ठा होने लगी है। एक नई सुबह, एक नया दिन।आर्यव इस भीड़ में घुलमिल जाता है। वह बिल्कुल साधारण लगता है – एक और आदमी, एक और चेहरा। कोई उसे पहचान नहीं पाता। कोई नहीं जानता कि यह साधारण-सा दिखने वाला आदमी कौन है, उसने आज रात क्या किया।लेकिन वह जानता है।वह 'निशान' है।और उसका निशाना... कबीर राणा है।---दृश्य ४ – फ्लैशबैक: पांच साल पहलेबाहरी – मुलुंड, मध्यम वर्गीय इलाका – दिन (फ्लैशबैक)एक शांत, हरा-भरा इलाका। छोटे-छोटे मकान, बालकनियों में फूल, सड़क पर खेलते बच्चे। एक मकान के बाहर लॉन है – उसमें झूला है, कुछ गमले हैं, और एक छोटी-सी गाड़ी खड़ी है।मकान के दरवाजे पर नेमप्लेट – "आर्यव शर्मा"।अंदर – आर्यव का घर – दिनएक आरामदायक, साफ-सुथरा घर। दीवारों पर तस्वीरें – शादी की, बच्ची के जन्म की, छुट्टियों की। सोफे पर आर्यव (३२ साल का, युवा, चेहरे पर जोश और जिंदगी, आंखों में चमक) बैठा है। उसने घर के कपड़े पहने हैं – वह छुट्टी पर है। उसकी गोद में मीरा (६ साल, बड़ी-बड़ी आंखें, दो चोटियां, हमेशा मुस्कुराती) बैठी है। वह उसके बालों से खेल रही है।मीरा: (खुशी से चिल्लाती हुई)"पापा! पापा! कल तुम्हारा बर्थडे है! मैंने तुम्हारे लिए कुछ बनाया है!"आर्यव: (प्यार से)"क्या बनाया है, मेरी जान?"मीरा: (शरारत से)"बताऊंगी नहीं! सीक्रेट है! कल पता चलेगा!"वह आर्यव की गोद से उतरकर भाग जाती है। अन्या (२८, सुंदर, चेहरे पर मुस्कान, थोड़ा गोल-मटोल, घर के कपड़ों में भी खूबसूरत) किचन से आती है। उसके हाथ में चाय का कप है। वह आर्यव के बगल में बैठ जाती है।अन्या: (मुस्कुराते हुए)"तेरी बेटी बहुत शैतान है। सुबह से मुझसे छुपाकर कुछ बना रही है। मुझे भी नहीं बताया।"आर्यव: (अन्या को गले लगाते हुए)"तेरी बेटी है, तो शैतान होगी ही। मेरी बेटी होती तो सीधी-साधी होती।"अन्या: (हल्की चोट करते हुए)"चुप कर! तुम दोनों मिलकर मेरी जान ले लोगे। पहले तुम, फिर ये।"आर्यव: "लेकिन तुम हम दोनों से प्यार करती हो।"अन्या: (प्यार से)"हां, मेरी गलती है।"दोनों हंसते हैं। बाहर से मीरा की आवाज़ आती है – वह अपने दोस्तों के साथ खेल रही है। उसकी हंसी घर में गूंज रही है।अन्या: (गंभीर होते हुए)"आर्यव... तुम खुश हो ना?"आर्यव: (हैरान)"कैसा सवाल है? बिल्कुल खुश हूं। तुम हो, मीरा है, नौकरी है, यह घर है। और क्या चाहिए?"अन्या: "कभी-कभी लगता है कि तुम अपनी नौकरी में इतना खो जाते हो कि हमसे दूर हो जाते हो। वो केस, वो एनकाउंटर, वो खतरे... मुझे डर लगता है।"आर्यव: (अन्या का हाथ पकड़ते हुए)"सुनो। ये नौकरी मैं इसलिए करता हूं कि तुम जैसी औरतें और मीरा जैसी बच्चियां सुरक्षित रहें। मैं बुरे लोगों को पकड़ता हूं ताकि अच्छे लोग बेफिक्र सो सकें। यही मेरा धर्म है। और तुम... तुम मेरी दुनिया हो। समझी?"अन्या: (आंखों में आंसू लिए)"मुझे सिर्फ इतना चाहिए कि तुम सुरक्षित रहो। वापस आओ हर रात। हमारे पास।"आर्यव: "हर रात। हमेशा। वादा।"वह अन्या को चूमता है। दोनों एक-दूसरे से लिपट जाते हैं।कट टू:बाहरी – वही घर – रातअंधेरा। घर में रोशनी है। अंदर से हल्का संगीत आ रहा है – जन्मदिन का गाना।अंदर – घर – रातकेक कट चुका है। आर्यव, अन्या और मीरा तीनों केक खा रहे हैं। मीरा का मुंह क्रीम से भरा है। आर्यव हंस रहा है।मीरा: "पापा, अब गिफ्ट खोलो! मेरा गिफ्ट पहले खोलो!"आर्यव: "अच्छा, तेरा गिफ्ट पहले।"वह मीरा का गिफ्ट खोलता है – एक रंग-बिरंगे कागज में लिपटा हुआ। अंदर एक तस्वीर है – मीरा ने खुद बनाई है। उसमें तीन लोग हैं – पापा, मम्मा और मीरा। सब हाथ पकड़े हुए। और ऊपर लिखा है – "वर्ल्ड्स बेस्ट पापा"।आर्यव की आंखें भर आती हैं। वह मीरा को गोद में उठा लेता है।आर्यव: (भरे गले से)"मेरी बच्ची... यह सबसे अच्छा गिफ्ट है। दुनिया का सबसे अच्छा।"मीरा: "पापा, तुम रो क्यों रहे हो?"आर्यव: "खुशी से, बेटा। बहुत खुशी से।"अन्या भी पास आती है। तीनों एक-दूसरे से लिपट जाते हैं। कैमरा धीरे-धीरे उनके चेहरों पर घूमता है – खुशी, प्यार, सुरक्षा।आर्यव (वॉइसओवर): (अब की आवाज़ भारी है, दर्द से भरी)"वह आखिरी रात थी जब मैंने खुशी महसूस की थी। वह आखिरी बार था जब मैं मुस्कुराया था – सच में मुस्कुराया था। उसके बाद... सब अंधेरा। सब खत्म।"कट टू:बाहरी – सड़क – देर रातआर्यव अपनी गाड़ी चला रहा है। वह घर लौट रहा है। चेहरे पर थकान है, लेकिन संतुष्टि भी।तभी फोन बजता है। वह देखता है – नंबर: कंट्रोल रूम। वह फोन उठाता है।आर्यव: "हैलो?"फोन पर आवाज़: (तेज, आपातकालीन)"आर्यव, इमरजेंसी। कलिना में एनकाउंटर है। गैंगस्टर हफीज खान स्पॉट हुआ है। टीम भेजी जा रही है, लेकिन तुम्हारी जरूरत है। तुम सबसे अच्छे शार्पशूटर हो।"आर्यव: "लेकिन सर, आज रात मेरा जन्मदिन है। मैं घर जा रहा हूं। परिवार के साथ। सेलिब्रेशन बाकी है।"फोन पर आवाज़: (कबीर राणा की आवाज़, सख्त और बेरहम – यह पहली बार है जब हम उसे सुनते हैं)"आर्यव, यह आदेश है। ड्यूटी कॉल करती है। हफीज खान बहुत खतरनाक है। अगर वह भाग गया, तो सौ मासूमों की जान खतरे में पड़ सकती है। तुम्हारी जिम्मेदारी है। तुम पुलिस हो। पुलिस की कोई छुट्टी नहीं होती, कोई जन्मदिन नहीं होता। बस ड्यूटी होती है। समझे?"आर्यव एक पल रुकता है। वह पीछे मुड़कर अपने घर की रोशनी को देखता है – दूर से वह रोशनी चमक रही है। अन्या और मीरा उसका इंतजार कर रहे होंगे।आर्यव: "ठीक है सर। मैं आ रहा हूं। लोकेशन बताइए।"फोन पर आवाज़: "कलिना। गली नंबर ७। जल्दी करो।"फोन कट जाता है। आर्यव गाड़ी मोड़ता है और विपरीत दिशा में निकल जाता है। घर की रोशनी पीछे छूट जाती है।कट टू:अंदर – आर्यव का घर – उसी रातअन्या मीरा को सुला रही है। मीरा की आंखें बंद हो रही हैं, लेकिन वह जागने की कोशिश कर रही है।मीरा: (आधी नींद में)"मम्मा... पापा कहां गए? उनका केक बाकी है। मैंने उनके लिए गाना बनाया था।"अन्या: (मीरा के बालों को सहलाते हुए)"बेटा, पापा को काम पर जाना पड़ा। कोई बहुत जरूरी काम है। वो जल्दी आएंगे। तुम सो जाओ। कल सुबह पापा तुम्हें पार्क ले जाएंगे, है ना?"मीरा: "पापा से कहना... मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं। और उनका गिफ्ट... मैंने जो तस्वीर बनाई थी... वो मेरे तकिए के नीचे है। उन्हें ले लेना कल।"अन्या: (आंखों में आंसू लिए, लेकिन मुस्कुराते हुए)"हां बेटा। वो जानते हैं। सो जाओ।"मीरा की आंखें बंद हो जाती हैं। अन्या उसे चूमती है, लाइट बंद करती है, और बाहर आ जाती है।वह बैठक में आती है। वहां केक रखा है – आधा कटा हुआ। तस्वीर रखी है – मीरा की बनाई हुई। वह तस्वीर उठाती है, देखती है। उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं।अचानक...बाहर से गोलियों की आवाज़। पास से। बहुत पास से। एक के बाद एक, लगातार। फिर चीखें। फिर और गोलियां।अन्या चौंक जाती है। वह तस्वीर छोड़ देती है, खिड़की की ओर दौड़ती है। बाहर देखती है – सड़क पर दो गाड़ियां हैं। कुछ आदमी भाग रहे हैं, कुछ गिर रहे हैं। गोलियां चल रही हैं – अंधाधुंध, हर तरफ।अन्या: (डरी हुई, आवाज में कंपन)"हे भगवान... क्या हो रहा है?"वह तुरंत मीरा के कमरे की ओर भागती है। वह दरवाजा खोलती है – मीरा सो रही है, अभी भी।अन्या: (फुसफुसाते हुए)"मीरा! मीरा उठो!"वह मीरा को उठाने की कोशिश करती है। मीरा आधी नींद में करवट बदलती है।तभी...एक गोली खिड़की तोड़ती हुई अंदर आती है। कांच के टुकड़े बिखर जाते हैं। अन्या चीखती है। वह मीरा की तरफ लपकती है, उसे बचाने के लिए उसके ऊपर झुक जाती है। अपने शरीर से ढक लेती है मीरा को।और फिर...गोलियों की बौछार। एक के बाद एक। लगातार। बेरहमी से।अन्या के शरीर में गोलियां लगती हैं – पीठ में, कंधे में, सिर में। वह मीरा के ऊपर गिर जाती है। उसका खून बह रहा है – मीरा के बालों पर, तकिए पर, दीवार पर।मीरा: (अचानक जाग जाती है, रोने लगती है)"मम्मा! मम्मा! उठो मम्मा! आपको चोट लगी है क्या? मम्मा!"अन्या जवाब नहीं देती। उसकी आंखें खुली हैं, लेकिन वह देख नहीं रही। उसके होंठ हिलते हैं – बस एक शब्द – "आर्यव..."एक आखिरी गोली।मीरा चुप हो जाती है।सन्नाटा।बाहर गोलियां रुक गई हैं। सिर्फ हवा की सीटी और दूर कुत्तों के भौंकने की आवाज़। खून का एक धार मीरा के कमरे से बाहर बह रहा है।कट टू:बाहरी – कलिना एनकाउंटर स्पॉट – उसी रातआर्यव ने हफीज खान को मार गिराया है। वह अपनी पिस्तौल नीचे करता है। उसके चारों तरफ पुलिस वाले हैं, सब उसे बधाई दे रहे हैं।पुलिस वाला: "शाबाश आर्यव! क्लीन शॉट! सीधे माथे में!"दूसरा: "तूने जान बचा ली सबकी! ये साला बहुत खतरनाक था!"आर्यव हल्का-सा मुस्कुराता है। वह अपनी घड़ी देखता है – रात के २:४७। उसे लगता है – घर पर अन्या और मीरा सो रहे होंगे।तभी उसका फोन बजता है। वह देखता है – पड़ोसी का नंबर। अजीब, इतनी रात को?आर्यव: "हैलो?"फोन पर आवाज़: (एक पड़ोसी की, बूढ़े शर्मा जी की, घबराई हुई, रोती हुई)"आर्यव बेटा! आप कहां हो? जल्दी आओ! जल्दी! आपके घर पर... गोलीबारी हुई... बहुत बुरी... मैंने देखा... बहुत गोलियां चलीं... अन्या बच्ची... जल्दी आओ!"आर्यव के हाथ से फोन गिर जाता है। वह एक पल स्थिर खड़ा रहता है। फिर वह दौड़ना शुरू करता है – पागलों की तरह। उसकी गाड़ी की तरफ, फिर गाड़ी छोड़कर, सीधे दौड़ता हुआ। उसके पीछे पुलिस वाले चिल्ला रहे हैं – "आर्यव! क्या हुआ? कहां जा रहे हो?"लेकिन वह सुनता नहीं। वह बस दौड़ता है। अंधेरे में, सुनसान सड़कों पर, सिर्फ एक ही सोच के साथ – अन्या, मीरा, प्लीज, प्लीज रहना।कट टू:अंदर – आर्यव का घर – भोर का समयआर्यव दरवाजा तोड़ता हुआ अंदर घुसता है। दरवाज़ा पहले से ही टूटा हुआ है। वह अंदर जाता है – बैठक में सब कुछ बिखरा है। सोफा पलटा हुआ, तस्वीरें टूटी हुई, दीवारों पर गोलियों के निशान।आर्यव: (चिल्लाता हुआ)"अन्या! मीरा! कहां हो तुम?"कोई जवाब नहीं। वह मीरा के कमरे की ओर भागता है। दरवाज़ा आधा खुला है। वह धक्का देता है।और वहां का नज़ारा... बर्बाद कर देने वाला।अन्या जमीन पर पड़ी है, मीरा उसके नीचे। दोनों के शरीर गोलियों से छलनी हैं। खून हर तरफ फैला है – दीवार पर, फर्श पर, बिस्तर पर, मीरा के खिलौनों पर। खून का पोखर बन गया है।आर्यव घुटनों के बल गिर जाता है। उसके मुंह से कोई आवाज़ नहीं निकलती। वह बस देखता रहता है – अन्या के खुले, बेजान आंखों को, मीरा के चेहरे पर जमे डर को।फिर वह धीरे-धीरे रेंगता हुआ उनके पास जाता है। वह अन्या के चेहरे को छूता है – वह ठंडी है। बर्फ जैसी ठंडी। वह मीरा के बालों को सहलाता है – वह भी ठंडी है। उसके छोटे-से हाथ को पकड़ता है – वह भी ठंडा।आर्यव की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। पहले धीरे-धीरे, फिर बाढ़ की तरह। वह रोता है – जोर-जोर से, बच्चों की तरह, बेआवाज़ नहीं, बल्कि दहाड़ मारकर। उसकी चीख पूरे मोहल्ले में गूंजती है।आर्यव: (चीखता हुआ)"नहीं! नहीं! अन्या! मीरा! मेरे पास वापस आओ! प्लीज़! मैं सब कुछ दूंगा! प्लीज़! मेरी बच्ची... मेरी जान... मेरा सब कुछ... नहीं..."वह उन्हें गले लगा लेता है – दोनों को एक साथ। उनका खून उसके कपड़ों पर लग जाता है। वह उन्हें छोड़ता नहीं। घंटों बीत जाते हैं। सुबह हो जाती है। पड़ोसी आते हैं, पुलिस आती है, एंबुलेंस आती है – लेकिन वह उन्हें छोड़ता नहीं। वह बैठा रहता है, अपने परिवार की लाशों के साथ।तभी उसकी नज़र दीवार पर जाती है।वहां... खून से बना एक निशान है।एक बाज़। उड़ता हुआ बाज़, पंख फैलाए, झपट्टा मारता हुआ। खून से बना हुआ, लेकिन बिल्कुल साफ, बिल्कुल सटीक।आर्यव उसे देखता है। उसकी आंखों में आंसू सूखने लगते हैं। उनकी जगह एक अलग चीज़ आती है – जलन, गुस्सा, बदले की आग। वह उठता है। उसके घुटने कांप रहे हैं, लेकिन वह खड़ा हो जाता है। वह उस निशान को देखता है – उसे अपने दिमाग में उकेर लेता है।फिर वह मुड़ता है और बाहर चला जाता है। उसके पीछे पुलिस वाले चिल्ला रहे हैं – "कहां जा रहे हो? हमें बयान देना है!" – लेकिन वह सुनता नहीं। वह बस चला जाता है। अंधेरे में। अज्ञात में।आर्यव (वॉइसओवर): (अब की आवाज़ बिल्कुल बदल गई है – वही ठंडी, बेरहम आवाज़ जो हमने शुरुआत में सुनी थी)"उस रात मैं समझ गया। यह कोई हादसा नहीं था। यह कोई गलत इंटेल नहीं था। यह कोई संयोग नहीं था कि मुझे उस रात कलिना भेजा गया, जब मेरे घर पर हमला हुआ। यह एक साजिश थी। मेरे खिलाफ। मेरे परिवार के खिलाफ। और उस साजिश का एक नाम था – इंस्पेक्टर कबीर राणा। और एक निशान था – यह बाज़। उस दिन से मैंने एक ही चीज़ सीखी – कि इस दुनिया में न्याय नहीं है। न्याय खुद बनाना पड़ता है। और मैं बनाऊंगा। चाहे जितना भी समय लगे, चाहे जितनी भी कुर्बानियां देनी पड़ें।"---दृश्य ५ – वर्तमान: पुलिस मुख्यालय | सुबह ९ बजेअंदर – क्राइम ब्रांच ऑफिस – सुबहएक बड़ा, आलीशान ऑफिस। दीवारों पर तस्वीरें – मुख्यमंत्री के साथ, पुलिस कमिश्नर के साथ, कई अवॉर्ड और प्रशस्ति पत्र। एक बड़ी लकड़ी की मेज के पीछे कुर्सी पर बैठा है – कबीर राणा (५५, सांवला रंग, कड़क चेहरा, आंखों में चालाकी, सफेद होते बाल, लेकिन अभी भी खतरनाक)। वह एसीपी की वर्दी में है, बिल्कुल सजे-धजे।सामने एक इंस्पेक्टर खड़ा है – पाटिल (४०, हड़बड़ी में, पसीने से तरबतर, लगातार गर्दन पोंछ रहा है)।पाटिल: "सर, मामला बहुत गड़बड़ है। कल रात मुंबई पोर्ट पर बारह लाशें मिली हैं। सूरज सक्सेना गायब है – वही कारोबारी जिसका तीन दिन पहले अपहरण हुआ था। सारे गार्ड मरे हुए। सब पेशेवर थे। सबके पास हथियार थे। और एक भी गोली हमारी तरफ से नहीं चली। सारी गोलियां एक ही दिशा से... एक ही हथियार से... एक ही आदमी से। फोरेंसिक के मुताबिक, सब कुछ सत्रह सेकंड में हुआ। सत्रह सेकंड में बारह लोग। यह असंभव है, सर।"कबीर राणा: (शांति से, जैसे कोई साधारण खबर सुन रहा हो, चाय की चुस्की लेते हुए)"तो क्या हुआ? कोई प्रोफेशनल काम कर गया। मुंबई में ऐसे कितने लोग हैं। ढूंढो उन्हें। पैसे दो, धमकाओ, जो करना है करो। केस बंद करो।"पाटिल: "लेकिन सर... एक चीज और मिली है। सबसे अजीब बात। एक लाश के पास... एक चिप मिली है। धातु की। उस पर एक निशान है। बाज़ का निशान। हमने ऐसा पहले कभी नहीं देखा।"वह एक चिप आगे बढ़ाता है – बिल्कुल वैसी ही जैसी आर्यव को मिली थी। उस पर बाज़ का निशान है, बिल्कुल साफ।कबीर राणा चिप देखता है। पहली बार उसके चेहरे पर भाव आता है – हल्का सा झटका, फिर तुरंत नियंत्रण। उसकी आंखों में कुछ चमकता है – पहचान? डर? या कुछ और? वह चिप को ध्यान से देखता है, उंगलियों से छूता है, फिर मेज पर रख देता है।कबीर राणा: (बिल्कुल शांत स्वर में, लेकिन आंखें खतरनाक)"यह कहां मिली?"पाटिल: "लाश के पास, सर। एक गार्ड की लाश। उसके हाथ में बंद थी। शायद उसने हमलावर से छीन ली होगी। या हमलावर ने जानबूझकर छोड़ दी हो।"कबीर राणा: (उठते हुए, खिड़की के पास जाते हुए)"ठीक है। तुम जाओ। मैं खुद इस केस को हैंडल करूंगा। किसी और को मत बताना इस चिप के बारे में। न कमिश्नर को, न मीडिया को, न किसी को। समझे?"पाटिल: (हैरान, लेकिन आदेश मानते हुए)"जी सर। बिल्कुल। किसी को नहीं बताऊंगा। लेकिन सर... यह केस तो..."कबीर राणा: (तेजी से घूमकर)"मैंने कहा ना, मैं हैंडल करूंगा। तुम जाओ। अभी।"पाटिल जल्दी से चला जाता है। दरवाजा बंद होता है। कबीर राणा खिड़की के पास जाता है। वह चिप को फिर से देखता है – उसे घुमाता है, रोशनी में देखता है। उसके चेहरे पर एक मुस्कान आती है – खतरनाक, चालाक, लगभग पागलपन भरी।कबीर राणा: (अकेले में बड़बड़ाता हुआ)"पांच साल... पांच साल बाद... वापस आ गए। बाज़... मैंने सोचा था तुम मर गए, खत्म हो गए, मैंने तुम्हें खत्म कर दिया था। लेकिन नहीं... तुम फिर उड़ने लगे। और इस बार... इस बार मैं तैयार हूं। पूरी तरह तैयार।"वह फोन उठाता है, एक नंबर डायल करता है। फोन पर घंटी बजती है – एक, दो, तीन बार – फिर कोई उठाता है।कबीर राणा: (फोन पर, धीमी आवाज़ में, लगभग फुसफुसाते हुए)"हैलो। यह राणा बोल रहा हूं। बाज़ वापस आ गया है। हमें मिलना होगा। पुरानी जगह। आज रात। ग्यारह बजे। अकेले आना।"वह फोन रखता है। उसकी आंखों में एक अजीब चमक है – उत्तेजना, डर, और बदले की आग – सब एक साथ।कबीर राणा: (खुद से, शीशे में अपना चेहरा देखते हुए)"चलो देखते हैं, कौन जीतता है इस बार। मैं या तुम।"---दृश्य ६ – राघव भसीन का अड्डा | रात ११:४५ बजेबाहरी – परेल मिल परिसर – रातमुंबई के परेल इलाके में एक पुरानी मिल। बाहर से देखने पर यह बिल्कुल खंडहर लगती है – टूटी खिड़कियाँ, जंग लगे लोहे के शटर, दीवारों पर उगी झाड़ियाँ, उजड़ी हुई चिमनी। कोई नहीं सोच सकता कि यहां कुछ भी हो सकता है। यह जगह सालों से बंद है – ऐसा लगता है।लेकिन...अंदर – मिल का भीतरी हिस्सा – रातअंदर का नज़ारा बिल्कुल अलग है। पुरानी मिल को पूरी तरह से हाई-टेक कंट्रोल रूम में बदल दिया गया है। दीवार पर दर्जनों LED स्क्रीन लगी हैं, जिन पर लगातार सूचनाएं बह रही हैं – सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन कैमरा फीड, डेटा स्ट्रीम, उपग्रह चित्र। दुनिया भर की खबरें, एक ही जगह।एक तरफ हथियार रखे हैं – पिस्तौल से लेकर ग्रेनेड लॉन्चर तक, स्नाइपर राइफल से लेकर चाकू तक। दूसरी तरफ दस्तावेज़ों से भरी फाइलिंग कैबिनेट। हर फाइल पर एक नाम – राजनेता, व्यापारी, गैंगस्टर, बॉलीवुड सितारे, पुलिस अधिकारी, न्यायाधीश, पत्रकार। हर किसी की फाइल। हर किसी का राज़।कमरे के मध्य में एक बड़ी लकड़ी की मेज है – प्राचीन, भारी, नक्काशीदार। उसके पीछे कुर्सी पर बैठा है – राघव भसीन (६५, सफेद दाढ़ी, चेहरे पर झुर्रियाँ, लेकिन आँखों में बर्फीली ठंडक, हाथ में हमेशा विस्की का गिलास)। वह सफेद कुर्ता-पायजामा पहने है, गले में एक पुराना दुपट्टा। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं है – वह सिर्फ देख रहा है, सुन रहा है, समझ रहा है।कमरे में चार और आदमी हैं – राघव के निजी अंगरक्षक। वे दीवारों के सहारे खड़े हैं, पूरी तरह सतर्क, पूरी तरह चुप। उनके हाथ हथियारों पर हैं। उनकी आंखें हर हरकत पर नज़र रख रही हैं।दरवाज़ा खुलता है। आर्यव अंदर आता है। उसके कपड़े अब भी गीले हैं – बाहर बारिश हो रही है। खून के धब्बे सूखने लगे हैं, काले पड़ गए हैं। वह सीधा राघव की मेज के पास जाता है, बिना किसी से बात किए, बिना किसी की तरफ देखे। उसके चेहरे पर वही ठंडक है।वह चिप मेज पर फेंकता है। चिप लकड़ी पर घूमती हुई रुक जाती है – बाज़ का निशान ऊपर की तरफ।राघव: (आवाज़ में वही ठंडक, बिना किसी भाव के, मानो रोज़ की बात हो)"काम साफ था?"आर्यव: (बैठते हुए, सीधे राघव की आंखों में देखते हुए)"बारह। सत्रह सेकंड। टारगेट SUV में है। बाकी तुम्हारे आदमी संभाल लेंगे। पैसा पुराने अकाउंट में डाल देना।"राघव: (चिप को न देखते हुए, आर्यव को देखते हुए)"तो फिर यह चिप? इसे लाने की क्या जरूरत थी?"आर्यव: (चिप की तरफ इशारा करते हुए)"यह किसका खेल है, राघव? यह चिप वहां थी। जानबूझकर रखी गई थी। मेरे लिए।"राघव चिप को उठाता है, ध्यान से देखता है – उसे घुमाता है, रोशनी में देखता है, उंगलियों से छूता है। उसके चेहरे पर कोई बदलाव नहीं, लेकिन उसकी आंखों में एक हल्की-सी चमक आती है – पहचान की, या शायद चिंता की।राघव: (चिप मेज पर रखते हुए, गहरी सांस लेते हुए)"तुम्हें नहीं पता होना चाहिए, आर्यव। तुम सिर्फ काम करते हो। सवाल नहीं पूछते। पैसे लेते हो, टारगेट खत्म करते हो, गायब हो जाते हो। यही हमारा समझौता था। यही तुमने चुना था।"आर्यव: (आवाज़ में पहली बार थोड़ी गर्मी)"जब कोई मेरे नाम से संदेश भेजे, तब मुझे पता होना चाहिए। जब कोई मेरे अतीत को हथियार बनाए, तब मुझे जानने का हक है। मैं अब सिर्फ एक मशीन नहीं हूं, राघव। मैं वही आदमी हूं जिसका परिवार पांच साल पहले मारा गया था। और यह चिप... यह उसी रात की याद दिलाती है।"राघव गहरी सांस लेता है। वह अपने गिलास से एक लंबा घूंट लेता है – विस्की उसके गले से उतरती है। फिर वह धीरे से बोलता है – उसकी आवाज़ में अब थोड़ी नरमी है, लगभग पिता जैसी।राघव: "तुम्हारा अतीत खत्म हो चुका है, आर्यव। वो लोग, वो ज़िंदगी, वो सब... खत्म। तुमने खुद ही उसे मार दिया था, उस रात। याद है? उस रात जब तुमने अपनी पत्नी और बेटी को खोया था? तुम वहाँ से उठे, और एक नए इंसान बन गए। 'निशान'। और निशान का कोई अतीत नहीं होता। बस एक मिशन होता है। अगला टारगेट।"आर्यव के जबड़े की मांसपेशियां तन जाती हैं। उसके हाथ की उंगलियां मुट्ठी में बदल जाती हैं – इतनी जोर से कि नाखून हथेली में गड़ जाते हैं। लेकिन वह कुछ नहीं बोलता। उसकी आंखों में दर्द और गुस्सा एक साथ उबल रहे हैं।आर्यव: (धीमे, लेकिन दृढ़ स्वर में, हर शब्द पर जोर देते हुए)"अतीत कभी खत्म नहीं होता, राघव। वो इंतज़ार करता है। सही वक्त का। सही मौके का। और मुझे लगता है... वो वक्त आ गया है। अब मैं और इंतज़ार नहीं करूंगा।"वह चिप को मेज से उठाता है और अपनी जेब में रख लेता है – सावधानी से, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो। राघव उसे रोकने की कोशिश नहीं करता। वह जानता है कि यह बेकार होगा।राघव: (आखिरी चेतावनी की तरह)"आर्यव... कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जिन पर वापस नहीं लौटना चाहिए। कुछ सच ऐसे होते हैं जिन्हें जानना ठीक नहीं। कुछ दुश्मन ऐसे होते हैं जिनसे लड़ना... आत्महत्या है। तुम अभी भी रुक सकते हो। यहीं। अभी।"आर्यव: (मुड़ते हुए, दरवाजे की ओर बढ़ते हुए)"मैं वापस नहीं लौट रहा, राघव। मैं आगे बढ़ रहा हूं। उसी रास्ते पर जो पांच साल पहले बंद हो गया था। और इस बार... कोई नहीं रोक सकता।"आर्यव दरवाज़े की ओर बढ़ता है। उसके कदमों की आवाज़ खाली कमरे में गूंज रही है। राघव पीछे से कहता है:राघव: "बाज़ का चिन्ह... वो किसी एक का नहीं है। वो एक संस्था का है। एक ऐसी संस्था जिसे हमने कभी हराया नहीं, बस दूर रखा। दबा कर रखा। और अगर वो वापस आ गए हैं... तो यह सिर्फ तुम्हारी लड़ाई नहीं होगी। यह हम सबकी लड़ाई होगी। और इसमें... बहुत खून बहेगा।"आर्यव रुकता है, लेकिन मुड़ता नहीं। वह दरवाजे की ओर देखता है, कुछ पल सोचता है।आर्यव: (बिना मुड़े)"तो फिर लड़ाई शुरू हो चुकी है। और खून... खून तो बहना ही है। सवाल सिर्फ इतना है कि किसका।"वह बाहर चला जाता है। दरवाज़ा बंद होता है – धीमी, भारी आवाज़ के साथ।राघव उसे जाते हुए देखता है। फिर वह एक बटन दबाता है – अपनी मेज के नीचे। एक स्क्रीन सक्रिय होती है, दीवार पर एक तस्वीर आती है – एक आदमी की। कबीर राणा। इंस्पेक्टर कबीर राणा – अब एसीपी। तस्वीर के साथ जानकारी चलती है – उसका पूरा रिकॉर्ड, उसके कनेक्शन, उसके राज़।राघव: (अकेले में, धीमे स्वर में, लगभग फुसफुसाते हुए)"पांच साल... तुमने पांच साल इंतज़ार किया, कबीर। और अब तुमने उसे जगा दिया। उस आदमी को जिसे कभी नहीं जगाना चाहिए था। अब देखते हैं कि आग किसे जलाती है। और देखते हैं कि इस बार... कौन बचता है।"वह विस्की का गिलास उठाता है, एक लंबा घूंट लेता है, और स्क्रीन पर कबीर की तस्वीर देखता रहता है।
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दृश्य ७ – धारावी की गलियां | दोपहर १२ बजे
बाहरी – धारावी की संकरी गलियां – दोपहर
धारावी – एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती। यहां हर गली में जिंदगी अपने पूरे शोर के साथ बहती है। संकरी गलियां, जहां दो लोग मुश्किल से साथ चल सकते हैं। ऊपर बिजली के तारों का जाल, जैसे कोई मकड़ी ने अपना जाल बिछा रखा हो। नीचे खुले नाले, गंदगी, कीचड़। दुकानें – चाय की, सब्जी की, कपड़े की, हर तरह की। ठेले – फलों के, चाट के, खिलौनों के। बच्चे खेल रहे हैं – गली में क्रिकेट, लेकिन बॉल की जगह प्लास्टिक की बोतल। औरतें कपड़े सुखा रही हैं – रंग-बिरंगे कपड़े, बालकनियों में लटके। गली के बीच से एक कुत्ता गुजरता है, कूड़ा चुनता हुआ।
इस भीड़-भाड़ में एक आदमी चल रहा है – आर्यव। उसने साधारण कपड़े पहने हैं – फटी जीन्स, पुरानी कमीज, सिर पर टोपी, आंखों पर काला चश्मा। वह बिल्कुल आम लगता है – एक और आदमी, एक और चेहरा। कोई उसे ध्यान से नहीं देखता। वह गलियों में घूमता है, कभी इधर देखता है, कभी उधर। वह किसी की तलाश में है।
वह एक छोटी-सी चाय की दुकान के पास रुकता है। दुकान बहुत पुरानी है – लोहे की चद्दरों से बनी, अंदर दो-चार स्टूल, बाहर कुछ लकड़ी के बक्से रखे हैं। दुकान के मालिक – सलीम (६०, झुका हुआ, झुर्रियों भरा चेहरा, लेकिन आंखें तेज, अनुभवी) – चाय बना रहे हैं। उनके हाथ कांपते हैं, लेकिन चाय बनाने का काम बखूबी करते हैं।
आर्यव पास जाता है, एक स्टूल पर बैठ जाता है।
आर्यव: "एक चाय। कड़क।"
सलीम उसे देखता है – एक नज़र में ही उसे पढ़ लेता है। वह चाय बनाता है, और रख देता है आर्यव के सामने।
आर्यव: (चाय की चुस्की लेते हुए, धीमे से)
"एक आदमी का पता चाहिए।"
सलीम आर्यव की ओर देखता है। उसकी आंखें आर्यव के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती हैं – टोपी के नीचे, चश्मे के पीछे।
सलीम: (चाय के गिलास पोंछते हुए, बिना किसी भाव के)
"यहां हर किसी को किसी न किसी का पता चाहिए। कौन सा आदमी?"
आर्यव: "गुलाब। गुलाब भाई।"
सलीम के हाथ की गति रुक जाती है – बस एक पल के लिए। फिर वह फिर से गिलास पोंछने लगता है। उसके चेहरे पर हल्का सा बदलाव आता है – पहचान का, सावधानी का।
सलीम: (चारों तरफ देखता है, फिर धीमे से)
"गुलाब भाई अब नहीं रहे। दो साल हो गए। पुलिस एनकाउंटर में मारे गए। झूठा एनकाउंटर। सब जानते हैं, पर कुछ नहीं कर सकते।"
आर्यव: "तो उनका बेटा। करीम।"
सलीम चौंक जाता है – असल में चौंक जाता है। वह आर्यव को गौर से देखता है – ऊपर से नीचे तक।
सलीम: (हैरानी से)
"तुम करीम को जानते हो? उसे तो कोई नहीं जानता। वो तो... वो तो बिल्कुल छुप कर रहता है। पुलिस से डरता है। सबसे डरता है। तुम कौन हो?"
आर्यव: (चाय की चुस्की लेते हुए, बिल्कुल शांत)
"वो कहां है?"
सलीम एक पल रुकता है – सोचता है। फिर वह एक दिशा में इशारा करता है – सिर के इशारे से, दाएं तरफ।
सलीम: "उस गली के अंत में एक पुरानी मस्जिद है। उसके ठीक पीछे एक मकान है – दो मंजिला, नीले रंग का दरवाजा। वहीं रहता है। तीसरी मंजिल पर। लेकिन सावधान रहना। वो किसी पर भरोसा नहीं करता। किसी से बात नहीं करता। पुलिस ने उसके बाप को उसके सामने मारा था। उसने देखा था। तब से पागल-सा हो गया है।"
आर्यव चाय की चुस्की लेता है – आखिरी घूंट। फिर वह पचास रुपये का नोट निकालकर रख देता है – चाय की कीमत से कहीं ज्यादा।
सलीम: (नोट देखकर)
"बहुत है बेटा। बहुत ज्यादा।"
आर्यव: (उठते हुए)
"बाकी तुम्हारी चुप्पी के लिए। मैं यहां नहीं आया था। समझे?"
सलीम सिर हिलाता है – एक बार, धीरे से। वह समझ गया है। आर्यव चला जाता है – गली के अंत में, मस्जिद की तरफ।
सलीम उसे जाते हुए देखता है। वह नोट को देखता है, फिर आर्यव की पीठ को। उसके चेहरे पर एक अजीब-सा भाव आता है – डर, हैरानी, और कुछ और।
सलीम: (खुद से बड़बड़ाता हुआ)
"ये आदमी... ये कोई आम नहीं है। ये तो... ये तो जैसे मौत खुद चल रही हो। जैसे किसी कब्र से उठा हो। गुलाब के बेटे को क्या चाहिए इससे? और गुलाब... उसकी तो बात ही अलग थी।"
वह चाय बनाना शुरू करता है – अगले ग्राहक के लिए। लेकिन उसके हाथ अब और कांप रहे हैं।
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दृश्य ८ – करीम का मकान | दोपहर १ बजे
बाहरी – पुरानी मस्जिद के पीछे की गली – दोपहर
आर्यव एक संकरी गली में है। यह और भी तंग है – बस एक आदमी चल सकता है। दोनों तरफ पुराने मकान – एक-दूसरे से सटे हुए, ऊपर की मंजिलें नीचे की तरफ झुकी हुई। सामने एक नीले रंग का दरवाजा है – पेंट उखड़ रहा है, लोहे की जंग लगी ग्रिल लगी है।
आर्यव दरवाजे के पास जाता है। वह चारों तरफ देखता है – कोई नहीं है। फिर वह दरवाजे पर दस्तक देता है – दो बार, फिर एक बार, फिर दो बार – एक तयशुदा पैटर्न।
कोई जवाब नहीं। वह फिर दस्तक देता है – वही पैटर्न।
अंदर से हलचल की आवाज़ आती है – कोई धीरे-धीरे आ रहा है। फिर एक खिड़की थोड़ी सी खुलती है – ऊपर की मंजिल पर। एक आदमी झांकता है – सिर्फ आंखें दिख रही हैं, बाकी चेहरा अंधेरे में।
आवाज़: (ऊपर से, डरी हुई, कर्कश)
"कौन है? क्या चाहिए?"
आर्यव: (ऊपर देखते हुए, शांत स्वर में)
"करीम? करीम गुलाब?"
आवाज़: "कौन पूछ रहा है? किसने भेजा?"
आर्यव: "नीचे आ। बात करनी है। तेरे बाप के बारे में।"
एक लंबा सन्नाटा। फिर खिड़की बंद हो जाती है। फुटस्टेप्स की आवाज़ – सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए। फिर दरवाज़े की कई कुंडियाँ खुलती हैं – एक-एक करके, धीरे-धीरे। आखिर में दरवाज़ा खुलता है – एक दरार भर के लिए।
अंदर से करीम (२२, पतला, बीमार-सा दिखता है, आंखों में गहरा दर्द और डर, बाल बिखरे, कपड़े मैले) झांकता है। उसकी आंखें लाल हैं, नींद की कमी से। उसके हाथ में एक चाकू है – छोटा, लेकिन तेज।
करीम: (शक्की निगाहों से)
"अंदर आ। लेकिन हाथ ऊपर रख। कोई हरकत नहीं।"
आर्यव हाथ ऊपर करता है – धीरे से, शांति से। वह अंदर घुसता है। करीम दरवाजा बंद करता है – फिर से सारी कुंडियाँ लगाता है।
अंदर – करीम का कमरा – दोपहर
एक छोटा-सा, अंधेरा कमरा। खिड़कियाँ बंद हैं, परदे गिरे हुए। एक सिंगल बेड है – बिना बिछावन के। एक टूटी हुई अलमारी। एक टेबल – उस पर पुरानी तस्वीरें, कुछ कागजात, एक मोमबत्ती। दीवार पर एक शेल्फ है – उस पर रखी हैं कुछ किताबें और एक पुराना ट्रांजिस्टर।
करीम आर्यव को देखता है – उसे पहचानने की कोशिश करता है। चाकू अभी भी उसके हाथ में है।
करीम: "बोल। क्या चाहिए? किसने भेजा? पुलिस?"
आर्यव: (धीरे से अपने हाथ नीचे करता है, चश्मा उतारता है, टोपी हटाता है)
"मैं पुलिस नहीं हूं।"
करीम: "तो कौन है? पत्रकार? वकील? कोई और जो मुझे इस्तेमाल करना चाहता है?"
आर्यव: "एक आदमी जिसका परिवार भी पुलिस ने मारा। झूठे एनकाउंटर में। ठीक तेरे बाप की तरह।"
करीम ठिठकता है। चाकू थोड़ा नीचे हो जाता है। वह आर्यव को गौर से देखता है – उसकी आंखों में, उसके चेहरे पर।
करीम: (शक्की, लेकिन उत्सुक)
"तेरा परिवार?"
आर्यव: "पत्नी और बेटी। पांच साल पहले। मुलुंड में।"
करीम की आंखें फैल जाती हैं। वह एक कदम पीछे हटता है – हैरानी से।
करीम: "मुलुंड वाला एनकाउंटर? वो तो अखबार में भी था। टीवी पर भी आया था। लिखा था – गैंगस्टर हफीज खान ने एक पुलिस वाले के घर पर हमला किया, परिवार को मार डाला। मैंने पढ़ा था। तब मेरे बाप को मरे हुए कुछ ही महीने हुए थे। मुझे याद है।"
आर्यव: (ठंडी आवाज़ में, हर शब्द पर जोर देते हुए)
"अखबार झूठ लिखते हैं। टीवी झूठ दिखाता है। हफीज खान उस वक्त मेरे सामने था – कलिना में। मैंने उसे मारा। उसी वक्त, उसी समय, जब मेरे घर पर हमला हुआ। और वहां... कोई और था। वही जिसने मेरा परिवार मारा।"
करीम: (हैरान, लेकिन समझने की कोशिश करता हुआ)
"कौन? कौन था?"
आर्यव: "यही जानने आया हूं तुझसे। तेरा बाप गुलाब उस रात वहां था। मेरे घर के पास। उसने कुछ देखा होगा। कुछ सुना होगा।"
करीम सन्न रह जाता है। वह दीवार की ओर देखता है – वहां उसके पिता की तस्वीर लगी है – एक बड़ी, पुरानी तस्वीर, जिसमें गुलाब मुस्कुरा रहा है। फिर वह आर्यव की ओर देखता है। उसकी आंखों में आंसू हैं।
करीम: (धीमे से, लगभग फुसफुसाते हुए)
"मेरे बाप को उस रात बुलाया गया था। किसी बड़े आदमी ने। वो रात को घर से निकला – जल्दी-जल्दी, बिना कुछ बताए। मैंने पूछा भी था – कहां जा रहे हो, अब्बा? तो उन्होंने कहा – काम है, बेटा। बहुत जरूरी काम। जल्दी वापस आऊंगा। और वो... वो वापस नहीं आए।"
आर्यव: (धैर्य से)
"आगे बता।"
करीम: "अगले दिन उनकी लाश मिली – धारावी के बाहर, खार की तरफ। पुलिस ने कहा – एनकाउंटर में मारा गया। गैंगस्टरों के साथ मुठभेड़। लेकिन मुझे पता है... मैं जानता हूं... वो एनकाउंटर नहीं था। वो सुनियोजित हत्या थी। उनके शरीर पर गोलियां पीछे से लगी थीं। पीछे से, समझे? भागते हुए आदमी पर गोलियां। एनकाउंटर में ऐसा नहीं होता।"
आर्यव: "किसने बुलाया था उन्हें उस रात?"
करीम: "मुझे नहीं पता। वो कभी बताते नहीं थे। लेकिन उस रात के बाद... एक चीज मिली थी उनकी जेब से। पुलिस ने नहीं देखी। उनके कपड़े जल्दी में मिले थे, मैंने ठीक से देखा तो वह चीज मिली। मैंने छुपा ली।"
करीम: (घबराया हुआ, लेकिन उत्सुक)
"क्या चीज?"
करीम उठता है – धीरे-धीरे, लंगड़ाते हुए। वह अलमारी के पास जाता है, उसे सरकाता है। पीछे दीवार में एक छोटा-सा छेद है – उसमें से वह एक डिब्बा निकालता है – छोटा, धातु का। वह उसे आर्यव को देता है – उसके हाथ कांप रहे हैं।
आर्यव डिब्बा खोलता है। अंदर एक चिप है – धातु की, पुरानी, मैली। उस पर एक निशान है – वही बाज़। बिल्कुल वैसा ही जैसा उसे पोर्ट पर मिला था।
आर्यव के चेहरे पर एक हल्का सा भाव आता है – संतोष? पहचान? वह चिप को देखता है – उसे घुमाता है, रोशनी में देखता है।
आर्यव: (धीमे से)
"यही। यही वो चीज है। यही निशान।"
करीम: "तू जानता है ये क्या है? ये निशान किसका है?"
आर्यव: (चिप को जेब में रखते हुए)
"हां। और अब मुझे पता है कि मेरा अगला कदम क्या होगा। और तेरे बाप का कातिल कौन है।"
वह उठता है – जाने को तैयार। करीम उसे रोकता है – उसका हाथ पकड़ लेता है। उसकी आंखों में एक चमक है – उम्मीद की, बदले की।
करीम: "मुझे भी ले चल। मैं भी अपने बाप का बदला लेना चाहता हूं। पांच साल से इसी दिन का इंतजार कर रहा हूं। इसी लम्हे का।"
आर्यव उसे देखता है – एक लंबी, गहरी नज़र से। वह करीम की आंखों में देखता है – उसका दर्द, उसका डर, उसकी आग।
आर्यव: (ठंडी, साफ आवाज़ में)
"बदला कोई खेल नहीं है, करीम। यह कोई फिल्म नहीं है कि अंत में सब ठीक हो जाएगा। यह रास्ता एक तरफा है। इस पर चलोगे तो वापसी नहीं होगी। तू वही बन जाएगा जिससे तू आज भागता है। एक कातिल। एक हत्यारा। तैयार है?"
करीम: (बिना किसी हिचकिचाहट के)
"मेरे पास खोने को कुछ नहीं है। बस यह जान लूं कि मेरे बाप को किसने मारा। और उसे मार सकूं। मेरी मां भी मर गई – गम में। दो साल पहले। मैं अकेला हूं। बिल्कुल अकेला। तू भी अकेला है – मैं देख सकता हूं तेरी आंखों में। हम दोनों एक जैसे हैं।"
आर्यव एक पल रुकता है – करीम की बात सोचता है। फिर वह धीरे से सिर हिलाता है।
आर्यव: "ठीक है। लेकिन एक शर्त पर – जो मैं कहूं, वही करोगे। सवाल नहीं, एतराज नहीं। जब मैं चुप रहने को कहूं, चुप रहोगे। जब मैं भागने को कहूं, भागोगे। समझा?"
करीम: (उत्साह और डर के मिश्रण के साथ)
"समझ गया। पूरी तरह समझ गया।"
दोनों बाहर निकलते हैं। अंधेरे कमरे में सिर्फ करीम के पिता की तस्वीर रह जाती है – दीवार पर, मुस्कुराती हुई।
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दृश्य ९ – अंडरग्राउंड फाइट क्लब | रात १० बजे
बाहरी – एक परित्यक्त सबवे स्टेशन – रात
मुंबई के बाहरी इलाके में, किसी सुनसान जगह पर, एक पुराना, बंद सबवे स्टेशन है। ऊपर से देखने पर यह सिर्फ एक खंडहर है – टूटी सीढ़ियाँ, जंग लगी रेलिंग, उजड़ा हुआ प्लेटफॉर्म। लेकिन अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो वहां आने-जाने वालों की हल्की-सी आवाज़ सुनाई देगी।
आर्यव और करीम अंधेरे में छुपे खड़े हैं। सामने सबवे का प्रवेश द्वार है – दो बड़े-बड़े आदमी वहां खड़े हैं, हाथों में हथियार। वे हर आने वाले को चेक कर रहे हैं।
करीम: (फुसफुसाते हुए)
"ये क्या जगह है? यहां क्या होता है?"
आर्यव: (शांति से)
"यहां पैसे के लिए लोग लड़ते हैं। और कभी-कभी... जानकारी के लिए। ये मुंबई का सबसे बड़ा अंडरग्राउंड फाइट क्लब है। यहां वो लोग आते हैं जिनका कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं। यहां सिर्फ खून और पैसा बोलता है।"
करीम: "और हम यहां क्यों आए हैं?"
आर्यव: "यहां एक आदमी मिलेगा – रमजान। ये क्लब उसी का है। उसके पास हर तरह की जानकारी होती है। हर अंडरवर्ल्ड की खबर उस तक पहुंचती है। वही हमें बता सकता है कि कबीर राणा तक कैसे पहुंचना है।"
वह आगे बढ़ता है। करीम उसके पीछे।
अंदर – फाइट क्लब – रात
नीचे का नज़ारा बिल्कुल अलग है। एक बड़ा हॉल, जो कभी सबवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म रहा होगा, अब एक विशाल फाइट क्लब में बदल चुका है। चारों तरफ लोहे की जालियाँ, ऊपर मंद रोशनी के बल्ब। हर तरफ भीड़ है – कम से कम तीन-चार सौ लोग। धुआं – सिगरेट, बीड़ी, हुक्का – सबका मिला हुआ। शराब की बोतलें हाथों में। चीखें, सीटियाँ, गालियाँ।
बीच में एक रिंग बनी है – लोहे की जाली से घिरा हुआ अखाड़ा, अंदर सिर्फ खून और पसीने से सना फर्श। वहां दो आदमी लड़ रहे हैं – नंगे हाथों, बिना किसी नियम के। उनके शरीर पर खून के धब्बे हैं, चेहरे सूजे हुए। भीड़ दीवानी हो रही है – चिल्ला रही है, पैसे लगा रही है, अपने-अपने फाइटर का नाम पुकार रही है।
आर्यव और करीम भीड़ में घुसते हैं। करीम हैरान होकर इधर-उधर देखता है – उसने ऐसा कभी नहीं देखा। आर्यव का चेहरा बिल्कुल स्थिर है – वह सिर्फ अपने लक्ष्य की तलाश में है।
वह एक आदमी के पास जाता है – रमजान (५०, मोटा, चेहरे पर चोट के पुराने निशान, एक आंख कमजोर, हाथ में पैसों की गड्डी, गले में सोने की चेन)। वह रिंग के सबसे करीब बैठा है, एक आलीशान कुर्सी पर – मानो राजा हो। उसके आसपास चार-पांच गुंडे खड़े हैं, हथियारों से लैस।
आर्यव उसके पास जाता है। एक गुंडा उसे रोकता है।
गुंडा: "रुक। कौन है? क्या चाहिए?"
आर्यव: (गुंडे की आंखों में देखते हुए, बिल्कुल शांत)
"रमजान से मिलना है।"
गुंडा: (हंसते हुए)
"रमजान से मिलना है? यहां हर किसी को मिलना होता है। पीछे हट।"
आर्यव एक पल रुकता है। फिर वह अपनी जेब से पैसे निकालता है – दस हजार रुपये की गड्डी – और गुंडे के हाथ में रख देता है।
आर्यव: "अब बता दो।"
गुंडा पैसे देखता है, फिर आर्यव को देखता है। वह कुछ सोचता है, फिर एक तरफ हट जाता है। आर्यव रमजान के पास जाता है, उसके कान में धीरे से कहता है।
आर्यव: "रमजान। बात करनी है। अकेले में।"
रमजान धीरे-धीरे मुड़ता है – आर्यव को ऊपर से नीचे देखता है। उसकी एक आंख में चालाकी है, दूसरी में शक।
रमजान: (मोटी आवाज़ में)
"तू कौन है बे? पहचाना नहीं तुझे। नया है?"
आर्यव: "एक दोस्त। जानकारी चाहिए। अच्छी जानकारी।"
रमजान: (हंसते हुए)
"जानकारी की कीमत होती है। बहुत ज्यादा कीमत।"
आर्यव: "कितनी?"
रमजान: "पचास हजार। पहले पैसे। फिर बात।"
आर्यव बिना कुछ कहे अपनी जेब से पैसे निकालता है – पचास हजार की मोटी गड्डी – और रमजान के हाथ में रख देता है। रमजान पैसे गिनता है – एक-एक नोट – संतुष्ट होता है।
रमजान: (पैसे जेब में रखते हुए)
"बोल। क्या जानना है? लेकिन ध्यान रख – झूठ बोला तो यहीं खत्म कर दूंगा।"
आर्यव: (सीधे, बिना घूमे)
"एसीपी कबीर राणा। उसके बारे में सब कुछ। उसके दुश्मन, उसके दोस्त, उसके राज़, उसकी कमजोरियां। वो सब जो अखबार में नहीं छपता।"
रमजान के चेहरे का रंग बदल जाता है। उसकी आंखों में डर और चालाकी एक साथ आती है। वह चारों तरफ देखता है, फिर आर्यव को करीब ले जाता है – उसके कान में फुसफुसाता है।
रमजान: (धीमी, डरी हुई आवाज़ में)
"ये नाम मत लिया कर यहां, बे। बहुत खतरनाक आदमी है। उसके कान हर जगह हैं। यहां भी। मैं ये बात कर रहा हूं, शायद उसे पता चल जाए। तू कौन है जो उसके बारे में पूछ रहा है?"
आर्यव: "मैं खतरों से डरकर यहां नहीं आया। बस बता दे। मैं चला जाऊंगा।"
रमजान एक पल सोचता है – उसे तौलता है। फिर वह धीरे से कहता है:
रमजान: "ठीक है। सुन। कबीर राणा सिर्फ पुलिस वाला नहीं है। वो एक सिस्टम है। एक पूरा नेटवर्क है। उसकी पहुंच हर जगह है – अंडरवर्ल्ड से लेकर सियासत तक, पुलिस से लेकर मीडिया तक। वो जिसे चाहता है बचाता है, जिसे चाहता है मरवाता है। उसके खिलाफ जाने का मतलब मौत को गले लगाना है। लेकिन..."
आर्यव: "लेकिन?"
रमजान: "लेकिन एक आदमी है जो उससे नफरत करता है। और उस आदमी के पास कबीर के सारे राज़ हैं।"
आर्यव: "कौन?"
रमजान: "विक्रांत पवार। पूर्व मंत्री। बड़ा आदमी था कभी। कबीर ने उसके बेटे को एनकाउंटर में मार दिया था – झूठा एनकाउंटर। सब जानते हैं। विक्रांत ने शिकायत की, केस किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। उल्टे उसी पर केस हो गए – भ्रष्टाचार के, साजिश के। अब वो अर्थर कमांडो जेल में है – उम्रकैद की सजा काट रहा है। अगर किसी को कबीर के बारे में सच पता है, तो वो विक्रांत है। बिल्कुल विक्रांत।"
आर्यव: "जेल में उससे कैसे मिलूं? अर्थर जेल तक पहुंचना आसान नहीं है।"
रमजान: (शरारती मुस्कान के साथ)
"मिलना मुश्किल है। बिना परमिशन के तो नामुमकिन। लेकिन अगर तू वहां तक पहुंचना चाहता है... तो एक रास्ता है। एक ही रास्ता।"
आर्यव: "बता।"
रमजान: "विक्रांत के आदमी हर महीने उससे मिलने जाते हैं। उसके वफादार। अगला दौरा तीन दिन बाद है। अगर तू उनमें से किसी की जगह ले ले... तो अंदर जा सकता है।"
आर्यव: "उनमें से किसी की जगह? यानी?"
रमजान: "उनका मुखिया है – भाऊ। रॉ फाइटर है। करीब अस्सी-नब्बे किलो का। मशीन है, आदमी नहीं। कभी हारा नहीं। उसने अब तक सैंतालीस फाइट जीती हैं इस क्लब में। चार आदमी मर चुके हैं उसके हाथों। आज रात वो यहां लड़ने वाला है – एक चैलेंज के लिए। अगर तू उसे हरा दे... तो उसकी जगह ले सकता है। विक्रांत के आदमी उसे मानेंगे।"
आर्यव बिना कुछ कहे रिंग की ओर बढ़ता है। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं है।
रमजान: (चिल्लाता है)
"अरे सुन! पागल है क्या? वो बहुत खतरनाक है! मर जाएगा तू! मैंने देखे हैं उसके हाथों मरने वाले!"
आर्यव पीछे मुड़कर देखता है – एक आखिरी बार।
आर्यव: (बिल्कुल शांत, बिना किसी भाव के)
"मरना मेरी फितरत में नहीं, रमजान। मैं मरने के लिए नहीं बना। मैं मारने के लिए बना हूं।"
वह रिंग की ओर चला जाता है। करीम उसके पीछे-पीछे, डरा हुआ, लेकिन हैरान भी।
करीम: (आर्यव से)
"तू सच में उससे लड़ेगा? उसे देखा है? वो तो जानवर लगता है!"
आर्यव: "जानवरों से भी लड़ना आता है मुझे।"
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दृश्य १० – फाइट | रात १०:३०
अंदर – फाइट क्लब रिंग – रात
भीड़ पागल हो रही है। हर तरफ चीखें, सीटियाँ, गालियाँ। लोग हाथों में पैसे लहरा रहे हैं, दांव लगा रहे हैं। माहौल में बिजली-सी दौड़ रही है।
रिंग के बीच में भाऊ (४०, १२० किलो, मांसपेशियों का पहाड़, सिर मुंडा हुआ, चेहरे पर चोटों के गहरे निशान, छाती पर बाल, शरीर पर टैटू) खड़ा है। वह हवा में मुक्के चला रहा है – एक-एक मुक्के में ताकत है, हवा कटती है। भीड़ को उत्तेजित कर रहा है, गुर्रा रहा है।
भाऊ: (चिल्लाता है)
"और कौन है? और किसे मरना है? लाओ सामने! मैं खड़ा हूं!"
भीड़ और पागल हो जाती है।
आर्यव रिंग में घुसता है – धीरे-धीरे, शांति से। उसने अपनी कमीज उतार दी है – उसके शरीर पर पुराने चोटों के निशान हैं, गोलियों के दाग, चाकू के निशान। एक मानचित्र की तरह उसका शरीर – उसकी कहानी बयां करता हुआ।
भीड़ एक पल के लिए चुप हो जाती है – हैरानी से। फिर जोर से हंसती है, सीटियाँ बजाती है।
एक आदमी भीड़ से: (चिल्लाता है)
"ये कौन है? भाऊ के सामने? हाथी के सामने चींटी!"
दूसरा: (हंसते हुए)
"पैसे लगाओ! भाऊ पर लगाओ! पक्का जीत!"
भीड़ में हंगामा। लोग पैसे लगा रहे हैं – सब भाऊ पर। कोई आर्यव पर नहीं लगा रहा।
रमजान रिंग के बाहर से आर्यव को देखता है। उसके चेहरे पर चिंता और हैरानी दोनों हैं।
रमजान: (करीम से, जो पास में खड़ा है)
"तेरा दोस्त पागल है? सच में पागल है? भाऊ ने अब तक ४७ आदमी मारे हैं इस रिंग में। चार की मौत हो चुकी है – सीधे मौत। बाकी तो जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो गए। और ये... ये तो दुबला-पतला है।"
करीम: (डरा हुआ, लेकिन उम्मीद से)
"वो... वो पागल नहीं है। वो... वो 'निशान' है। उसका नाम सुना है?"
रमजान: (हैरान)
"निशान? वो किंवदंती? वो असली है?"
करीम: "देखता रह।"
रिंग में घंटी बजती है – एक पुरानी, भारी घंटी की आवाज़। लड़ाई शुरू।
भाऊ गुर्राता हुआ आर्यव की ओर बढ़ता है। उसके हाथ बड़े-बड़े, मुक्के भारी। उसका पहला मुक्का आर्यव के सिर की ओर आता है – तेज, जोरदार। आर्यव बचता है – बाल-बाल। दूसरा मुक्का – पेट में। आर्यव की सांस फूल जाती है, वह पीछे हटता है। तीसरा मुक्का – चेहरे पर। आर्यव की नाक से खून बहने लगता है, वह लड़खड़ाता है।
भीड़ चिल्लाती है, खुशी से पागल। भाऊ मुस्कुराता है – एक खतरनाक, घमंडी मुस्कान।
भाऊ: (हंसते हुए, गुर्राते हुए)
"बस इतनी ही ताकत है? मैं तो सोच रहा था कोई असली चैलेंज आया है। कोई शेर आया है। ये तो बिल्ली है! एक बिल्ली!"
भीड़ और हंसती है।
आर्यव धीरे-धीरे सीधा होता है। वह अपनी नाक का खून पोंछता है – हाथ से, बिना देखे। उसकी आंखों में वही स्थिरता है। कोई दर्द नहीं, कोई डर नहीं। बस एक अजीब-सी शांति।
वह अपनी सांस स्थिर करता है – गहरी सांस, धीमी सांस। उसकी आंखें बंद हो जाती हैं – एक पल के लिए। जब वह खुलती हैं, उसके चेहरे का भाव बदल चुका है। अब वह आदमी नहीं है – अब वह मशीन है। एक हथियार। एक निशान।
भाऊ फिर हमला करता है – इस बार और जोर से, और तेज। लेकिन आर्यव बचने के बजाय सामने से टकराता है। वह भाऊ के पैर पर लो किक मारता है – जोरदार, सटीक, बिजली की गति से। उसका पैर भाऊ के घुटने के पीछे लगता है – एक नाजुक जगह।
भाऊ चौंक जाता है – उसके चेहरे पर दर्द का भाव आता है। उसका संतुलन बिगड़ता है, वह आगे की ओर झुकता है।
आर्यव का घुटना भाऊ के पेट में धंस जाता है – एक के बाद एक, तीन बार। भाऊ की सांस फूल जाती है, उसका मुंह खुलता है, हवा के लिए हांफता है। फिर आर्यव की कोहनी – भाऊ की गर्दन पर, ठीक नस के पास। भाऊ की आंखें फैल जाती हैं, वह चकरा जाता है।
आर्यव भाऊ की बांह पकड़ता है – उसकी विशाल, मोटी बांह – और एक झटके में जॉइंट लॉक कर देता है। उसकी तकनीक बिल्कुल सटीक है – कोई गलती नहीं, कोई कंपन नहीं।
चटाक्!
हड्डी टूटने की आवाज़ पूरे क्लब में गूंज जाती है – सूखी, भयानक आवाज़। भाऊ की चीख उसके बाद आती है – एक दर्द भरी, जानवर जैसी चीख, जो हर किसी के रोंगटे खड़े कर देती है। उसका कंधा अपनी जगह से हट गया है, हड्डी बाहर उभर आई है – त्वचा के नीचे एक अप्राकृतिक उभार।
भीड़ सन्न। पूरी तरह सन्न। किसी की सांस नहीं चल रही।
भाऊ घुटनों के बल गिर जाता है – पहले एक घुटने पर, फिर दूसरे पर। उसकी आंखों में पानी है, दर्द से, हैरानी से। वह आर्यव को देखता है – जैसे किसी भूत को देख रहा हो।
आर्यव उसके सामने झुकता है। उसका चेहरा बिल्कुल पास, भाऊ के कान में फुसफुसाता है – इतनी धीमी आवाज़ में कि सिर्फ भाऊ सुन सके।
आर्यव: (बर्फीली आवाज़ में)
"मेरे नाम से हमला किसने करवाया? बोल, नहीं तो दूसरा कंधा भी तोड़ दूंगा। और फिर गर्दन।"
भाऊ दर्द से कराहता है, लेकिन फिर भी हंसता है – एक खौफनाक, पागलपन भरी हंसी। उसकी आंखों में डर है, लेकिन अजीब-सी चमक भी।
भाऊ: (हांफते हुए, दर्द से)
"तू... वही है? निशान? मैंने सुना था... तू असली है। अच्छा... तुझे... तेरे पुराने कप्तान ने याद किया है। उसने कहा था... तू आएगा। और जब आएगा... तो तुझे रास्ता दिखाना। यही मेरा काम था। तुझे यहां तक लाना।"
आर्यव: "कौन सा रास्ता? कहां?"
भाऊ: "अर्थर... जेल... विक्रांत पवार। वहीं है... तेरे सवालों का जवाब। उसके पास है सब। जा... उससे मिल। और जब मिले... तो उसे मेरा सलाम कहना।"
आर्यव खड़ा हो जाता है
वह रिंग से बाहर निकलता है
धीरे-धीरे, शांति से। उसके शरीर पर अब भी खून है – अपना और भाऊ का। लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं।
भीड़ अब भी सन्न है। कोई ताली नहीं बजाता। कोई बोलता नहीं। सब बस देखते रह जाते हैं – एक अजीब-सी श्रद्धा से, डर से।
करीम उसके पीछे-पीछे चलता है – उसकी आंखों में हैरानी और गर्व दोनों हैं।
करीम: (फुसफुसाते हुए)
"तूने उसे मारा नहीं? तूने उसे जिंदा छोड़ दिया?"
आर्यव: (बिना रुके, बिना मुड़े)
"उसे मरने की जरूरत नहीं। उसने अपना काम कर दिया। वो सिर्फ एक संदेशवाहक था।"
करीम: "क्या काम?"
आर्यव: (अब मुड़ता है, करीम की आंखों में देखता है)
"हमें रास्ता दिखा दिया। अब जेल चलना है। अर्थर।"
दोनों अंधेरे में गायब हो जाते हैं। पीछे, भाऊ अभी भी रिंग में पड़ा है, अपनी टूटी बांह को पकड़े, दर्द से कराह रहा है। रमजान उसे देख रहा है, उसके चेहरे पर डर और हैरानी दोनों हैं। वह आर्यव की पीठ देखता है – जाते हुए।
रमजान: (खुद से, बड़बड़ाता हुआ)
"निशान... तो वो सच में है। वो किंवदंती नहीं थी। और वो... वो कबीर राणा के पीछे है। अब देखते हैं क्या होता है। अब देखते हैं कि मुंबई में कौन बचता है।"
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दृश्य ११ – राघव भसीन का अड्डा | अगली सुबह
अंदर – मिल का भीतरी हिस्सा – सुबह
आर्यव राघव के सामने खड़ा है। उसने कपड़े बदल लिए हैं, लेकिन उसके चेहरे पर थकान साफ है। रातों की नींद हराम, लगातार एक्शन – सब उस पर असर डाल रहा है, लेकिन वह दिखाता नहीं।
राघव: (चिंतित स्वर में)
"अर्थर जेल? विक्रांत पवार? आर्यव, यह बहुत खतरनाक हो सकता है। विक्रांत कोई साधारण कैदी नहीं है। वो आदमी... उसके अपने राज़ हैं, अपने दुश्मन हैं। और वो कबीर से मिला हुआ है – कभी था। अब वो किसके साथ है, क्या चाहता है, कोई नहीं जानता।"
आर्यव: "उसके पास जवाब हैं। मुझे बस इतना चाहिए।"
राघव: "और अगर उसने तुझे धोखा दिया? अगर वो कबीर के साथ मिला हुआ है?"
आर्यव: "तो फिर मैं दोनों को खत्म कर दूंगा। एक साथ।"
राघव गहरी सांस लेता है। वह जानता है कि आर्यव को रोकना नामुमकिन है।
राघव: "ठीक है। मैं तेरी मदद करूंगा। अर्थर जेल तक पहुंचने के लिए तुझे एक पहचान चाहिए – एक नाम, एक चेहरा। मेरे पास है। भाऊ की जगह तू जाएगा – विक्रांत के आदमी के रूप में। लेकिन याद रख – जेल के अंदर कोई तेरा दोस्त नहीं है। हर आदमी दुश्मन है। वहां कानून का राज नहीं, बल्कि सबसे बड़ी मछली का राज चलता है। और विक्रांत... वो सबसे बड़ी मछली है।"
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दृश्य १२ – अर्थर कमांडो जेल | तीन दिन बाद
बाहरी – अर्थर कमांडो जेल – दिन
मुंबई से करीब सौ किलोमीटर दूर, एक पहाड़ी की चोटी पर बनी है अर्थर कमांडो जेल। चारों तरफ ऊंची दीवारें – कम से कम चालीस फीट ऊंची, ऊपर कांटेदार तार, बिजली की करंट वाली तारें। हर पचास फीट पर बुर्ज हैं, उनमें सशस्त्र गार्ड – स्नाइपर राइफलों के साथ। चारों तरफ खुला मैदान – कोई छिप नहीं सकता। यहां से भागना नामुमकिन है।
यहां वो कैदी रखे जाते हैं जिन्हें समाज ने हमेशा के लिए बाहर कर दिया है – आतंकवादी, हत्यारे, माफिया डॉन, भ्रष्ट नेता। यहां की दीवारों के अंदर हर आदमी का अपना इतिहास है, अपने राज़ हैं।
एक सफेद वैन जेल के मेन गेट पर रुकती है। उसमें से चार आदमी उतरते हैं – विक्रांत पवार के आदमी, मिलने आए हैं। उनमें से एक आर्यव है। उसने चेहरे पर हल्का सा बदलाव किया है – झूठी मूंछें, चश्मा, अलग कपड़े, बाल पीछे की ओर। पहचानना मुश्किल है। वह भाऊ की जगह ले चुका है – उसी की पहचान के साथ।
गेट पर सख्त सुरक्षा। फिंगरप्रिंट स्कैन, आईरिस स्कैन, आधार कार्ड, परमिशन लेटर। आर्यव ने सब फर्जी बना रखा है – राघव के नेटवर्क ने सब इंतजाम कर दिया है।
वे अंदर जाते हैं।
अंदर – जेल का अंदरूनी हिस्सा – दिन
लंबे-लंबे गलियारे, लोहे के दरवाजे, हर तरफ सीसीटीवी कैमरे – हर कोने में, हर मोड़ पर। हर कुछ कदम पर सशस्त्र गार्ड – उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं, बस ड्यूटी।
आर्यव और बाकी लोग एक लंबे गलियारे से गुजरते हैं। दोनों तरफ सेल हैं – छोटे-छोटे कमरे, जिनमें कैदी झांक रहे हैं। कुछ चिल्लाते हैं, कुछ सीटियाँ बजाते हैं, कुछ बस देखते हैं – खाली, बेजान निगाहों से।
वे एक कमरे के बाहर रुकते हैं। गार्ड दरवाजा खोलता है – भारी, लोहे का दरवाजा। वे अंदर जाते हैं।
अंदर – विजिटिंग रूम – दिन
एक छोटा-सा कमरा, बीच में एक लंबी मेज, दोनों तरफ कुर्सियाँ। दीवार पर एक बड़ा शीशा है – निश्चित रूप से एक तरफा शीशा, पीछे से देखा जा सकता है। कमरे के कोनों में कैमरे।
मेज के दूसरी तरफ बैठा है विक्रांत पवार (६०, अब बूढ़ा और कमजोर, लेकिन आंखों में अब भी वही चमक, वही अकड़, जो कभी मंत्री रह चुके हैं)। उसने सफेद कुर्ता पहना है, हाथ में किताब है – गीता शायद। उसके बाल सफेद हो चुके हैं, चेहरे पर झुर्रियाँ, लेकिन उसकी आंखें – वो आंखें अब भी जल रही हैं। वह धीरे-धीरे अपने आदमियों को देखता है – एक-एक करके। फिर उसकी नजर आर्यव पर रुक जाती है – और ठिठक जाती है।
एक पल की पहचान। फिर वह मुस्कुराता है – एक अजीब, जानने वाली मुस्कान।
विक्रांत: (अपने आदमियों से)
"तुम लोग बाहर जाओ। मुझे इससे अकेले में बात करनी है।"
आदमी हैरान होते हैं, लेकिन बिना सवाल किए बाहर चले जाते हैं। दरवाजा बंद होता है। अब कमरे में सिर्फ विक्रांत और आर्यव हैं।
विक्रांत: (आर्यव को देखते हुए, मुस्कुराते हुए)
"बैठो, आर्यव। बहुत दिनों से इंतजार था तुम्हारा।"
आर्यव चौंकता है – भीतर से, लेकिन चेहरे पर नहीं दिखने देता। वह धीरे-धीरे बैठता है।
आर्यव: (सावधान स्वर में)
"आप मुझे जानते हैं?"
विक्रांत: (हंसते हुए)
"तुम्हें कौन नहीं जानता, आर्यव शर्मा? पूर्व शार्पशूटर, स्पेशल टास्क फोर्स। पांच साल पहले तुम्हारा परिवार मारा गया – एक झूठे एनकाउंटर में। तब से तुम गायब हो गए। और अब तुम 'निशान' बन गए हो – एक किंवदंती, एक मिथक। लेकिन मैं जानता हूं – तुम असली हो। और तुम यहां मेरे पास आए हो क्योंकि तुम्हें कबीर राणा को मारना है।"
आर्यव के चेहरे पर कोई भाव नहीं, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक आती है।
आर्यव: "आप कैसे जानते हैं?"
विक्रांत: (आगे झुकते हुए, धीमे स्वर में)
"क्योंकि मैं भी उसे मारना चाहता हूं, आर्यव। पिछले पांच साल से हर रात उसे मारने का सपना देखता हूं। उसने मेरा बेटा मारा – मेरा इकलौता बेटा। उसे मेरी आंखों के सामने से उठाया, झूठा केस लगाया, और फिर एनकाउंटर में मार दिया। उसकी लाश मुझे सौंपी गई – गोलियों से छलनी। मैंने उसका अंतिम संस्कार किया, आर्यव। अपने बेटे का। और तब से मैं सिर्फ एक ही चीज़ के लिए जी रहा हूं – बदला।"
उसकी आंखों में आंसू हैं, लेकिन वह रोता नहीं। उसकी आवाज़ में दर्द है, लेकिन वह टूटता नहीं।
आर्यव: (धीमे से)
"तो आप जानते हैं... बाज़ क्या है?"
विक्रांत: गहरी सांस लेता है। वह उठता है, खिड़की के पास जाता है – बाहर जेल का मैदान दिखता है, कैदी घूम रहे हैं। वह बाहर देखता है, फिर बोलता है:
विक्रांत: "बाज़ कोई गिरोह नहीं है। बाज़ कोई संगठन नहीं है। बाज़ एक विचार है। एक ऐसा विचार जो कहता है – कानून से ऊपर उठो, न्याय खुद बनो। जब सिस्टम फेल हो जाए, जब पुलिस, अदालत, सरकार – सब बेकार हो जाएं, तब बाज़ उठता है। और इस विचार को... पांच साल पहले कबीर राणा ने मार दिया था। या सोचा था कि मार दिया।"
आर्यव: "आप कैसे जानते हैं इतना सब?"
विक्रांत: (मुड़ता है, आर्यव की आंखों में देखता है)
"क्योंकि मैं भी उस विचार का हिस्सा था, आर्यव। एक समय। बहुत पहले। जब मैं मंत्री था, तब बाज़ ने मुझसे संपर्क किया था। उन्हें एक सहानुभूति चाहिए थी सरकार में। एक ऐसा आदमी जो उनकी मदद कर सके, उन्हें बचा सके। लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने सोचा – यह गलत है, यह कानून के खिलाफ है। मैं सीधा आदमी था। सीधा-सादा।"
आर्यव: "फिर?"
विक्रांत: "फिर... उन्होंने मेरे बेटे को मार दिया। और कबीर राणा ने उसे 'एनकाउंटर' का नाम दिया। देखा? यही उनका तरीका है। जो उनके साथ नहीं, वो उनके खिलाफ। और जो खिलाफ, वो मर जाता है।"
आर्यव के चेहरे पर समझ आने लगती है – पहेली के टुकड़े जुड़ रहे हैं।
आर्यव: "तो कबीर राणा... बाज़ का आदमी है?"
विक्रांत: (ठंडी हंसी के साथ)
"कबीर राणा बाज़ का आदमी नहीं है, आर्यव। कबीर राणा बाज़ का मालिक है। वही बाज़ है। उसने इस विचार को अपने हाथ में लिया, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उसने बाज़ को एक हथियार बना दिया – अपनी ताकत बढ़ाने के लिए, अपने दुश्मनों को मिटाने के लिए, अपना साम्राज्य खड़ा करने के लिए। और जो भी उसके रास्ते में आया... मिटा दिया। तुम्हारा परिवार, मेरा बेटा, और कितने ही मासूम... सब कोलेटरल डैमेज।"
आर्यव के हाथ मुट्ठी में बंद हो जाते हैं – इतनी जोर से कि नाखून हथेली में गड़ जाते हैं। उसके जबड़े की मांसपेशियां तन जाती हैं। उसकी आंखों में आग है – पांच साल से दबी हुई आग।
आर्यव: (धीमे, लेकिन दृढ़ स्वर में)
"उसे कैसे मारूं? बताइए।"
विक्रांत: (आर्यव के पास आता है, उसके कंधे पर हाथ रखता है)
"मारना आसान है, आर्यव। एक गोली, चाकू, जहर – बहुत तरीके हैं। लेकिन उसे मारने से पहले... तुम्हें उसकी असली ताकत को समझना होगा। उसकी ताकत उसकी पुलिस वर्दी नहीं है। उसकी ताकत उसका नेटवर्क है – राजनीति, अंडरवर्ल्ड, मीडिया, बिजनेस, हर जगह उसके लोग हैं। एक को मारोगे, दस और आ जाएंगे। उसकी असली ताकत यही है – यह जाल।"
आर्यव: "तो क्या करूं?"
विक्रांत: (आर्यव की आंखों में सीधे देखते हुए)
"उसके नेटवर्क को तोड़ो। उसके हर सहयोगी को, हर उस आदमी को जो उसके लिए काम करता है, जो उसकी ताकत है... एक-एक करके खत्म करो। उसके पंख काट दो। जब वो बिल्कुल अकेला रह जाएगा, बिल्कुल नंगा... तब उससे मिलो। तब वो असली लड़ाई होगी।"
विक्रांत अपनी जेब से एक कागज निकालता है – पुराना, मैला, मुड़ा हुआ। वह उसे आर्यव को देता है।
विक्रांत: "ये हैं कबीर राणा के पांच सबसे करीबी सहयोगी। ये वो लोग हैं जिनके बिना वो कुछ नहीं है। इनके नाम, पते, कमजोरियां – सब लिखा है। इन्हें हटाओ... और वो कमजोर हो जाएगा। फिर तुम उसके पास जा सकते हो।"
आर्यव कागज लेता है, खोलता है, पढ़ता है। उस पर नाम हैं:
१. दिलीप सावंत – ठेकेदार, कबीर का फंड मैनेजर, सारा काला पैसा उसी के पास
२. मंगेश गायकवाड़ – विधायक, राजनीति में कबीर की आवाज़
३. एसीपी भोसले – पुलिस में कबीर का दाहिना हाथ, सबसे वफादार
४. रजत शर्मा – वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया में कबीर का आदमी, हर खबर को मोड़ता है
५. लतीफ 'चेन्नई' – अंडरवर्ल्ड डॉन, कबीर का गंदा काम करने वाला
आर्यव कागज को ध्यान से पढ़ता है – हर नाम, हर पता, हर जानकारी याद कर लेता है। फिर वह कागज मोड़कर जेब में रख लेता है।
आर्यव: (उठते हुए)
"धन्यवाद। मैं आपका एहसान नहीं भूलूंगा।"
विक्रांत: (हाथ पकड़कर रोकता है)
"आर्यव। एक बात और।"
आर्यव रुकता है।
विक्रांत: (गंभीर स्वर में)
"बदला लेना... एक खतरनाक रास्ता है। इसके अंत में... तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा। सिर्फ खालीपन। और भी ज्यादा अकेलापन। मैं जानता हूं। मैं उस रास्ते पर चल चुका हूं। पांच साल से उसी रास्ते पर हूं। और आज... मैं यहां हूं। एक जेल की कोठरी में। अकेला। बिल्कुल अकेला।"
आर्यव: (बिना मुड़े, बिना भाव के)
"मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस इंसाफ।"
विक्रांत: (धीमे से, लगभग फुसफुसाते हुए)
"इंसाफ? या बदला? दोनों में फर्क होता है, आर्यव। इंसाफ... इंसाफ सबको बराबर देखता है। बदला... बदला अंधा होता है। बदला सिर्फ जलता है, भस्म करता है। और अंत में... बदला लेने वाला भी जल जाता है।"
आर्यव: (अब मुड़ता है, उसकी आंखों में वही ठंडक)
"जब तुम्हारा परिवार तुम्हारे सामने से मार दिया जाए, जब तुम्हारी बेटी की आखिरी चीख तुम्हारे कानों में गूंजती रहे हर रात... तब इंसाफ और बदले में फर्क मिट जाता है। तब सिर्फ एक चीज़ बचती है – खत्म करना। खत्म करना उसे, और उसके सबको।"
वह चला जाता है – बिना पीछे देखे। दरवाजा बंद होता है – धीमी, भारी आवाज़ के साथ।
विक्रांत अकेला रह जाता है। वह खिड़की से बाहर देखता है – दूर पहाड़ियाँ, नीला आसमान, उड़ते पक्षी।
विक्रांत: (खुद से, धीमे स्वर में)
"कबीर... तू नहीं जानता कि तूने किसे जगाया है। ये आदमी... ये कोई आम बदला लेने वाला नहीं है। ये तो... ये तो मौत का फरिश्ता है। और तू... तू इसके निशाने पर है। अब तो बस इंतज़ार है।"
वह गहरी सांस लेता है और फिर से किताब खोल लेता है – गीता। उसके होंथ हिलते हैं, पढ़ते हुए।
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दृश्य १३ – पहला निशान: दिलीप सावंत | उसी रात
बाहरी – अलीबाग, एक बंगले के बाहर – रात ११:३०
अलीबाग के एकांत इलाके में एक विशाल बंगला है – चारों तरफ ऊंची दीवारें, लोहे के गेट, सुरक्षा गार्ड। यह है दिलीप सावंत का ठिकाना – कबीर राणा का फंड मैनेजर, काला पैसा रखने वाला।
आर्यव और करीम एक पेड़ के पीछे छुपे खड़े हैं। आर्यव के हाथ में दूरबीन है, वह बंगले का निरीक्षण कर रहा है। करीम डरा हुआ है, लेकिन उत्सुक भी।
करीम: (फुसफुसाते हुए)
"तू सच में अंदर जाएगा? वहां तो कम से कम दस गार्ड हैं। कैमरे हैं। अलार्म हैं।"
आर्यव: (बिना दूरबीन हटाए)
"पंद्रह गार्ड। बारह कैमरे। तीन अलार्म सिस्टम। दो कुत्ते। और एक मेन दरवाजा जो खुला छोड़ दिया जाएगा।"
करीम: "खुला? कैसे?"
आर्यव: (मुस्कुराता है – एक ठंडी, खतरनाक मुस्कान)
"क्योंकि दस मिनट में उनकी बिजली चली जाएगी। और पांच मिनट बाद, उनका जनरेटर भी काम नहीं करेगा। और तब... अंधेरे में... मैं अंदर जाऊंगा।"
वह अपनी घड़ी देखता है – रात के ११:४५। वह एक बटन दबाता है – ००:६०।
आर्यव (वॉइसओवर): "पहला नाम – दिलीप सावंत। यह वो आदमी है जो कबीर के काले पैसे को सफेद करता है। बिना इसके, कबीर की ताकत आधी रह जाएगी। आज रात... यह खत्म होगा।"
बाहरी – बंगले के अंदर – रात १२:००
बिजली चली जाती है। पूरा बंगला अंधेरे में डूब जाता है। गार्ड घबरा जाते हैं, चिल्लाते हैं। जनरेटर शुरू होने की आवाज़ आती है – लेकिन वह भी बंद हो जाता है। पूरा अंधेरा।
आर्यव अंदर घुसता है – एक छाया की तरह, बिना आवाज़ के। वह गार्डों के बीच से गुजरता है – उन्हें कुछ पता नहीं चलता।
दस मिनट बाद... बिजली वापस आती है।
गार्ड हैरान हैं। वे बंगले के अंदर जाते हैं – दिलीप सावंत के कमरे में।
वहां दिलीप सावंत बिस्तर पर बैठा है – जिंदा, लेकिन डरा हुआ। उसके बगल में एक चिप रखी है – उस पर बाज़ का निशान। और उसके सामने दीवार पर खून से लिखा है – "कबीर से कह दो, मैं आ रहा हूं।"
गार्ड चारों तरफ देखते हैं – कोई नहीं। सिर्फ दिलीप की कांपती आवाज़।
दिलीप: (रोते हुए)
"वो आया था... उसने मुझे जिंदा छोड़ दिया... बोला कि कबीर से कह देना... अगला नंबर उसका है... और ये चिप उसे देना... प्लीज़... मुझे बचाओ..."
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दृश्य १४ – दूसरा निशान: मंगेश गायकवाड़ | अगली रात
बाहरी – पुणे, विधायक का बंगला – रात
मंगेश गायकवाड़, विधायक और कबीर का राजनीतिक हथियार, अपने बंगले में एक पार्टी दे रहा है। बड़े-बड़े लोग आए हैं – नेता, बिजनेसमैन, फिल्मी सितारे। शराब, ठुमके, रोशनी।
आर्यव इस भीड़ में घुलमिल जाता है – वेटर के वेश में। वह मंगेश के पास जाता है – जब वह अकेला होता है, बालकनी में खड़ा, सिगार पीते हुए।
आर्यव: (पीछे से, धीमे स्वर में)
"मंगेश जी?"
मंगेश घूमता है – मुस्कुराता हुआ, शराब के नशे में।
मंगेश: "हां, क्या है? कौन है तू?"
आर्यव: (चेहरे से वेटर का मास्क हटाते हुए)
"कबीर राणा की तरफ से सलाम है।"
मंगेश की आंखें फैल जाती हैं – वह पहचान जाता है, या महसूस कर लेता है। वह चिल्लाने की कोशिश करता है, लेकिन आर्यव का हाथ उसके गले पर है – दबाता है, चुप कराता है।
आर्यव: (कान में फुसफुसाते हुए)
"कबीर को बोलना – अगला नंबर उसका। और यह चिप उसे देना। समझे?"
वह मंगेश की जेब में चिप रख देता है। फिर वह गायब हो जाता है – उसी तरह, जैसे आया था।
मंगेश घबराया हुआ, कांपता हुआ, चारों तरफ देखता है – लेकिन कोई नहीं है। बस भीड़, शोर, और उसकी जेब में वह चिप – बाज़ का निशान।
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दृश्य १५ – तीसरा निशान: एसीपी भोसले | दो दिन बाद
बाहरी – मुंबई पुलिस कॉलोनी – सुबह
एसीपी भोसले, कबीर का दाहिना हाथ, अपनी गाड़ी में बैठकर ऑफिस जा रहा है। वह साधारण दिन की तरह, बेफिक्र।
लेकिन आज उसकी गाड़ी में एक और आदमी है – पीछे की सीट पर। आर्यव।
भोसले: (शीशे में देखकर चौंकता है, ब्रेक लगाता है)
"कौन? तू कौन है? कैसे आया?"
आर्यव: (शांति से)
"बात करनी है, भोसले साहब। थोड़ी देर के लिए गाड़ी किसी सुनसान जगह पर ले चलो। और कोशिश मत करना – मेरा हाथ तुम्हारी गर्दन पर है।"
भोसले घबरा जाता है। वह गाड़ी एक सुनसान जगह पर ले जाता है – एक निर्माणाधीन इमारत के पास।
भोसले: (डरा हुआ)
"क्या चाहिए? पैसे? मैं दे दूंगा। कितने चाहिए?"
आर्यव: "पैसे नहीं, जानकारी चाहिए। कबीर के बारे में सब कुछ। उसकी कमजोरियां, उसके राज़, उसके अगले कदम।"
भोसले: (हंसने की कोशिश करता है)
"मैं कुछ नहीं बताऊंगा। तू मुझे मार देगा तो भी नहीं बताऊंगा। कबीर मुझे मार देगा अगर बताया तो।"
आर्यव: (पिस्तौल निकालते हुए)
"तो मैं तुझे अभी मार देता हूं। और फिर कबीर के पास जाता हूं। फर्क सिर्फ इतना है – तू मरेगा आज, और कबीर कल। तुझे क्या अच्छा लगेगा?"
भोसले के चेहरे का रंग उड़ जाता है। वह समझ जाता है – यह आदमी मज़ाक नहीं कर रहा।
भोसले: (हार मानते हुए)
"ठीक है... ठीक है... बताता हूं। कबीर हर शुक्रवार रात को एक पुराने चर्च में मिलता है – गिरिगांव में। वहां उसके सारे लोग आते हैं। वहां वो सुरक्षित महसूस करता है। वहां तू उसे पा सकता है।"
आर्यव: "कब?"
भोसले: "इस शुक्रवार। रात ग्यारह बजे।"
आर्यव एक पल सोचता है। फिर वह भोसले की जेब में एक चिप रख देता है।
आर्यव: "यह उसे दे देना। कहना – मैं आ रहा हूं। और अगर झूठ बोला... तो वापस आऊंगा। और अगली बार... बात नहीं करूंगा।"
वह गाड़ी से उतर जाता है – और अंधेरे में गायब हो जाता है।
भोसले कांपता हुआ, पसीने से तर, अपनी जेब से चिप निकालता है – बाज़ का निशान।
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दृश्य १६ – चौथा निशान: रजत शर्मा | उसी रात
अंदर – मीडिया हाउस, ऑफिस – रात
रजत शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार, अपने ऑफिस में अकेला बैठा है। वह एक खबर लिख रहा है – कबीर के खिलाफ आने वाली किसी खबर को मोड़ने की कोशिश।
दरवाजा खुलता है। आर्यव अंदर आता है।
रजत: (चौंकते हुए)
"कौन? कैसे अंदर आए? सिक्योरिटी?"
आर्यव: (बैठते हुए, सामने की कुर्सी पर)
"सिक्योरिटी को थोड़ा आराम चाहिए था। बैठो, बात करते हैं।"
रजत: (पहचानने की कोशिश करता है)
"तुम... तुम वही हो? निशान? मैंने तुम्हारे बारे में सुना है। पोर्ट वाला कांड, सावंत, गायकवाड़, भोसले... तुम कबीर को खत्म करना चाहते हो।"
आर्यव: "और तुम उसे बचाना चाहते हो। अपने अखबार से, अपने लेखों से, अपने झूठ से।"
रजत: (हंसते हुए)
"मैं सिर्फ अपना काम कर रहा हूं। कबीर मुझे पैसे देता है, मैं उसके लिए काम करता हूं। यह बिजनेस है।"
आर्यव: (उठते हुए, उसके पास आते हुए)
"बिजनेस? तो यह भी बिजनेस समझो। मैं तुझे एक मौका दे रहा हूं – कबीर के खिलाफ सच लिखो। वो सब जो तुमने दबाया, छुपाया, बदला। लिखो। नहीं तो..."
वह रजत के कंप्यूटर की स्क्रीन पर एक चिप चिपका देता है – उसी बाज़ के निशान के साथ।
आर्यव: "यह तुम्हारे लिए। कबीर तक पहुंचेगा। सोच लो।"
वह चला जाता है।
रजत कांपता हुआ, स्क्रीन पर चिप को देखता है – बाज़ उसे घूर रहा है।
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दृश्य १७ – पाँचवाँ निशान: लतीफ 'चेन्नई' | अगली रात
बाहरी – चेन्नई, एक गोदाम – रात
लतीफ 'चेन्नई', अंडरवर्ल्ड डॉन, अपने गोदाम में बैठा है – चारों तरफ उसके आदमी, हथियार, ड्रग्स। वह कबीर का सबसे खतरनाक हथियार है – गंदे काम करने वाला।
आर्यव गोदाम में अकेला घुसता है।
गोलीबारी शुरू होती है – एक के बाद एक, लगातार। पाँच मिनट का नरसंहार।
जब खत्म होता है, लतीफ अपनी कुर्सी पर बैठा है – जिंदा, लेकिन घायल। उसके चारों तरफ उसके आदमियों की लाशें हैं – कम से कम बीस।
आर्यव उसके सामने खड़ा है – खून से लथपथ, लेकिन खड़ा है।
लतीफ: (हांफते हुए)
"मार दे मुझे... खत्म कर दे... मैं डरता नहीं मौत से..."
आर्यव: (उसकी जेब में चिप रखते हुए)
"मैं तुझे नहीं मारूंगा, लतीफ। तू कबीर तक संदेश पहुंचाएगा। बोलना – अब सिर्फ वो बचा है। और मैं आ रहा हूं।"
वह मुड़ता है और चला जाता है – लाशों के बीच से, खून से सने फर्श पर।
लतीफ उसे जाते देखता है – उसकी आंखों में डर है, हैरानी है, और कुछ और – शायद सम्मान।
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दृश्य १८ – कबीर राणा का बंगला | उसी रात
अंदर – बंगला – रात
कबीर राणा अपने स्टडी में बैठा है। उसके सामने पाँच चिपें रखी हैं – पाँचों पर बाज़ का निशान। उसके चेहरे पर गुस्सा है, लेकिन साथ में डर भी – वह डर जो वह दिखाना नहीं चाहता।
उसके सामने उसके पाँचों आदमी बैठे हैं – दिलीप सावंत, मंगेश गायकवाड़, एसीपी भोसले, रजत शर्मा, लतीफ 'चेन्नई' – सब जिंदा, लेकिन सब डरे हुए।
कबीर राणा: (गुस्से से, चिल्लाते हुए)
"पाँच लोग! मेरे पाँच सबसे करीबी लोग! और एक आदमी ने तुम सबको घुटनों पर ला दिया! एक आदमी! वो तुम्हें जिंदा छोड़ कर आया – मुझे संदेश देने। संदेश! मैं कब से इतना कमजोर हो गया?"
वह मेज पर मुक्का मारता है – जोरदार, गुस्से से। सब चुप हैं, डरे हुए।
कबीर राणा: (ठंडी आवाज़ में, अब नियंत्रण में)
"ठीक है। वो खेल खेलना चाहता है – तो खेलेंगे। उसे बुलाओ। जहां वो आना चाहे, जहां वो लड़ना चाहे। मैं तैयार हूं। पुराने चर्च में, गिरिगांव में। इस शुक्रवार रात। उसे बोल दो – मैं उसका इंतज़ार करूंगा। अकेला। अपने सबसे अच्छे आदमियों के साथ।"
वह मुस्कुराता है – एक खतरनाक, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान।
कबीर राणा: "आर्यव... तू आया तो आने दे। इस बार... यहीं खत्म होगा।"