Extra Material Affair.. - 3 in Hindi Motivational Stories by kalpita books and stories PDF | Extra Material Affair.. - 3

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Extra Material Affair.. - 3

लेकिन ज़िंदगी उतनी आसान नहीं होती जितनी इंसान सोच लेता है।
कभी-कभी तो वो हमारे ख्वाबों का उल्टा ही कर देती है।

ऑफिस में एक दिन विकास देर तक काम कर रहा था।
अचानक उसके सीने में तेज़ दर्द उठा।
साथियों ने उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया।
शालिनी भी दौड़ी-दौड़ी आई।

डॉक्टरों ने भरसक कोशिश की, पर हार्ट अटैक इतना गंभीर था कि...
कुछ ही घंटों में विकास ने दम तोड़ दिया।

शालिनी अवाक रह गई।
जिस इंसान के लिए उसने अपना घर, पति और बच्चा छोड़ा था,
जिसे अपनी “आज़ादी” समझा था—वो अब इस दुनिया में नहीं था।

अस्पताल के सफेद कमरे में अकेली बैठी शालिनी के सामने बस एक सवाल था—
“अब?”

उसके पास न पति था, न बेटा, न परिवार…
और जिस विकास के लिए उसने सब छोड़ा, वो अब सिर्फ एक याद था।
विकास की मौत के बाद शालिनी की ज़िंदगी जैसे थम गई।
होटल का कमरा खाली-खाली लगता, काम पर जाने का मन नहीं करता, और रातें तन्हाई से डराने लगीं।

वो औरत जो कभी अपने घर की रानी थी, अब अकेली रह गई थी—बिना सहारे, बिना पहचान।
समाज की नज़रें और भी चुभने लगीं।
ऑफिस में लोग उसके पीछे फुसफुसाते—
“देखा… शादीशुदा होकर अफेयर किया, और अब अकेली रह गई।”
कॉलोनी में भी कोई उसे इज़्ज़त की नज़र से नहीं देखता था।

धीरे-धीरे शालिनी की हालत बद से बदतर हो गई।
पैसे खत्म होने लगे, रिश्तेदारों ने भी मुँह मोड़ लिया।

एक दिन उसकी ममता इतनी तड़प उठी कि उसने सोचा—
“मैं अपने बेटे को एक बार देख लूँ।”

वो चुपचाप मनोज के घर पहुँची।
दरवाज़े पर खड़ी होकर कांपते हाथों से बेल बजाई।
दरवाज़ा खुला—सामने मनोज खड़ा था।

मनोज ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था, लेकिन ठंडापन था।

शालिनी ने भर्राई हुई आवाज़ में कहा—
“बस… एक बार अपने बेटे को देखना चाहती हूँ।”

उसी वक्त अंदर से उसका बेटा बाहर आया।
बारह साल का मासूम अब कुछ और परिपक्व लग रहा था।
उसने माँ को देखा… और चेहरा फेर लिया।

“माँ… पापा ने कहा था आप हमें कभी अपनी शक्ल मत दिखाना।
और सच कहूँ… मैं अब आपको माँ बुलाना भी नहीं चाहता।”
"शालिनी कुछ गलतियां ऐसी होती है जिनको माफ़ नहीं किया जा सकता...मैने बहुत समझाने की कोशिश् की थी तुम्हे...पर अब नही ...तुम्हे तलाक के पेपर मिल जाएगे...तुमने एक्स्ट्रा अफेयर किया था इसलिए तुम्हे एल्युमनी भी नहीं मिलेगी" मनोज ने कहा

ये सुनते ही शालिनी जैसे पत्थर बन गई।
उसका दिल चीर गया, आँसू उसके गालों पर बह निकले।

मनोज ने दरवाज़ा धीरे से बंद कर दिया।
अब शालिनी सचमुच अकेली रह गई थी।
न पति, न बेटा, ना घर ,ना पैसा ,न प्रेमी…
बस एक लंबा सन्नाटा और पछतावा।

दरवाज़ा बंद होते ही शालिनी वहीं चौखट पर बैठ गई।
आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।
जिस बेटे के लिए उसने कभी रात-रात भर जागकर कहानियाँ सुनाई थीं, वही आज उसकी शक्ल देखना नहीं चाहता था।
जिस पति ने उसे बिना किसी बंधन के ज़िंदगी जीने की आज़ादी दी थी, उसी ने अब हमेशा के लिए दरवाज़े बंद कर दिए थे।
और जिस प्रेमी के लिए उसने सबकुछ छोड़ा था… वो अब इस दुनिया में ही नहीं था।

शहर की भीड़भाड़ में वो औरत अब अकेली रह गई थी।
होटल का कमरा उसके लिए जेल बन गया था।
कभी-कभी वो आईने के सामने खड़ी होकर खुद से पूछती—
“क्या यही थी मेरी आज़ादी? क्या इसके लिए मैंने अपना घर उजाड़ा?”

दिन बीतते गए, पर उसका खालीपन और गहराता गया।
उसके पास अब सिर्फ़ तन्हाई थी, पछतावा था और वो पल… जब उसने अपने ही हाथों से अपनी ज़िंदगी के सबसे क़ीमती रिश्ते तोड़ दिए थे।

एक दिन खिड़की से आती धूप को देखते हुए उसने सोचा—
“इंसान कभी-कभी मोह और चाहत में इतना अंधा हो जाता है कि उसे असली खुशी का पता ही नहीं चलता।
आज़ादी दरअसल रिश्तों से भागने में नहीं, बल्कि उन्हें निभाने में होती है।”

शालिनी ने आँखे बंद कर लीं।
दिल भारी था, मगर सच अब साफ़ दिख रहा था।
उसने ज़िंदगी से सबसे कठिन सबक सीख लिया था—
जब इंसान अपने चाहत के लिए परिवार की नींव तोड़ देता है, तो अंत में उसे बस पछतावा और अकेलापन ही मिलता है।

कल्पिता 🌻