Bird Cage - Part 4 in Hindi Women Focused by Anil Kundal books and stories PDF | पंछी का पिंजरा - भाग 4

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पंछी का पिंजरा - भाग 4

मुझे दो दिन बाद होश आया था। डाक्टर नर्सस और जान पहचान के सभी लोगों ने मेरी बचने की उम्मीद पूरी तरह से खो दी थी। जैसे कि बीच नदी के पहुँचते ही भंवर उठने पर मल्लाहें सभी तरह की आशाओं को छोड़कर निराशाओं के भंवर में फंस जाते हैं। और दूसरी बार जोरदार तूफानी लहरों के उठने से पहले ही संभवतः सब कुछ समाप्त सा लगने लगता है।अम्मा बाबूजी का भी यही सब हाल था। सभी ने मेरे  लिए दो चार आंसू बहाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। लेकिन किसी को क्या पता था कि मैं भी  फिनिक्स पंछी के जैसे ही अपनी जिजीविषा की राख से फिर से जी उठूंगी। जैसे कि अपने दोनों पर्णों से आहत  कोई कोई पंछी भी किसी ना किसी दिन उम्मीद के पर लगा कर उड़ जाता है। ठीक वैसे ही मैं भी उम्मीद की सीढ़ियों चढ़ चढ़ कर आरोग्य रूपी गगनचुम्बी अट्टालिका पर सहजता से जा पहुँची थी।

मेरे सिर पर चोट गहरी थी और मेरे दिल पर भी उस चोट से भी ज्यादा गहरे जख्म हो गए थे। यकीनन कुछेक बड़े बड़े दिनों के बहुतेरे लम्हों के गुजरने के साथ ही सिर पर लगी चोट के जख्म तो पूर्णतः भर ही जाते, परंतु जो जख्म मेरे दिल पर नासूर बनते जा रहे थे, उनका क्या? 

कोई अपना भी इतना निष्ठुर हो सकता है क्या? दर्द अपना ही महसूस हो सकता है, क्या औरों का नहीं? चोट अपनों की ज्यादा तड़पाती है कि किसी पराये जन की? 

बस ऐसे ही बेवजह बेमतलब के सवालातों के बीचोबीच मैं, इधर से उधर करवटें बदल बदल कर, एक नन्हें से बच्चे की तरह जबरदस्त झूले में झूलते हुए, निराधार झूल रही थी। 

बाबूजी उस दिन काम पर नहीं गए थे। मेरी देखरेख में जुटे रहे थे सुबह सबेरे से ही। और निश्चित रूप से पिछली रात भी आंख भर सोए नहीं थे। यदा कदा यूँ लगता था जैसे कि उनकी आंखें नींद से बोझिल हुईं जाती हैं। यूँ तो मैंने अपनी इस छोटी सी उम्र में बहुतों को निठल्ले खटरागियों की तरह निश्चिन्त भाव से दिवा स्वप्नों में ऊंघते देखा है। संभवतः वो लोग अचिंत और अलबेले रहे होंगे। पर मेरे बाबूजी उन श्रेणी के महानुभावों में नहीं आते थे। 

मेरे समीप ही अपनी आरामदेह कुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे कि अचानक से ही बाहरी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी और उसके प्रत्युत्तर में अम्मा जी कुछ बुदबुदाते हुए स्वर में कुछ अस्फुट सी बोली बोलती दरवाजा खोलने के निमित्त गईं। और दरवाजे पर अनचाहे आगंतुक को देखकर वो पूर्णतः डर सहम सी गई और वो निर्लज्ज आगंतुक बिना किसी तरह कीऔपचारिकता बरते घर के भीतर चला आया और उसे अम्मा जी चाहकर भी रोक नहीं सकती थी। 

" इंस्पेक्टर इन्द्र दत्ता! " सीधे वो बाबूजी के समीप पहूंचने के साथ ही बोला। 

" जी, कहिए! इंस्पेक्टर जी! कैसे आना हुआ? " बाबूजी ने सामने ही रखी टेबल पर अखबार रखने के साथ ही कहा। " सविता, जरा एक कुर्सी तो पकड़ लाओ! " इंस्पेक्टर की तरफ नज़र भरकर देखते हुए बाबूजी फिर से बोले। 

अम्मा उनके कहने से पहले ही एक कुर्सी उठा लाई थी। कुर्सी को रखने के साथ ही अम्मा जी अपने कमरे की ओर चली गईं थीं। 

कुर्सी पर बिराजने के साथ ही इंस्पेक्टर इन्द्र बोले, " कितनी प्यारी बच्ची है आपकी! बेटी, क्या नाम है आपका? "

" पारुल! " मैं हिचकिचाहट के साथ लड़खडाए हुए लफ़्ज़ों से यूँ बोली जैसे कि अपना नाम बताकर मैंने कोई संगीन गुनाह कर दिया हो। 

" बहुत प्यारा नाम है गुड़िया आपका। बिल्कुल आप सा ही प्यारा। हाँ, तो मिस्टर.... ! "

" विश्वेश्वर सिंह! " बाबूजी ने अपलक प्रत्युत्तर दिया। उस जागरूक और ईमानदार इंस्पेक्टर ने बाबूजी को एक बार फिर से गौर से देखा और पुनः प्रश्नों को पूछने के पहले एक मुस्कुराहट मेरी तरफ फेंकी और मुझे कुछ अस्तव्यस्तता सी अनुभव हुई क्योंकि मुझे लगा कि वो मेरे साथ प्रश्नोत्तरी वाले खेल को खेलने के लिए तत्पर है। 

मैं लज्जा के मारे छुईमुई के शर्मिले पौधे के जैसे अपने बिस्तर पर ही लेटी लेटी संकुचित सी हो गई। 

" जी, विश्वेश्वर सिंह जी! आपकी पुत्री पर इतना भयंकर जानलेवा हमला हुआ और आपने थाने में रिपोर्ट तक दर्ज तक कराना उचित नहीं समझा? क्या एक जागरूक नागरिक होने के नाते ये आपका कर्तव्य नहीं था? ये दोनों के प्रति अन्याय है। इस बेचारी बच्ची के साथ भी और कानून के साथ भी। खैर, ये बताइए कि आपको किस शख़्स पर शक़ है? किसी से कोई दुश्मनी? कोई जमीन जायदाद का झगड़ा बगैरा? " उस इंस्पेक्टर ने किंचित गंभीरता के साथ पूछताछ शुरू करनी चाही। 

" इंस्पेक्टर साहब, इसमें से कोई भी बात नहीं है। लेकिन यह पक्का तैय है कि हमला वाकई जानलेवा था। जरूर कोई दुश्मन ही होगा। वरना कोई अपना तो ऐसा वैसा करने से रहा! " बाबूजी ने इंस्पेक्टर को कहा और फिर से अम्मा जी को आवाज लगाकर बोला, " सविता! जरा इंस्पेक्टर साहब के लिए कुछ ठंडा या गरम तो कुछ लाओ? कबके इंतज़ार करते हैं हम! "

"जी, ले आई! " और अम्मा जी यूँ झपट एक तश्तरी में दो कप गरमागरम चाय और चार गरमागरम समोसे ले आईं मानों उन्हें बस बाबूजी के हुक़्म का इंतजार हो। सामने मेज पर रखकर पुनः अपने ठिकाने चलती बनी। " 

" तकलीफ छोड़िए जनाब! मुझे अपनी डयूटी निभाने दीजिए! "

" जी, जी! डयूटी में हम कोई रोड़ा थोड़ी बनते हैं! चाय लीजिए साहब! "

चाय और समोसों की समाप्ति के पश्चात फिर से उन्होंने वो प्रश्न दोहराया। 

बाबूजी के पास उस प्रश्न का कोई स्फुट उत्तर नहीं था। तो अंततः वहाँ से प्रस्थान करने के पूर्व वह इंस्पेक्टर एक और प्रश्न पूछ ही बैठा जो कि हर लिहाज़ से मुनासिब था, " बच्चों के साथ, यानि कि उनकी देखरेख करने वाला शख़्स, कौन हर वक्त हाज़िर रहता है? "

" अम्मा जी! " बाबूजी ने अविलंब प्रत्युत्तर में जबाब दिया। 

" आपकी कि बच्चों की? " इंस्पेक्टर ने अपने अस्तव्यस्त बालों को संवारने की बेकार कोशिश करते हुए पूछ लिया था। और मैं समझती हूँ कि उसका पूछना किसी भी नजरिये से अनावश्यक नहीं था। 

" वैसे तो दोनों की ही। मगर मेरी अम्मा जी ज्यादा से ज्यादा वक्त मेरे दोनों बच्चों के साथ व्यतीत करतीं हैं। " 

" ठीक है। तो फिर उन्हें ही बुलाइए! कुछ जरूरी पूछताछ करनी है उनके साथ! "

" अम्मा जी से? मैं नहीं समझता इंस्पेक्टर साहब कि उनके साथ पूछताछ करने की कोई जरूरत नहीं है। "

"तो ये हमें अब आपसे पूछना पड़ेगा कि क्या हमें पूछना चाहिए और क्या नहीं पूछना चाहिए? "

" हमारा यह तात्पर्य बिलकुल भी नहीं था साहब! वो तो हम यूँ ही बोल बैठे। क्योंकि हमारी अम्मा जी एक धार्मिक विचारों वाली साध्वी स्त्री हैं। संसारी विषय विकारों से बहुत परहेज करतीं हैं वो। "

" फॉर काइंड योयर नॉलेज! ज्यादातर धार्मिक विचारों के लोग ही मर्डरर निकलतें हैं। हमें अपनी डयूटी निभाने दीजिए! जरा उन्हें बुलाने की जहमत उठाएंगे? "

बाबूजी ने अपनी अम्मा जी को आवाज देकर बुलाया और अम्मा जी ने उस इंस्पेक्टर को नमस्कार किया। इंस्पेक्टर ने उनके बैठने के लिए अपनी कुर्सी उनकी खिदमत में हाजिर कर दी। 

" माता जी जब यह हादसा घटित हुआ था आप उस वक्त कहाँ थीं? " इंस्पेक्टर ने बाइज़्ज़त उनसे ये सवाल उठाने की एक कामयाब कोशिश की। 

" बेटा, उस वक्त मैं ओसारे में चारपाई पर गहरी नींद में सो रही थी और जब ये हमारी नन्ही सी गुड़िया मारे दर्द के पुरज़ोर चीख़ी चिल्लाई, तो मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे कि किसी राह चलते पागल राहगीर ने मुझ पर एक भारी भरकम हथोड़े से प्रहार कर दिया है और मैं भी इसके जैसे पुरज़ोर चीख़ी चिल्लाई और जब मेरी निद्रा भंग हुई, तो देखती हूँ कि ये घर के प्रांगण में ड्योढ़ी से पहले ही धरा पर गिरी पड़ी है और इसके सिर से लहू की धाराएँ बह निकलीं हैं। चाहो तो गुड़िया से पूछ लीजिए कि सत्य यही है जो मैं कह रहीं हूँ और या फिर कुछ और? " दादी जी ने एक चालू चंट वकील के जैसे जोरदार दलीलें दीं थीं। संभवतः उस तथ्य सत्य को काटने की शक्ति किसी में भी नहीं थी। शायद मेरे भीतर भी नहीं। 

इसके पहले कि वो इंस्पेक्टर मुझसे किसी तरह की पूछताछ करता, उसके पहले ही मैं बोल उठी, " इंस्पेक्टर अंकल! दादी जी ठीक कहतीं हैं। उनके एक एक लफ्ज़ मे पूरी पूरी सच्चाई है। इसका प्रमाण मैं स्वयं हूँ। "

" तो ठीक है। विश्वेश्वर सिंह जी! मैं चलता हूँ। लेकिन बिटिया! एक बात आपसे यह जरूर कहना चाहूंगा कि अपराधी के अपराध को छिपाना भी एक तरह से अपराध ही है! " इंस्पेक्टर ने जाने के पूर्व मेरी चेतना रूपी वीणा के सभी तार झंकृत कर दिए थे।