"समाधी" बैठे कभी धयान लगा है, नहीं न, लगना भी चाहिए, योग तक़ गए हो नहीं ना... जाते कयो नहीं... कोई कोई न कोई अतीत की असली कारगुजरिया की होंगी ---- भूलने देगी कभी न।
छोटीया चोरिया करते करते बड़े समगलर बनते है। योग करते करते समाधी तक़ नहीं पहुचे। बहुत हैरत होती होंगी। होंगी जरूर होंगी... बनने की कोशिश नकाम कयो करते हो। जिंदगी असफलता की कुंजी है।
हम लोगों ने ही सफलता पर जाना है। भगवान का नाम उचारो... फिर कुछ हो सकता है। "मागने बैठ गए तुम भाई ---" चलो मंदिर से घर तक़ सफर करते है। " ओह नो " एक दम गर्ल फ्रैंड उच्ची आवाज़ से बोली। "---मै तो नगे पैरी हूँ ---" मंटो चीखा---"चलो वापस... " कुछ पहन कर भी आयी थी या नहीं... " वो चिल्ला के बोली मैंने पीटर के बूट पहने थे, लम्बे वाले। " मंटो बोला " ओह तुमने भी हाथ मारा, उधर कोई चोर भगत हाथ मार गया होगा... " सीढ़िया चढ़ते ही बोली ---" ओह नो, इधर नहीं है --- लगता है साफ कर गया कोई। " निराश हालत मे दोनों जाने लगे, पीछे से पंडित जी ने आवाज़ लगायी... " हेलो, ये बूट आपके है, ले जाओ... प्लीज़। " "----धन्यवाद बोला " मंटो ने। वो पहनने लगी।
और वो पंडित की बात सुनने लगी " हम को लोग जानी मंदिर मे आज कल जुतिया जयादा उठती है, बदनाम हम होते है। " मंटो ने कहा " सौ प्रसंट ठीक बोलते हो पंडित जी। " फिर वो माथा टेक के निकल पड़े।
मंटो की गर्लफ्रैण्ड ने कहा " अगर हम गांव मे होते तो लोगों ने मंटो हमें त्रिशाह देख कर मार देना था, ये शहर है बनारस.. यहां गंगा वहती है, शिव की नगरी। " मंटो बस इस बात पर खूब हसा।
दोनों ने तट पर खड़े होकर जगते दीये बहते देखे। और शिव और माँ गौरा का धयान किया। दोनों खुश थे कितना ही....
फिर वो यूनिवर्सिटी की और जा निकले... दोनों ने बाये की... वो गर्ल हॉस्टल को चले गयी। मंटो आपने कमरे मे आ गया... कमरे मे चार और चार ऊपर के ऊपर बेड लगे थे। उसमे फकीर था। जिसको तीन वार ही वर्कशाप के डिप्लोमे मे ब्रेक था... बस उसमे सब से तेज हर चीज मे फ्रॉड चुस्ती झूठ मे एक नंबर मे मनोज था। जो ये भी पास कर गया था.. मै खुद फकीर के साथ तीसरे लेवल मे था।
फकीर आज रो रहा था... पता नहीं कयो...? " मंटो ने पूछा " कयो फ़िक्र और रो रहे हो " बोला ----" इतना दुःख सपली मे नहीं, जितना कि अनु ने ब्रेक कर लिया " पता नहीं मंटो कयो हस पड़ा.... " मेरे यार को ये दुःख था, लो मुझे कभी किसी का दुःख नहीं हुआ... " सच मे कहा था मंटो ने।" कयो यार सच मे तुम कभी लटकाये चेहरे मे नहीं दिखे " फकीर ने पूछना चाहा। " चल आठ वज गए है, रोटी खा आये, बे. सी से, वो दोनों खाने के लिए बैठे ----" जज्बाती कभी मत बनो फकीर, ये जमाने मे दिल पर लगाने वाले अक्सर पीछे रह जाते है, इस लिए मेरा फार्मूला, फालतू समय मे योग समाधी करो, जज्बाती लड़ाई मत करो, मत करो ये प्यार वैयार.... " ये कह चुकने के बाद फकीर और मंटो कमरे मे जा चुके थे। " हाँ इसी रास्ते पे चलूंगा मै " फकीर न खिलखिला कर कहा।