भाग- 1
गंगा ,वरुण और अस्सी के संगम से बनी हुई नगरी, जहां मृत्यु ही मोक्ष हो, जहां पीड़ा ,प्रार्थना ही प्रेम बनाजाए। त्याग की पराकाष्ठा मूरत, जहां घटियो की ताल और गंगा की चाल, प्रयाग सी गालियां और नगरी जो विश्वनाथ की हो, नाम है उसका काशी, क्योंकि शिव है यहां के वासी।
इसी तरह के एक दिन श्रद्धालुओं के जमावड़े में मुँह पर लालीमा लिए, राजकुमार शर्मा मणिकर्णिका घाट पर अपनी पुरानी यादों के संग आए।
राजकुमार शर्मा का स्वभाव सरल, साधारण व दार्शनिक है। आँखों पर गोल चश्मा व अभी-अभी इतिहास के व्याख्याता से सेवानिवृत्त हुए हैं। शर्मा जी की आँखों में उनकी जवानी के वे हसीन पल जो उन्होंने गंगा के घाटों से अपनी जमींदारी के बागों तक, अपनी अर्धांगिनी के संग बिताए थे, वे सूरज की तपस, काशी की ठंडी-ठंडी हवाओं व गंगा के जल की शीतलता के समागम से पुनः उभर आए। शर्मा जी के चेहरे की मुस्कान व आँखों की नमी शर्मा जी को उनकी पुरानी यादों के गहराइयों में खींच ले गई थी। शर्मा जी ये सब सोच ही रहे थे, कि एक मधुर आवाज उनके कानों में पड़ी,
"का हाल बानी शर्मा जी ?
शर्मा जी ने आश्चर्य से पीछे मुड़कर देखा, एक लंबा चौड़ा नोजवान खड़ा था, "अरे भई अथर्व तुम?" चेहरे पर एक अद्भुत सी मुस्कान के साथ,
"हाँ शर्मा जी, हम अथर्व शर्मा, कहीं हमें भूल तो नहीं गए।
" शर्मा जी ने अपनी जेब से रेशमी रूमाल निकाला, काशी की ठंडीहवाओं में समाए धूल के कणों को अपने मोटे चश्मे से पोंछते हुए, "अरे भई अथर्व तुम्हे कैसे भूल सकते हैं। और बताओ कैसे हो?"
" हम तो ठीक-ठाक हैं, आप बताओ।"
"हम भी ठीक हैं, कुछ दिन पहले सेवानिवृत्त हुए, तो सोचा अब अपनी जन्मभूमि चलते हैं
" अथर्व मुस्कुराकर, "अच्छा किया, अब यहीं खड़े रहेंगे या फिर घर भी चलिएगा।
" शर्मा जी अपनी आँखों की अत्यंत गहरी मुस्कान को गोलाकार चश्मे से छुपाते हुए, "अरे भई हमे अभी बेनिया पार्क जाना है 'अग्नि' को लेने, शाम को ज़रूर मिलते हैं।"
ठीक है तो हम घर आकर ही आप दोनों से मिल लेंगे अभी हमें भी घर पर जरा काम है हम भी चलते हैं।
ठीक हे अथर्व, पर घर आना मत भूल जाना। शर्मा जी ने मुस्कुरा कर कहा।
नहीं भूलूंगा आप चिंता मत कीजियेगा। अथर्व जाते जाते कहता गया।
शर्मा जी भी अथर्व को अलविदा कह कर अपनी कार की तरफ चल दिए। अपनी कार में बैठे और बेनिया पार्क के लिए निकल गए। काशी को बदलते देख शर्मा जी के मन की दशा पतझड़ में ओक के सूखे पत्तों की भांति प्रतीत होती है, जो सुख तो जाते हैं पर गिरते नहीं।जब शर्मा जी बेनिया पार्क पहुंचे तो
शर्मा जी जैसे ही अपनी कर से बाहर आए उनके निगाहें अग्नि को ढूंढने के लिए इधर-उधर झांक रही थी, तभी उन्होंने अग्नि को अशोक के वृक्ष के नीचे बैठा देख शायद कुछ लिख रही थी या चित्रकार कर रही। शर्मा जी उसके पास जा कर खड़े हो गए।" मानों जैसे अग्नि बेनिया पार्क की ढलती शाम में अशोक के वृक्ष की गुलाबी ठंड में कहीं गुम हो गई हो। उसकी 'महक' को आस-पास का सन्नाटा मानों और उत्साह रहा हो। अग्नि शर्मा जी की बेटी है, पतली सी ,थोड़ी नाटी, अधिक सुंदर नहीं बस साधारण सी सुंदर, थोड़ी नटखट परन्तु ख्यालों में डूबी हुई, चेहरे से मासूम पर समझदार। जिद्दी इतनी कि अपनी हर बात मनवा ही लेती है और क्यों ना माने बात इकलौती लड़की जो ठहरी। शर्मा जी ने पलकों पर बिठा कर पाला जो है।
शर्मा जी उस अशोक के वृक्ष के तल बैठे, एक गहरी, अनंत शांति का अनुभव लिए अग्नि के कंधे पर हाथ रखते हैं - "बेटा अग्नि घर नहीं चलना क्या?
"कोयल की मीठी कुतूहल के बीच शर्मा जी की तरफ अग्नि ने बड़ी मासूमियत से देखा और कहा "आप ने आते-आते कितनी देर कर दी, मैं यहाँ दो घंटे से अकेली बैठी हूँ।"
थोड़ा गुस्सा और आवाज में नरमी के साथ अग्नि। अग्नि के चेहरे पर गुस्सा, सिर पर चढ़ी त्योरीयों को देख शर्मा जी के गाल खुशी के मारे फूल गए,
आँखों में प्यार की झलक के साथ शर्मा जी नरमी से, "चलो इस बार छोड़ो अगली बार से ऐसा नहीं होगा, बस गंगा मैया और विश्वनाथ के दर्शन करने में देर हो गई।" "वैसे तुम तो शीतल और साहिबा के साथ थी।
" अग्नि का चेहरा फुला हुआ था मानों जैसे शर्मा जी का देर से आना उसके गालों को नीचे खींच रहा हो। "उनके घर वालों को परवाह है, जो वो संध्या होने से पहले आ गए, हमारा क्या है, आपको हमसे अधिक तो आपके घूमने की पड़ी है।"
"ऐसा नहीं है बेटा, बड़े लम्हे बीत जाने के बाद मुलाकात हुई हे इस शहर से सो,इसलिए थोड़ा समय लग गया।" शर्मा जी ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और अग्नि के सिर रख उसके सिर को सहलाने लगे, "अग्नि अब मान भी जाओ। तभी एक युवक उनके पास आया, और शर्मा जी से कहा।
नमस्ते शर्मा जी।"
शर्मा जी ने ठिठककर देखा, एक युवक उनके पास खड़ा था,"अरे रवि नमस्ते, नमस्ते।"बड़े दिनों बाद नजर आए। कहा थे इतने दिन ग्वालियर नहीं आए ।
हम ठीक हे, आप कैसे हे, ओर ये अग्नि क्यों नखरे कर रही हे। रवि ने कहा।
देखो तो बच्चों की तरह जिद कर रही हे। शर्मा जी ने बड़े लाड से कहा।
झूठी कही की, दो पग पर घर है, परन्तु पैदल चलने पर पैरों में दर्द होता होगा ना।
" अग्नि एकदम से उठ खड़ी हुई, ठसक भरी नज़रों से रवि को देख कर, "ज़्यादा सयाने मत बनो, हमेशा मेरी खिंचाई करने आ जाते हो।
" अग्नि के कोमल कोप को देख, रवि के चेहरे पर भीतर से फूटती हंसी और होंठों पर रेंगती शरारत से निश्चल मुस्कान झलक आई।
अग्नि कुछ ना बोली और रवि को अपनी चिढ़ी हुई नजरों से देखते हुए कार की तरफ चली गई। शर्मा जी खड़े हुए, "और बताओ रवि कैसे आना हुआ यहाँ?"
"बस घर जा रहा था, तो देखा कि अग्नि और आपको कार से उतरते हुए देखा, तो सोचा आपसे मिलता हुआ जाऊं।"
"अच्छा किया, वैसे भी लगभग बहुत वक्त हो गया तुमसे मिले, क्या कर रहे हो आज-कल?"
"कुछ कॉलेज के मित्रों के साथ मिलकर एक सामाजिक सुधार के कार्यों में लगा हूँ।"
शर्मा जी रवि के कंधे पर हाथ रख कार की तरफ चलते हुए, "अच्छा! किस तरह के समाज सुधार के काम?"
"लोगों को जागरूक करने के।"
अच्छा है।"तुम कार से लाए हो?"
"हाँ।"
मुझे ज़रा अपने पुराने मित्रों से मिलना है तो मैं तो रात तक ही घर आ सकूँगा, ऐसा करो तुम अग्नि को घर छोड़ दो।"
रवि और शर्मा जी का रिश्ता गुरु और चेले जैसा था। जब बचपन में ही रवि के माता-पिता गुजर गए तब शर्मा जी ने व उनकी पत्नी ने ही रवि को पाला। शर्मा जी ने रवि को बेटे से कम नहीं माना और रवि के लिए शर्मा जी भगवान से कम नहीं थे। रवि कुछ वर्ष पूर्व ही बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अपनी ग्रेजुएशन पूरी करके आया है। रवि अपनी कार में अग्नि को घर छोड़ने चला गया। दोनों ने रास्ते भर बात नहीं की, मानों दोनों के गले में फाँस अटक गई हो।
घर आने के बाद अग्नि ने रुलाई आवाज में कहा, "रवि घर के भीतर चलो, चाय-वाय पी लो, वरना पापा हमें कहेंगे कि रवि इतने दिन बाद घर आया और हमने पूछा भी नहीं।"
रवि एक उज्जवल मुस्कान के साथ, "नहीं अग्नि हमें देर हो रही है, कभी और आ जाएँगे।
""हाँ-हाँ, तुम तो चाहते ही हो कि हमें पापा की डाँट पड़े। आना है तो आओ वरना जाओ, हमें क्या? हम तो साफ़-साफ़ कह देंगे पापा से कि हमने तो कहा था आपके रवि को पर साहबजादे को काम था, तो रुके ही नहीं।"
जब रवि ने अग्नि की आँखों में सीप में मोती की तरह ठहरे आँसू देखे, रवि के हृदय के गम को चीरती एक फीकी और ठंडी मुस्कान उभर आई। "अरे अग्नि ऐसे मुँह मत बनाओ, हम चाय पीने चलिए लेते हैं।" रवि एक सोफे पर बैठ गया,
थोड़ी देर बाद अग्नि चाय की प्याली को ऊपर तक लबालब भर कर और ऊपर तैरती मलाई की मोटी परत रसमलाई की याद दिला रही थी। रवि ने जब इस चाय को देखा तो उसके हाथ ठिठक गए। रवि अचंभित देखते हुए, "अग्नि क्या है ये? मैं इतनी चाय और मलाई की तरी वाली चाय नहीं पीता।"
अग्नि ने अपने दोनों हाथों को बांध लिया, "पीना हो तो पियो वरना हमें क्या? तुम्हारे न पीने से ऐसा तो है नहीं कि हमारे देवता रूठ जाएंगे।
अग्नि को एक छोटे बच्चे की तरह उसकी खिंचाई करते देख रवि से रहा नहीं गया और मन ही मन मुस्कुराता हुआ, अग्नि क्या गैस पर तुम कुछ रख कर भूल गई हो, कुछ जलने की बु अ रही हे।
हम भी हेना तुम्हारे चक्कर में अपना काम काज भूलही जाते हे, तुम चाय की चुस्की लो हम अभी आते हे ये कहकर अग्नि रसोई घर चली गई।
अग्नि के जाने के बाद ,चाय की चुस्की लो कहा से ले चुस्की एसी भी कोई चाय होती है ।