वाजिद हुसैन सिद्दीक़ी की कहानी
जब संडीला के नवाब हैदर अली ने अपने इकलौते बेटे रियासत को पढ़ने के लिए विलायत भेजने का मन बनाया तो बेगम साहिबा ने तंज़ कसा -"जिस तरह लोग संडीला से "लड्डू" साथ लाते है उसी तरह विलायत से गोरी मेम साथ लाते है।"
नवाब साहब हंस पड़े- "हमारी ज़िंदगी तवे की रोटी खाते-खाते निकल गई, बेटा नान खाएगा।"
बेगम ने पलटवार किया- "दुआ करो, शराब पीने वाली न हो।"
मज़ाक में कहीं बात उनके दिल को छू गई। उन्होंने अपने पुराने दोस्त रहमत चचा से मशवरा किया।
चचा ने दाढ़ी सहलाते हुए कहा-"गले में खूंटा डाल दो।"
"खूंटा?"
"विलायत जाने से पहले निकाह कर दो, विदाई बाद मैं कर देना।"
रिश्ता खोजा गया। सलीम दरोगा की बेटी शबाना गोरी- चिट्टी और मिडिल पास थी। उसका चयन हुआ। सलीम दरोगा रहमत चचा के दामाद का भाई था। रहमत चचा ने ऊच-नीच की जिम्मेदारी ली तो दरोगा अपनी बेटी का निकाह रियासत से करने पर राज़ी हुआ।
निकाह के बाद रियासत विलायत चला गया। शुरू में ख़त आते रहे फिर कम हो गए और एक दिन ख़बर आई-रियासत ने इंग्लैंड में गोरी मेम से शादी कर ली और एक बेटी का बाप भी बन गया है।
यह ख़बर सुनकर दरोगा सलीम आग बबूला हो उठा। उसने रहमत चचा से कहा- "तीन महीने मैं लड़के को वापस ले आओ... ,नहीं आया तो मेरा भाई आप की बेटी को तलाक़ दे देगा।"
रहमत चचा इंग्लैंड गए। मां की बीमारी का बहाना करके रियासत को अपने साथ ले आए।
नवाब साहब ने आते ही उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया। उसके साथ शबाना की विदाई हुई बिना चाहत बिना प्यार।
रियासत और शबाना एक ही घर में रहते थे, मगर जैसे दो अजनबी एक ही छत के नीचे रह रहे हैं। बातचीत कम, और अधूरे संवाद यही उनका जीवन था।
रियासत प्रथम श्रेणी का गज़ेटेड अफसर हो गया था और सरकारी बंगले में रहने लगा था। एक दिन सरकारी आदेश आया- उसे इंग्लैंड जाना था।
नवाब साहब ने शर्त रख दी- "शबाना को साथ ले जाओ तभी पासपोर्ट मिलेगा।"
इंग्लैंड में -क्लब... संगीत... शराब... वही पुरानी दुनिया जिससे वह कभी अलग नहीं हो पाया था। उसे लगा जैसे कोई पुरानी शराब फिर से नसों में दौड़ रही हो। काले, भूरे और और गोरे सभी अपनी दुनिया में मस्त थे। उसने आह भरी- "उसे डायना याद आई जिसे उसने अमेरिकी ढंग की अंग्रेज़ी के स्थान पर भारत की अंग्रेज़ी सिखाई थी और अपने साथ रखता था।"
रात को क्लब में पुराने दोस्तों से मुलाक़ात हुई जिन्होंने उसका नाम रियासत से बदलकर रॉबिन रख दिया था। सब बैठकर पैग पीने लगे और चीयर्स बोलने लगे। इस तरह शराब का दौर चलता रहा।
नशे में एक दोस्त ज़ोर से हंसकर बोला- "राॅबिन, यू ओल्ड बास्टर्ड, यू हैव वाइफ एंड डॉटर फिर इस इंडियन विच से मैरिज क्यों की?"
शबाना कुछ दूर खड़ी सुन रही थी। उसके अंदर कुछ टूट गया। गेस्ट हाउस लौटकर रियासत नशे में धुत ड्राइंग रूम के सोफे पर पड़कर सो गया। शबाना आंसू बहाती रही।
सुबह की फ्लाइट से वह भारत वापस पहुंच गए। रियासत ने शबाना से कहा -"तुमने जो सुना, वह मेरा पास्ट था, फिर भी मैं तुमसे उस ग़लती की माफी मांगता हूं।
"अब इन बातों का कोई फायदा नहीं। आपने वफा का मतलब समझा ही नहीं।"
"वफा का मतलब गुलामी?" रॉबिन झल्लाया।
"बस इसी गुलामी से तुम्हें आज़ाद कर रही हूं।" वह चली गई।
मां ने सच जाना तो चुपचाप बेटे की ओर देखा -"तूने उसे रोका क्यों नहीं?"
"क्योंकि मां... शायद मैं उसे कभी पकड़ ही नहीं पाया।"
मां पहली बार रोई थी -"मैंने तुझे पढ़ाया, बड़ा अफसर बनाया... लेकिन अच्छा इंसान बनाना भूल गई।"
कुछ ही दिनों में मां चल बसी।
घर में सब कुछ था- बस घर नहीं था।
सालों बाद वह फिर इंग्लैंड गया। वही इंग्लैंड। वही बार। पर आंखों में चमक नहीं, थकान थी।
नीली आंखों वाली लड़की ड्रिंक लेकर आई... हूबहू डायना की परछाईं।
रॉबिन ने अचानक पूछा- "तुम्हारा नाम?"
"मरियम राॅबिन।"
दुनिया कहीं रुक गई।
"मम्मी का नाम?"
"डायना राॅबिन।"
"तुम्हारे पापा?"
मम्मी कहती थी, "तुम्हारे पापा इंडियन थे।"
रॉबिन ने पर्स में लगा फोटो उसे दिखाया।
फोटो में राॅबिन के साथ डायना थी। फिर कहा -"यही तुम्हारी मम्मी है, पापा की गोदी में तुम हो।"
फोटो देखकर मरियम बोली- "मम्मी कहती थीं- तेरे पापा बेवफा...।"
रॉबिन चुप रहा, फिर बहुत देर बाद बोला- "वफा शायद मैंने कभी सीखी ही नहीं... ।"
मरियम ने उसकी ओर देखा- "अब?"
"अब सीखना चाहता हूं... अगर अभी देर न हुई हो।"
क़ानूनी लड़ाई के बाद मरियम उसकी बेटी बन गई- कागज़ों में। वह बेटी को लेकर वतन लौट आया।
एक दिन रियासत पुराने कागज़ देख रहा था कि उसे एक पीला पड़ा लिफाफा मिला। उस पर वही परिचित लिखावट थी- शबाना की...।
लिफाफे में एक छोटा सा ख़त और एक पुरानी मेडिकल रिपोर्ट थी।
उसने पढ़ना शुरू किया- "रियासत साहब, जब मैं घर से गई थी तो आपको एक सच नहीं बता सकी। डॉक्टर ने कहा था कि मैं कभी मां नहीं बन सकती। मुझे लगा-जिस आदमी की ज़िंदगी पहले ही किसी और से जुड़ी हो उसकी ज़िंदगी पर अपना बोझ क्यों डालूं। मैंने आपको इसलिए नहीं छोड़ा कि आप बेवफा थे बल्कि इसलिए छोड़ा कि आप आज़ाद रहें।"
रियासत बहुत देर तक चुप बैठा रहा।
उसी क्षण उसे पहली बार लगा कि जिस औरत को वह अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल समझता रहा वही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई थी।
कुछ दिनों बाद वह मरियम को साथ लेकर शबाना के शहर पहुंचा। दरवाज़ा खुला। सामने वही चेहरा था-बस बालों में सफेदी उतर आई थी।
फिर रियासत ने धीमे स्वर में कहा- "अगर अभी भी बहुत देर नहीं हुई-तो क्या हम फिर से एक घर बना सकते हैं?"
शबाना ने मरियम की ओर देखा। मरियम मुस्कुरा कर उसके पास आकर खड़ी हो गई। शबाना की आंखें भीग गईं। बरसों की दूरी जैसी एक लंबी सांस बनकर टूट गई।
कुछ महीने बाद संडीला की वही पुरानी हवेली फिर आबाद हुई।
आंगन में एक लड़की अंग्रेज़ी में हंसती थी, उर्दू में दुआ मांगती थी और शबाना को "अम्मी" कहकर बुलाती थी।
रियासत अक्सर बरामदे में बैठा उन्हें देखता रहता।
उसे अब समझ आया कि विलायत ने उसे बहुत कुछ सिखाया-भाषा, तौर-तरीक़े,आज़ादी...,मगर वफा की तालीम उसे बहुत देर से मिली। और वह भी उसी औरत से-जिसे उसने कभी अपनी ज़िंदगी में रहने ही नहीं दिया।
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