सृष्टि ज़ब वेद से मिलती है तब उनका सामना बिल्कुल अच्छा नहीं था लेकिन उनके दोस्तों से मिलकर लगा कि ये इतने बुरे भी नही है सृष्टि उस दिन का ख़तम कर अपने घर चली जाती है
मध्य रात्रि मे हल्की हल्की चाँद कि रोशनी फैली हुइ थी जिसमे हल्का हल्का उजाला हो रखा था यहां सृष्टि अपने छत वाले रूम कि बालकनी मे बैठी बैठी चाँद को निहार रही थी उसके हाथ मे एक लॉकेट था जो तारें कि आकृति का था उसे निहारती और चाँद कि और देखती, वो उसके किसी खास व्यक्ति का था बहुत देर बैठे रहने के बाद जैसे ही सृष्टि उठ कर सोने के लिए जाने लगती है उसकी नज़र उसके घर से कुछ दूर एक छोटे से बगीचे मे बेंच पर जाती है वो बगीचा उसके घर से कुछ दुरी पर था वह देखती है कि उस बेंच पर कोई लड़का अपना फोन देख रहा था। सृष्टि को समझ नहीं आता है कि वो कौन है तभी वहाँ कि लाइट चल पडती है और उस उजाले मे उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था उसे देख सृष्टि के होस उड़ जाते है वो वही लड़का था जो उसे एक दिन पहले मंदिर मे मिला था। उसे देखते ही उसने सोचा ये यहाँ क्या कर रहा है और इतनी रात मे अकेले यहाँ क्यों बैठा है इसका घर परिवार नहीं है क्या? और इसे तो मैंने रिजेक्ट कर दिया था फिर ये मुझे वापिस क्यों दिखा। कही उस ओरत कि बात सच तो नहीं होंगी। चलो छोड़ो रे! जहाँ से आया होगा, चला जायेगा, मै मिलूंगी ही नहीं उससे। ऐसा सोच कर वो सोने के लिए चली जाती है।
अगली सुबह फिर वही दिनचर्या - आदी को स्कूल के लिए तैयार करना ओर उसे स्कूल छोड़ने जाना फिर वहा से घर आकर कॉलेज के लिए निकलना। वो अपनी स्कूटी लेकर घर से निकलती है कुछ दूर जाने पर वो देखती है कि कोई उसके आगे बाइक चल रहा था उसे देख उसने सोचा कि ये कही देखा देखा लग रहा है आगे कुछ दुरी पर एक चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल को देख कर गाड़ी रूकती है दोनों वहाँ ही रूकते है तभी अचानक से सृष्टि कि नजर उसके आगे वाले लड़के पर पड़ती है उसके हाथ मे एक चांदी का ब्रेसलेट था वो साँप कि आकृति का बना हुआ था उसे देखते ही उसके मुँह से एक ही बात निकलती है - ध्रुव........। वो जल्दी मौका मिलते ही आगे जाकर उसका चेहरा देखने कि कोशिश करती है और वो देखती है कि वो वही लड़का है जो उसे मंदिर मे और बगीचे मे दिखा था। उसने बिना कुछ सोचे समझे आगे निकल गयी और कुछ दुरी पर उनका रास्ता चेंज हो गया, वो कॉलेज गयी जहाँ पुरे दिन डिस्टर्ब थी और वहां से होटल पर जाती है। वहा जाकर देखा कि वेद ने वेटर कि ड्रेस पहनी हुई है और कस्टमर्स के आर्डर ले रहा था और शर्म कैसे मारे अपनी नज़रे झुका रखी है कल उसके दोस्तों के साथ कि गयी घटना के कारण उसके पिताजी मे उसे सजा दी थी जैसे ही उसकी नज़र दरवाजे पर गयी मुझे वहाँ खड़ा देख उसके चेहरे के भाव ही बदल गए मुझे गुस्से से देखने लगा। मैंने नज़रे चुरा कर अपना रास्ता बदला और अंदर चली गयी जैसे ही मैं अपनी ड्रेस चेंज करके बाहर आयी वेद मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और डायरी मुझे थामते हुई कहा आज सारा आर्डर तू लेगी और मेरा सारा काम तू करेगी और इसके बारे मे पापा को कुछ कहा ना तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा। इतना बोल कर वो चला गया।
समय के 7 बज चुके है और बस थोड़ी देर ओर फिर मै अपने घर चली जाउंगी आज बहुत थक चुकी हुँ या फिर आज मेरा काम मे मन नहीं है ऐसा सोच ही रही थी कि सामने दरवाजे से ध्रुव को अंदर आते हुई देखा, उसके आते ही सब कि नज़र उस पर चली गयी लड़के हो या लड़किया सब उसे ही देख रहे थे उसका चाल - ढाल, हाईट, स्किन -कलर, सब एक दम परफेक्ट था। वो सीधा जाकर कार्नर कि टेबल पर जाकर बैठ गया और वेटर का इंतज़ार करने लगा। कही उसकी नज़र मुझ पर पड़े उससे पहले ही मै वहां से जाने लगी तभी वेद मेरे आगे आके खड़ा हो गया और कहा - जाके उसका आर्डर लेकर आओ। मैंने घबराते हुई कहा - मै कैसे ले सकती हुँ?? फिर अपनी बात संभालते हुई कहा कि - मेरा मतलब है कि शेफ ने किसी काम से मुझे जल्द बुलाया है मेरा वहां जाना जरूरी है।
वेद - ये मुझे नहीं पता, लेकिन आर्डर तुझे ही लाना है
- पर मै नहीं जा सकती।
- जाना तो पड़ेगा, मेरा कहा तो तुझे मानना पड़ेगा वरना ज़ब तक आज ये रेस्टोरेंट बंद नहीं होगा तब तक तुझे यही रहना पड़ेगा।
- ठीक है, मै जाती हुँ।
मै उसकी ओर अपने कदम बढ़ा रही थी और मन मे एक अजीब से कसमकश है मेरे दिमाग़ मे ये ही घूम रहा है कि अगर उसने मेरी आवाज़ पहचान ली तो फिर क्या होगा और उसके साथ ही उसकी वो फ़ोन पर प्यार-भरी आवाज़ मे एक शब्द गूंज रहा है कि - हेलो.............।
क्रमशः ........