आरती का कैफे
एक महाविद्यालय के खेल के मैदान में बहुत से छात्र एकत्र थे। मंच पर माइक पकड़े 24 वर्षीय युवा सोहन जोश से बोल रहा था।
"मित्रो, आज हम सरकार से कोई मांग रखने या शिकायत करने नहीं आए हैं। हम युवाओं का कर्तव्य है देशप्रेम और राष्ट्रवाद की भावना को जगाना। भ्रष्टाचार को रोकना। अपने विद्यालय और राष्ट्र को स्वच्छ रखना। अगर हम सिर्फ खुद को सुधार लें, तो आधी शिकायतें अपने आप खत्म हो जाएंगी। पहले खुद का संघर्ष से जीना सीखें और राष्ट्र निर्माण में योगदान दें। जय हिंद!"
मैदान तालियों की गूंज से भर गया।
उसी भीड़ में 22 वर्षीय आरती खड़ी थी। सोहन के विचारों ने उसके दिल को छू लिया। उसने उसी पल ठान लिया - "मैं शादी करूंगी तो सोहन से ही।" संयोग से सोहन की बहन रीना आरती की क्लासमेट थी। रीना के जरिए आरती का सोहन के घर आना-जाना शुरू हुआ।
आरती को सोहन की ईमानदारी और सच्चाई बहुत भाती। सोहन को भी आरती की सादगी पसंद आ गई। कॉलेज के एक समारोह में दोनों ने साथ अभिनय किया और करीब आ गए। दोनों परिवारों को भी रिश्ता मंजूर था। पढ़ाई पूरी होते ही धूमधाम से उनकी शादी हो गई।
लेकिन शादी के बाद असली परीक्षा शुरू हुई। सोहन बेरोजगार था। घर की जिम्मेदारियां, खर्चे, रिश्तेदारों की बातें... सबका बोझ सोहन पर आ गया। अमीर दोस्तों की चमक-दमक देखकर वो चिड़चिड़ा होने लगा। "आदर्श से पेट नहीं भरता" सोचकर उसने अपने मूल्यों को ताक पर रख दिया।
कुछ समय बाद सोहन को एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई। तनख्वाह कम थी, पर दिखावा बड़ा था। बच्चों की फरमाइशें पूरी करने के लिए सोहन ने रिश्वत लेना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसके पास धन, गाड़ी, बड़ा घर सब आ गया। पर आरती का दिल टूट रहा था।
आरती ने सोहन से प्यार उसकी सच्चाई के कारण किया था। जब उसे पति की बेईमानी का पता चला तो उसका मन भर आया। उसने कई बार सोहन को समझाया। "सोहन, ये पैसा सुख नहीं देगा। हमने साथ में गरीबी में जीने का वादा किया था।"
पर लालच में अंधे सोहन को आरती की बातें बुरी लगने लगीं। झगड़े बढ़ गए। आखिर एक दिन हारकर आरती ने सोहन का घर छोड़ दिया और मायके चली गई। उसने सोहन से बात करना भी बंद कर दिया।
आरती के बिना घर सोहन को काटने दौड़ा। रात-रात भर उसे नींद नहीं आती। उसे बार-बार वो मंच याद आता जहां वो "ईमानदारी" का भाषण देता था। उसे अपनी ही बातें झूठी लगने लगीं।
एक दिन सोहन ने खुद से वादा किया - "अब और नहीं।" वो आरती के घर पहुंचा। पैरों में गिरकर माफी मांगी। "भारती, मैंने सब खो दिया। पर तुम्हें नहीं खोना चाहता। आज के बाद कभी गलत रास्ते पर नहीं जाऊंगा।"
आरती का दिल पिघल गया। उसने सोहन को माफ कर दिया और उसके साथ वापस आ गई।
इस बार दोनों ने मिलकर एक नया फैसला लिया। सरकारी नौकरी या बड़ी कंपनी के चक्कर में न पड़कर दोनों ने मिलकर एक छोटा सा कैफे खोला। नाम रखा "आरती का कैफे"।
ये कोई आम कैफे नहीं था। यहां कॉफी के साथ किताबें भी मिलती थीं। दीवारों पर प्रेरणादायक कोट्स लगे थे। शाम को बच्चों के लिए कहानी सुनाने का सेशन होता। कॉलेज के बच्चे आकर यहां बैठते, पढ़ते और अपने सपने शेयर करते।
शुरुआत में कमाई कम थी, पर मन को शांति थी। धीरे-धीरे लोगों को ये जगह पसंद आने लगी। सोहन अब गर्व से कहता, "मैंने रिश्वत से कमाया हुआ पैसा छोड़ दिया, पर इज्जत कमा ली।"
आरती मुस्कुराकर कहती, "जिस दिन तुमने सच का रास्ता चुना, उसी दिन हमारी जिंदगी की गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई।"
आज "आरती का कैफे" शहर में मशहूर है। लोग कहते हैं यहां की कॉफी में ईमानदारी का स्वाद है।
सीख:पैसा, घर, गाड़ी सब आ-जा सकते हैं, पर रिश्ते और आत्मसम्मान एक बार टूटे तो जुड़ते नहीं। सच्चाई और मेहनत से ही जिंदगी खूबसूरत बनती है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली