Part 5 .
बारे में जान रही थी, उतना ही मुझे लग रहा था कि वह खुद भी अपनी भावनाओं को पूरी तरह नहीं समझ पाई थी। वह बार-बार लिखती थी कि उसे अभिनव से प्यार नहीं है, लेकिन उसकी हर दूसरी बात किसी न किसी तरह अभिनव पर आकर रुक जाती थी।
मैंने अगला पन्ना खोला।
वहाँ लिखा था—
"आज मैंने फिर खुद से कहा कि मुझे अभिनव के बारे में नहीं सोचना चाहिए। आखिर मैंने उसे केवल दो बार ही देखा है। पहली बार स्कूल में और दूसरी बार पवन चाचा के यहाँ हुई नौटंकी में।"
"लेकिन पता नहीं क्यों, उसका चेहरा बार-बार याद आ जाता है।"
इसके नीचे एक छोटा सा वाक्य लिखा था—
"शायद इसी वजह से मैंने वह कोड वर्ड बनाया था।"
मैं उत्सुक हो गई।
आगे लिखा था—
"N.S. — नज़र से।"
"क्योंकि अभी तक मेरी पूरी कहानी सिर्फ नज़रों तक ही सीमित है।"
"न उसने मुझसे बात की है, न मैंने उससे।"
"न वह मुझे जानता है, न मैं उसे।"
"फिर भी मेरी नज़रें जाने क्यों उसे ढूँढ़ लेती हैं।"
मैं पढ़ती चली गई।
"आज मैं अपनी सहेली के साथ बाज़ार गई थी। वहाँ बहुत भीड़ थी। अचानक मुझे लगा कि शायद अभिनव भी कहीं दिखाई दे जाए।"
"जब मुझे एहसास हुआ कि मैं उसे भीड़ में खोज रही हूँ, तब मैं खुद पर हँस पड़ी।"
"आखिर मैं ऐसा क्यों कर रही हूँ?"
"क्या सिर्फ किसी को देखना अच्छा लगने का मतलब यह होता है कि हम उसे पसंद करने लगे हैं?"
इसके बाद कुछ देर तक खाली जगह थी, जैसे राधा सोचते-सोचते रुक गई हो।
फिर उसने लिखा—
"नहीं, मुझे नहीं लगता कि मैं उसे पसंद करती हूँ।"
"मुझे बस उसे देखना अच्छा लगता है।"
"उसकी मुस्कान अच्छी लगती है।"
"वह जब अपने दोस्तों के साथ हँसता है तो अच्छा लगता है।"
"बस इतना ही।"
लेकिन अगली ही लाइन पढ़कर मुझे मुस्कान आ गई।
"हालाँकि मैं यह बात पिछले दस दिनों से खुद को समझा रही हूँ।"
अब साफ था कि राधा खुद को समझाने की कोशिश कर रही थी।
आगे लिखा था—
"नौटंकी वाली रात मुझे एक बात समझ आई।"
"अभिनव ने एक बार भी मेरी तरफ नहीं देखा।"
"पहले यह सोचकर थोड़ा अजीब लगा।"
"लेकिन बाद में मैंने सोचा कि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।"
"वह तो यह भी नहीं जानता कि मैं कौन हूँ।"
"और सच कहूँ तो शायद यही ठीक है।"
"क्योंकि अगर उसने अचानक मुझे देख लिया होता, तो शायद मैं घबरा जाती।"
इसके बाद उसने एक छोटा सा हँसता हुआ चेहरा बनाया था।
मैं पढ़कर मुस्कुरा दी।
डायरी के आखिरी हिस्से में राधा ने लिखा था—
"कभी-कभी मुझे लगता है कि यह सब बहुत बेवकूफी है।"
"एक ऐसा लड़का जो मुझे जानता तक नहीं, उसके बारे में मैं इतने पन्ने लिख चुकी हूँ।"
"लेकिन फिर मैं सोचती हूँ कि शायद जिंदगी की कुछ बातें बिना वजह भी अच्छी लगती हैं।"
"शायद हर भावना का नाम होना जरूरी नहीं होता।"
"और शायद हर कहानी प्यार की कहानी भी नहीं होती।"
"फिलहाल मेरी कहानी सिर्फ नज़रों की कहानी है।"
"एक ऐसी कहानी जिसमें मैं उसे देखती हूँ, लेकिन वह मुझे नहीं देखता।"
"और पता नहीं क्यों, अभी तक मुझे इससे कोई शिकायत भी नहीं है।"
पन्ने के सबसे नीचे राधा ने एक आखिरी लाइन लिखी थी—
"लेकिन अगर कभी उसने मुझे देख लिया... तो शायद मेरी कहानी बदल जाएगी।"
उस लाइन के नीचे सिर्फ दो शब्द लिखे थे—
"जारी रहेगा..." 📖✨