Prernaspandan - 6-7 in Hindi Short Stories by Bhupendra Kuldeep books and stories PDF | प्रेरणास्पंदन - 6-7

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प्रेरणास्पंदन - 6-7


अध्याय : 6

अनजान फरिश्ते 

 

                 जीवन के रास्ते कभी-कभी हमें ऐसे मोड़ पर ले आते हैं, जहाँहमें इंसानियत के नए और अद्भुत रूप देखने को मिलते हैं। यह कहानी एकऐसे ही दिन की है जब संघर्ष और सादगी के बीच एक अनोखी घटनाघटी। दो मित्र एक शनिवार की दोपहर रायपुर से महासमुंद की ओर जारहे थे। सफर लंबा था और थकान मिटाने के लिए उन्हें एक कप चाय कीतलाश थी। रास्ते में एक छोटी सी टपरी दिखाई दी, जहाँ एक वृद्ध महिला, जिन्हें सब प्यार से 'माई' कहते थे, अपनी दुकान चला रही थीं।

दोनों ने माई से चाय के लिए पूछा, लेकिन माई ने बड़े सहज भाव से कहाकि बेटा दूध खत्म हो गया है, इसलिए चाय बनाना मुश्किल है। मुसाफिरमित्रों ने हार नहीं मानी और उन्होंने माई से काली चाय बनाने का अनुरोधकिया। माई ने बड़ी ममता से उनके लिए गरमा-गरम काली चाय बनाई। चाय पीने के बाद जब पैसे देने की बारी आई, तो एक नया संकट खड़ा होगया। एक दोस्त के पास सिर्फ सौ रुपये का नोट था और दूसरे की जेबखाली थी। माई के पास भी छुट्टे पैसे नहीं थे।

अभी वे दोनों दोस्त सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए, तभी वहाँ एकमोटरसाइकिल पर दो अनजान व्यक्ति आकर रुके। उन्होंने भी माई सेचाय मांगी, लेकिन माई ने उन्हें भी वही बताया कि दूध नहीं है। उनअनजान लोगों ने जब देखा कि दो लोग पहले से वहाँ काली चाय पी रहे हैं, तो उन्होंने माई से पूछा कि उनका हिसाब कितना हुआ। माई ने बताया किउन्होंने बिना दूध की काली चाय पी है।

तभी उन अनजान व्यक्तियों में से एक ने बिना किसी झिझक के अपनीजेब से पैसे निकाले और माई के हाथ पर रख दिए। उन्होंने बड़े ही विनम्रस्वर में कहा, "माई, चाय चाहे वे लोग पीएं या हम, आपको आपकी मेहनतके पैसे मिलने ही चाहिए।" इतना कहकर वे लोग वहाँ से चले गए। जबदोस्तों को यह पता चला, तो वे दंग रह गए। वे दौड़कर उन्हें धन्यवाद देनेबाहर गए, लेकिन तब तक वे दोनों अनजान फरिश्ते धुएँ की तरह ओझलहो चुके थे।

वे चार रुपये (उस समय के हिसाब से) कोई बड़ी रकम नहीं थी, लेकिनउसके पीछे का भाव किसी महानता से कम नहीं था। उन लोगों ने उस चायके पैसे दिए जो उन्होंने कभी पी ही नहीं थी। यह घटना हमें सिखाती है किभला काम करने के लिए रिश्तों या पहचान की ज़रूरत नहीं होती। कभी-कभी अनजान लोग भी हमारे जीवन में ईश्वर का रूप बनकर आते हैं औरहमें यह एहसास करा जाते हैं कि दुनिया में आज भी अच्छाई ज़िंदा है।

सीख / नैतिक संदेश:

नेकी और भलाई करने के लिए किसी मौके का इंतज़ार न करें। दूसरों कीमदद करना और किसी की मेहनत का सम्मान करना ही सच्ची इंसानियतहै। अनजाने में किया गया एक छोटा सा भला काम किसी के जीवन परगहरा प्रभाव छोड़ सकता है। 

अध्याय :7

विश्वास की जीत 

 

                  सच्चा मित्र वही होता है जो संकट के समय में साथी का साथन छोड़े। दोस्ती एक ऐसा पवित्र रिश्ता है जो खून के रिश्तों से भी ऊपरउठकर विश्वास की बुनियाद पर टिका होता है। यह कहानी दो ऐसे हीमित्रों की है, जिनके दिल में देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। उन्होंने बचपन से एक ही सपना देखा था—मातृभूमि की सेवा करना। अपनेइसी सपने को पूरा करते हुए, दोनों ने सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कासंकल्प लिया।

एक बार सीमा पर भीषण युद्ध छिड़ गया। चारों ओर से गोलियाँ चल रहीथीं और दुश्मन के गोले बरस रहे थे। इसी घमासान युद्ध के बीच, एकदोस्त दुश्मन की गोली का शिकार होकर बुरी तरह घायल हो गया औरबीच मैदान में गिर पड़ा। दूसरा दोस्त अपने दल के साथ थोड़ी दूर पीछे कीसुरक्षित स्थिति (position) पर था। घायल दोस्त ने दर्द से कराहते हुएअपने मित्र को आवाज़ दी। वह पुकार उसके दोस्त के कानों तक पहुँचगई।

जैसे ही उसने अपने दोस्त की पुकार सुनी, उसने मैदान की ओर दौड़ने कीकोशिश की। तभी उनके सेना के बड़े अधिकारी (मेजर) ने उसे रोकते हुएकहा, "बेटा, सामने से भयंकर गोलीबारी हो रही है। जब तक तुम वहाँपहुँचोगे, तुम्हारा दोस्त दम तोड़ चुका होगा। अब वहाँ जाना केवल अपनीजान खतरे में डालना है, उसका कोई फायदा नहीं होगा।" लेकिन उससच्चे दोस्त के दिल में अपने साथी को बचाने की तड़प इतनी ज़्यादा थीकि उसने अपने सीनियर की बात को अनसुना कर दिया और मौत कीपरवाह किए बिना गोलियों के बीच दौड़ पड़ा।

कुछ देर बाद, मेजर ने देखा कि वह जवान अपने कंधे पर अपने दोस्त कापार्थिव शरीर उठाए हुए वापस आ रहा है। जब वह पास आया, तो मेजर नेदुख और गुस्से के मिश्रित स्वर में कहा, "मैंने तुमसे पहले ही कहा था कितुम्हारा जाना बेकार जाएगा। तुम्हारा दोस्त मर चुका है।" उस वक्त उससिपाही ने जो जवाब दिया, उसने सबकी आँखें नम कर दीं।

उसने नम आँखों से कहा, "नहीं सर, मेरा जाना बेकार नहीं गया। जब मैंवहाँ पहुँचा, तब उसकी साँसें चल रही थीं। उसने जैसे ही मुझे देखा, उसकेचेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आई और उसने धीरे से कहा—'दोस्त, मुझेपूरा यकीन था कि तुम ज़रूर आओगे।' सर, मैं उसकी जान तो नहीं बचापाया, लेकिन उसके मुझ पर बने उस विश्वास और हमारी इतने सालों कीदोस्ती को ज़िंदा रखने में ज़रूर कामयाब रहा।"

यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में दोस्ती से बड़ा कोई धन नहींहोता। जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब भी एक सच्चा दोस्त हमारे साथखड़ा रहता है। दोस्ती का मतलब केवल साथ हँसना-खेलना नहीं, बल्किएक-दूसरे के भरोसे को हर परिस्थिति में कायम रखना है।

सीख / नैतिक संदेश:

दोस्ती की सच्ची परख संकट के समय ही होती है। पैसा और पद वापसमिल सकते हैं, लेकिन एक बार खोया हुआ विश्वास और सच्चा दोस्तदोबारा नहीं मिलता। अपने मित्रों के विश्वास को कभी टूटने न दें, क्योंकिदोस्ती ही वह ताकत है जो हमें कभी अकेला महसूस नहीं होने देती।

मेरी अन्य किताबें मीता अनकहा अहसास उड़ान आमेजन पर उपलब्ध है कृपया पढ़ें और फीडबैक दें 

भूपेंद्र कुलदीप  

bhupendra kuldeep

bhupendrakuldeep@gmail.com