होली:
वह ईड़ा गाँव(अल्मोड़ा) की होली, अल्मोड़ा की होली, धनबाद की होली, जोरहट(असम) की होली आदि। याद करो तो सनसनाहट होने लगती है और हल्की गुदगुदाहट।मन फुर्र से उड़ता है और बैठ जाता है यहाँ-वहाँ।पर इसी बीच कहीं उलझ भी जाता है।न उसे आसमान दिखता है न धरती।होल्लियारों का लय, रंगों का बहाव देखते बनता था।मौसम में मादकता छायी रहती थी। ईड़ा में खड़ी होली खूब देखी जिसमें होल्लियारे हर घर पर जाकर आशीर्वादों की झड़ी लगा देते थे(आशीर्वादों का वह लय अब याद नहीं है,सुनने में बहुत मन मोहक होता था जैसे होली खेलत नन्द लाल,तुम जियो हजारों साल) । अल्मोड़ा में बैठक होली का आनंद यादगार लगता है।मकान मालकिन हमारे कमरों में बैठक होली करवाती थीं। धनबाद की वह होली।होली खेलने के लिये रंग खरीदे और हाथ में लिये था।मोहक शाम थी।अपने आवास में जाने से पहले अपने दोस्त के यहाँ चला गया।उनका परिवार था।पति और पत्नी, केवल दो झने।उनकी पत्नी ने चाय चढ़ायी।और हम बातें करने लगे।तभी उनकी पत्नी को शरारत सूझी।उन्होंने मेरे हाथ से रंगों की थैली छीन ली और सारे रंगों को मेरे पर उडेल कर, गालों और सिर पर जोर-जोर से मल दिया। मेरे ही रंग मेरा ही सिर।मैं अपनी आँखों को बचाता रहा।आवाक था, सोच से परे सब कुछ घटित हो रहा था।वे शारीरिख रूप से अधिक बलिष्ठ थीं।अत: मेरी कोशिशें सब बेकार थीं और साथ में घबराहट।मैंने उन्हें रंग लगाने का कुछ प्रयत्न करने के बाद हथियार डाल दिये थे।यह आत्मसमर्पण था, एक बेबसी भरी हार भी।जब सूखे रंगों की होली समाप्त हुयी, तब मुस्कान के बीच चाय और नाश्ता मिला।दूसरे दिन छलड़ी थी।गीले रंगों से खूब होली खेली गयी।ऐसे-ऐसे रंगों और पदार्थों का प्रयोग हुआ जो शरीर से सरलता से निकलते नहीं थे। जब घर पहुँचा तो कोई मुझे पहिचान नहीं सका। जोरहट में सभी अधिकारियों को होली स्थल पर हाथ-पैर पकड़ कर रंगों के कुंड में डुबाया जाता था ,दो-तीन सेंकड के लिए। किसी को डुबाये जाने पर औरों को खुशी होती थी! जितना बड़ा अधिकारी उतना ही अधिक हँसी के ठहाके।बंगाल में मान्यता है कि होली के दिन ही श्रीकृष्ण ने राधा को अपने प्यार का इजहार किया था।राधा ने क्या कहा, पता नहीं।हो सकता है कहा हो," ऐसा नहीं कहना चाहिए।" लेकिन कुछ बातें स्वाभाविक होती हैं।सत्य और पवित्र भी।कही नहीं जाती हैं,महसूस की जाती हैं।फिर भी श्रीकृष्ण, राधा से कहते रहे होंगे-
"आँखें तुम्हारी हैं
प्यार मेरा है,
स्पर्श तुम्हारा है
प्यार मेरा है।" और युगों के बीच सामान्य-असामान्य घटित होता रहता है लेकिन श्रीकृष्ण-राधा का प्यार नहीं बदलता है। वैसे भी ईश्वर को हम विश्वसनीय बनाकर रखते हैं। मनुष्य सोचता रहेगा-
"मुट्ठी भर समय ईश्वर ने दिया,
कितना प्यार को दूँ,
कितना बढ़ते कदमों को,
कितना शुद्ध आत्मा को,
कितना आन्दोलनों को,
कितना धर्मों को परोसूँ।
मुट्ठी भर समयकहाँ-कहाँ बाटूँ?
इसे हाथों को सौंप
कहाँ-कहाँ फिरूँ?"
फिर इस सब के बीच उमंग, त्योहार, हँसी, मुस्कान,दुख आदि आते -जाते रहते हैं। इस होली में-
"मन रंगा हो,
तन रंगा हो
हमारा सम्पूर्ण संग रंगा हो,
गोकुल रंगा हो,
कान्हा रंगे हों
अयोध्या रंगी हो,
राम रंगे हों
हमारा सम्पूर्ण भारतवर्ष रंगा हो।
राधा संग श्रीकृष्ण रंगे हों
गाँव रंगे हों,
नगर रंगे हों,
धरा रंगी हो,
धड़कन रंगी हो
हमारे प्यार का दृश्य रंगा हो।
"स्नेह के साथ।
**महेश रौतेला