गाँव के एक छोटे से घर में राधा अपनी माँ के साथ रहती थी। उसके पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था। माँ दिन-रात सिलाई करके घर चलाती थीं, ताकि राधा पढ़-लिखकर अपने सपने पूरे कर सके। घर में ज़्यादा सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन माँ का प्यार हर कमी को पूरा कर देता था।
राधा हमेशा कहती थी, "माँ, एक दिन मैं इतनी बड़ी नौकरी करूँगी कि आपको कभी काम नहीं करना पड़ेगा।"
माँ मुस्कुराकर कहतीं, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटी, बस तू हमेशा खुश रहना।"
समय बीतता गया। राधा ने मेहनत की, पढ़ाई पूरी की और शहर की एक अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। पूरे गाँव में खुशी का माहौल था। माँ ने मंदिर जाकर भगवान का धन्यवाद किया और मिठाई बाँटी।
शहर जाने से पहले राधा ने माँ का हाथ पकड़कर कहा, "बस कुछ साल की बात है माँ, फिर मैं आपको अपने साथ शहर ले जाऊँगी।"
माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "अपना ध्यान रखना, और समय मिले तो फ़ोन ज़रूर करना।"
शहर पहुँचने के बाद नई नौकरी, नई ज़िम्मेदारियाँ और नई ज़िंदगी शुरू हो गई। राधा सुबह से रात तक काम में व्यस्त रहती। पहले रोज़ फ़ोन होता था, फिर हफ़्ते में एक बार, और धीरे-धीरे महीने में एक बार।
उधर माँ हर शाम दरवाज़े पर बैठकर उसकी आवाज़ सुनने का इंतज़ार करतीं। पड़ोस वाले पूछते, "बहन जी, बेटी कब आएगी?"
माँ मुस्कुराकर कहतीं, "जल्दी आएगी... मेरी बेटी अपना सपना पूरा कर रही है।"
एक दिन माँ ने फ़ोन किया।
"बेटी, कब आएगी?"
राधा ने कहा, "माँ, इस महीने छुट्टी नहीं मिल रही। अगले महीने पक्का आऊँगी।"
माँ ने धीमी आवाज़ में कहा, "ठीक है बेटी... मैं इंतज़ार करूँगी।"
लेकिन वह अगला महीना कभी नहीं आया।
एक सुबह राधा के पास गाँव से फ़ोन आया।
"बेटी... तुम्हारी माँ अब इस दुनिया में नहीं रहीं।"
यह सुनते ही उसके हाथ से मोबाइल गिर गया। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वह तुरंत गाँव पहुँची, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
घर में सब कुछ वैसा ही था। सिलाई मशीन एक कोने में रखी थी। दरवाज़े के पास वही कुर्सी थी, जहाँ माँ रोज़ बैठकर उसका इंतज़ार करती थीं।
राधा ने माँ की अलमारी खोली। उसमें उसकी बचपन की ड्रॉइंग, स्कूल की रिपोर्ट कार्ड, पहला इनाम और जन्मदिन की तस्वीरें बड़े प्यार से संभालकर रखी थीं।
उसे एक छोटी-सी डायरी मिली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"आज मेरी बेटी पहली बार स्कूल गई। वह बहुत डर रही थी, लेकिन मुझे यकीन है कि एक दिन यही बेटी मेरा सबसे बड़ा गर्व बनेगी।"
दूसरे पन्ने पर लिखा था—
"आज राधा को शहर में नौकरी मिल गई। भगवान, मेरी बेटी को हमेशा खुश रखना। उसकी हर परेशानी मुझे दे देना।"
राधा डायरी पढ़ते-पढ़ते फूट-फूटकर रो पड़ी।
तभी उसकी नज़र मेज़ पर रखे एक लिफ़ाफ़े पर गई।
उस पर लिखा था—
"मेरी प्यारी बेटी राधा के लिए।"
काँपते हाथों से उसने चिट्ठी खोली।
उसमें लिखा था—
"बेटी, अगर तू यह चिट्ठी पढ़ रही है, तो शायद मैं तेरे सामने नहीं हूँ। मुझे तुझ पर हमेशा गर्व रहा। कभी यह मत सोचना कि तू मेरे पास कम आई। तू अपने सपनों के लिए मेहनत कर रही थी, और यही मैं चाहती थी। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना—ज़िंदगी में काम कभी खत्म नहीं होता, पर अपने लोग एक बार चले जाएँ तो वापस नहीं आते। इसलिए अपनों के लिए हमेशा थोड़ा समय निकालना। यही मेरी आख़िरी सीख है।"
राधा चिट्ठी को सीने से लगाकर बहुत देर तक रोती रही।
उसने उसी दिन फैसला किया कि वह गाँव में अपनी माँ के नाम से एक छोटी-सी लाइब्रेरी बनवाएगी, ताकि गरीब बच्चों को पढ़ने का मौका मिल सके।
कुछ महीनों बाद लाइब्रेरी बनकर तैयार हो गई। उसके बाहर एक बोर्ड लगा था—
"माँ की मुस्कान पुस्तकालय"
जब भी कोई बच्चा वहाँ पढ़ने आता, राधा को लगता जैसे उसकी माँ मुस्कुरा रही हों।
उस दिन उसे समझ आया कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताया गया समय होता है।
समाप्त।