Waiting for His Son in Hindi Travel stories by PM books and stories PDF | पापा का पुराना फोन

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पापा का पुराना फोन

रवि शहर में बड़ी कंपनी में नौकरी करता था।
अच्छी तनख्वाह, बड़ा ऑफिस, नए दोस्त — सब कुछ था उसके पास।
लेकिन इन सबके बीच वह धीरे-धीरे अपने गाँव और अपने पिता से दूर होता जा रहा था।
उसके पिता गाँव में छोटी-सी किराने की दुकान चलाते थे।
हर रात ठीक 9 बजे रवि के फोन का इंतज़ार करते।
लेकिन रवि हमेशा व्यस्त रहता।
कभी मीटिंग…
कभी दोस्तों की पार्टी…
कभी थकान…
और फिर वह सोचता,
“कल बात कर लूँगा।”
एक दिन पिता ने खुद फोन किया।
पुराने फोन की टूटी आवाज़ में बोले,
“बेटा, खाना खा लिया?”
रवि लैपटॉप पर काम कर रहा था। झुंझलाकर बोला,
“पापा, मैं अभी बहुत बिज़ी हूँ… बाद में बात करता हूँ।”
और उसने फोन काट दिया।
उधर पिता कुछ देर तक मोबाइल को देखते रहे।
फिर मुस्कुराकर दुकान के बाहर बैठ गए।
शायद उन्हें बेटे की आवाज़ सुनना ही काफी लगता था।
कुछ दिनों बाद रवि की माँ का फोन आया।
आवाज़ काँप रही थी।
“बेटा… तुम्हारे पापा को अस्पताल में भर्ती किया है। जल्दी आ जा।”
रवि के हाथ काँपने लगे।
वह तुरंत गाँव पहुँचा।
अस्पताल के बेड पर पिता बहुत कमजोर लग रहे थे।
सांसें धीमी थीं।
रवि उनके पास बैठकर रोने लगा।
“पापा… मुझे माफ कर दो। मैं आपके लिए कभी समय नहीं निकाल पाया…”
पिता ने मुश्किल से आँखें खोलीं।
हल्की मुस्कान के साथ बोले,
“पागल…
बाप अपने बच्चों से नाराज़ नहीं होते।”
इतना कहकर उन्होंने तकिए के नीचे से अपना पुराना फोन निकाला।
फोन की स्क्रीन टूटी हुई थी।
उसमें रवि का नंबर सबसे ऊपर सेव था — “मेरा बेटा ❤️”
रवि फूट-फूटकर रो पड़ा।
माँ ने धीरे से कहा,
“तेरे पापा रोज़ रात को तेरा नंबर खोलकर देखते थे…
बस इंतज़ार करते रहते थे कि शायद आज बेटे का फोन आ जाए।”
उस रात रवि को पहली बार एहसास हुआ—
दुनिया की सबसे बड़ी दूरी किलोमीटरों में नहीं होती,
बल्कि “बाद में बात करता हूँ” में छिपी होती है।
उस रात रवि अस्पताल के बाहर बैठा रहा।
बारिश हो रही थी, लेकिन उसे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।
उसके कानों में बार-बार पिता की वही आवाज़ गूंज रही थी—
“खाना खा लिया बेटा?”
उसे याद आने लगा…
कैसे बचपन में पापा उसे कंधे पर बैठाकर मेले ले जाते थे।
कैसे खुद पुराने कपड़े पहनते, लेकिन उसके लिए नए जूते खरीदते थे।
कैसे दुकान पर पूरा दिन खड़े रहने के बाद भी रात को उसके साथ पढ़ाई करते थे।
और उसने…
बस “मैं बिज़ी हूँ” कहकर सब खत्म कर दिया।
सुबह डॉक्टर बाहर आए।
उन्होंने धीरे से कहा,
“अब खतरा टल गया है… लेकिन इन्हें आराम और अपने लोगों की जरूरत है।”
रवि तुरंत अंदर भागा।
उसने पिता का हाथ पकड़ लिया।
इस बार पिता की आँखें खुलीं तो रवि ने फोन बंद कर दिया, लैपटॉप एक तरफ रख दिया और बोला,
“पापा, आज कहीं नहीं जाना… आज सिर्फ आपसे बात करनी है।”
पिता हल्का-सा मुस्कुराए।
शायद उन्हें दवाई से ज्यादा अपने बेटे का साथ अच्छा लग रहा था।
कुछ दिनों बाद रवि ने बड़ा फैसला लिया।
उसने शहर की नौकरी छोड़ दी और गाँव लौट आया।
लोग हैरान थे।
“इतनी बड़ी नौकरी छोड़ दी?”
रवि बस मुस्कुरा देता।
अब वह हर सुबह पिता के साथ दुकान खोलता।
पिता ग्राहकों को सामान देते और गर्व से कहते,
“ये मेरा बेटा है… शहर में बड़ा अफसर था।”
एक दिन रात को दुकान बंद करते समय पिता ने पूछा,
“बेटा, तुझे शहर की जिंदगी याद नहीं आती?”
रवि की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा,
“पापा, वहाँ पैसा था…
लेकिन यहाँ सुकून है।”
पिता मुस्कुराए और पहली बार चैन की नींद सोए।
क्योंकि उन्हें अब यकीन हो गया था—
उनका बेटा उसके पास आ गया है।