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@aakankshawords
(654)

मिथिला की पावन धरती पर,
ज्ञान-सुधा की धारा थी,
जनक, गार्गी, याज्ञवल्क्य की,
जिससे जग में कारा थी।

उसी धरा के गौरव गायक,
दिनकर जग में नाम हुए,
ओज, तेज, राष्ट्रभाव लिए,
जन-जन के अभिराम हुए।

हिन्दी का वह सूर्य प्रखर था,
जिसने युग को राह दी,
रश्मिरथी की ज्योति जलाकर,
जन-मन को परवाह दी।

कुरुक्षेत्र की वाणी बनकर,
अन्यायों से लड़ा सदा,
परशुराम की प्रतीक्षा में,
जागा उसका स्वाभिमान बड़ा।

किन्तु पूछो उस दिनकर से,
जिस पर सारा देश मुग्ध था,
कौन कवि था उसके मन में,
जिसका काव्य अनिर्वचनीय सुधा था?

उत्तर मिलता है विद्यापति,
मिथिला के मधुर गायक थे,
जिनके गीतों में प्रेम-सरसता,
भक्ति-सुधा के सायक थे।

शब्दों में संगीत बसा था,
भावों में मधुमास खिला,
उनकी वाणी सुनकर जैसे,
मन में प्रेम-वृन्दावन मिला।

दिनकर बोले—"गीत तुम्हारे,
हृदय-तल को छू जाते हैं,
ओज जहाँ मेरा पथ है तो,
तुम माधुर्य सिखाते हो।"

एक ओर था वीर गर्जन,
दूजी ओर मधुरिम तान,
एक सूर्य था राष्ट्रभाव का,
एक चन्द्र था रस की खान।

मैथिली की गौरव-गाथा को,
दिनकर ने सम्मान दिया,
उसकी प्राचीन परम्पराओं को,
भारत का अभिमान कहा।

विद्यापति ने भाषा को दी,
काव्य-गगन की ऊँचाई,
दिनकर ने हिन्दी को देकर,
राष्ट्र-जागरण की तरुणाई।

दो युग, दो स्वर, दो व्यक्तित्व,
फिर भी एक प्रवाह रहे,
मिथिला की सांस्कृतिक धारा के,
दो उज्ज्वल इतिहास रहे।

महान वही जो पूर्वज कवियों,
का सम्मान निभाता है,
दिनकर की विनम्रता में भी,
उनका गौरव झलकाता है।

आज भी जब दिनकर गूँजें,
स्मरण विद्यापति आते हैं,
साहित्यिक ज्योति की लौ बन,
पीढ़ी-पीढ़ी जगमगाते हैं।

हिन्दी में यदि दिनकर सूर्य हैं,
राष्ट्र-चेतना के महान,
तो मैथिली के चन्द्र विद्यापति,
माधुर्य-संगीत की पहचान।

दोनों की यह संयुक्त धरोहर,
भारत का अनुपम धन है,
जब तक जीवित भाषा-संस्कृति,
तब तक उनका वंदन है।

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जब-जब शाम गोमती के जल में उतरती है,
लखनऊ की रूह धीरे-धीरे निखरती है।
हवा में घुली तहज़ीब कानों को छू जाती,
हर गली मोहब्बत की खुशबू-सी दे जाती।
रूमी दरवाज़ा जैसे बाँहें फैलाए खड़ा,
इतिहास की यादों को सीने में लिए बड़ा।
इमामबाड़ों की दीवारें चुपचाप ये कहतीं,
यहाँ की मिट्टी में सदियों की दास्ताँ रहती।
हज़रतगंज की शामें जैसे दुल्हन सजती हैं,
रोशनियों की चूड़ियाँ सड़कों पर बजती हैं।
चौक की पुरानी गलियाँ दिल को बुलाती हैं,
हर मोड़ पे बीती यादें चुपके मुस्काती हैं।
“पहले आप” यहाँ सिर्फ़ बोली नहीं लगती,
ये तो लखनऊ वालों की धड़कन-सी लगती।
छोटी-सी बातों में इतना प्यार मिलता है,
अजनबी चेहरों में भी अपना यार मिलता है।
टुंडे की खुशबू जब हवाओं में बहती है,
भूख नहीं, बस दिल की चाहत जागती रहती है।
कुल्हड़ वाली चाय में जो अपनापन मिलता,
वैसा स्वाद दुनिया के शहरों में कहाँ खिलता।
गोमती किनारे बैठो, रात गुनगुनाती है,
चाँदनी भी जैसे कोई ग़ज़ल सुनाती है।
लखनऊ को लिखना आसान कहाँ होता है,
ये शहर नहीं… दिल का सबसे हसीन हिस्सा होता है।

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तुम्हें खोने का ख्याल
मेरी रूह तक हिला देता है,
जैसे कोई हँसता हुआ चेहरा
अचानक रोना सीख लेता है।
तुम्हारी आदत ऐसी लगी है
कि अब खुद से भी डर लगता है,
तुम बिन ये दिल
भीड़ में भी अकेला लगता है।
जो हर रात मेरी थकी आँखों को
प्यार से नींद पहनाता है,
मेरे हर टूटे लफ्ज़ को
अपना कहकर अपनाता है।
कल अगर वही हाथ
किसी और का हाथ थामेंगे,
क्या मेरी उंगलियों की कमी
उन्हें कभी महसूस भी होगी?
क्या वो रातें, वो बातें,
वो मेरी बेवजह की जिद,
तुम्हारे नए रिश्तों के बीच
कहीं धीरे-धीरे मर जाएँगी?
मैं सोचती हूँ —
जब तुम्हारे घर में किसी और के नाम की
हँसी गूँजेगी,
तब क्या मेरी याद
तुम्हारे दिल में चुपचाप रोएगी?
या फिर सच में
मोहब्बतें बदल जाती हैं,
लोग नए रिश्तों में
पुराने एहसास भूल जाते हैं।
पर मेरा इश्क़ ऐसा नहीं है…
मैं तुम्हें कल के डर से भी
आज कम नहीं चाह सकती,
क्योंकि तुमसे मोहब्बत
मेरी आदत नहीं, मेरी इबादत है।
और शायद इसी लिए
तुम्हें किसी और के साथ सोचकर
मेरी पूरी दुनिया
अंदर ही अंदर टूट जाती है।

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मेरे सामने ही वो किसी और में खोया रहा,
मैं खामोश थी मगर दिल अंदर से रोता रहा…
उसे क्या पता मेरी नजरें क्या पूछ रही थीं,
वो बेखबर था, और मेरा भरोसा टूटता रहा…” 💔

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नारी को पहले इतना समझा नहीं गया,
उसे बस घर तक ही रखा गया।
पर अब धीरे-धीरे समय बदल रहा है,
और नारी भी आगे बढ़ रहा है।
वो पढ़ना चाहती है, कुछ बनना चाहती है,
अपने दम पर खुद को पहचानना चाहती है।
अब वो सिर्फ घर तक सीमित नहीं है,
उसके सपनों का भी कोई अंत नहीं है।
हर काम में वो अपना हाथ बढ़ाती है,
मुश्किलों से भी नहीं घबराती है।
अगर उसे मौका और साथ मिले,
तो वो हर मंजिल पा सकती है।
कभी वो माँ बनकर सब संभालती है,
कभी बेटी बनकर घर सजाती है,
कभी बहन बनकर साथ निभाती है,
हर रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाती है।
आज वो स्कूल भी जाती है,
अपने सपनों को सजाती है,
कल वही आगे बढ़कर
देश का नाम भी रोशन करती है।
उसे बस थोड़ा सा भरोसा चाहिए,
और आगे बढ़ने का मौका चाहिए,
फिर देखना वो कैसे
हर मुश्किल को आसान बना देती है।
अब नारी चुप नहीं रहती,
वो अपने हक के लिए बोलती है,
गलत को गलत कहने की
हिम्मत भी अब रखती है।
नारी जब आगे बढ़ेगी,
तभी तो देश भी आगे बढ़ेगा।
उसकी मेहनत और हिम्मत से ही
भारत सच में समृद्ध बनेगा।
नारी है तो हर सपना साकार है,
उसी से हर घर-आंगन में प्यार है,
उसका सम्मान ही सबसे बड़ा धन है,
इसी से मजबूत अपना हिंदुस्तान है।

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“मैं अभी भी खड़ी हूँ”
मैं हारकर भी हर बार,
खुद को समझा लेती हूँ,
दिल टूटता है रोज़ थोड़ा,
फिर भी मुस्कुरा देती हूँ।
कभी ख्वाब थे BHU के,
कभी DU की राहें थीं,
अब नंबरों के जंगल में,
बस उम्मीदें ही बाहें थीं।
वो जो कहते थे “छोड़ दो”,
मैं खुद को ही पकड़ लेती हूँ,
ना जाने क्यों हर बार,
मैं ही पहले call कर देती हूँ।
कमज़ोर नहीं हूँ मैं,
बस दिल थोड़ा सच्चा है,
जो चला गया, वो मेरा नहीं,
ये समझना अभी कच्चा है।
डर भी है, confusion भी,
और आँखों में सवाल बहुत,
पर अंदर कहीं एक आवाज़ है—
“तू कर सकती है, बस रुक मत।”
अगर ना मिला वो जो चाहा,
तो इसका मतलब खत्म नहीं,
रास्ते बदल सकते हैं,
पर मंज़िल का कोई अंत नहीं।
मैं टूटी हूँ, ये सच है,
पर खत्म नहीं कहानी,
मैं फिर से उठूँगी एक दिन—
और यही होगी मेरी असली जीत की निशानी।

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“रिश्ता खत्म करने की हिम्मत तो कर ली मैंने,
पर खुद से लड़ना अभी बाकी है।
हर बार ठान लेती हूँ कि अब नहीं करूंगी call,
फिर जाने क्यों उंगलियाँ वही नंबर मिलाती हैं।
शायद उसे नहीं… उस आदत को छोड़ना मुश्किल है,
जो हर रोज़ मेरी जिंदगी का हिस्सा थी।
पर इस बार खुद से वादा किया है,
चाहे दिल कितना भी माने… मैं नहीं मानूँगी।”

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143 कोई अंत नहीं, एक शुरुआत की बात है,
ये वो मोड़ है जहाँ मेहनत फिर से साथ है।
थोड़ा सा कम लग सकता है ये आंकड़ा,
पर सपनों से बड़ा कभी कोई ना हिसाब है।
डीयू की गलियों में उम्मीदें चलती हैं,
हर कोशिश के पीछे नई रौशनी पलती है।
कभी कटऑफ ऊपर, कभी नीचे झुकता है,
पर मेहनत करने वाला कभी नहीं रुकता है।
जो आज रह गया थोड़ा सा पीछे कहीं,
वो कल सबसे आगे भी हो सकता वहीं।
बस खुद पर भरोसा बनाए रखना तुम,
क्योंकि कोशिशों की हार नहीं होती कभी।

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सच्चा मित्र
तुम नमक नहीं, चंदन हो,
मेरे जीवन का मधुर स्पंदन हो।
जब-जब मन में पीड़ा आती है,
तुम्हारी बातों से ठंडक छा जाती है।
दुनिया अक्सर घाव बढ़ा देती है,
दर्द पर नमक छिड़क जाती है।
पर तुम चंदन बनकर आते हो,
हर पीड़ा को शीतल कर जाते हो।
जब राहें धुंधली हो जाती हैं,
और उम्मीदें भी सो जाती हैं,
तब तुम दीपक बनकर जलते हो,
अंधेरों में रास्ता दिखाते हो।
सच्चा मित्र वही कहलाता है,
जो हर दुख में साथ निभाता है।
जो गिरने पर हाथ बढ़ाता है,
और हिम्मत भी दे जाता है।
तुम नमक नहीं, चंदन हो,
जीवन का सुंदर बंधन हो।
घावों को भरने के साथ-साथ,
मन को शीतल करने का कारण हो। 🌸

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हर सुबह की तरह सूरज वही था,हवा भी वही थी, आसमान भी वही था,पर पंछी आज कुछ उदास थे,क्योंकि एक बेटी का सपना आज टूटने वाला था।

पापा की इज्जत रखने कोउसने हाथों में मेहंदी सजा ली,जिस बाप ने उम्र भर जोड़ा खजाना,वो भी बेटी के ब्याह में लुटा दी।

सोचा था खुशियों का घर मिलेगा,कोई हमसफर साथ निभाएगा,पर किस्मत ने ऐसा मोड़ दियाजहाँ हर दिन दर्द ही आएगा।

पहला थप्पड़ पड़ा तो चुप रह गई,सोचा गुस्से में होगा, मान लिया,धीरे-धीरे वो जुल्म बढ़ता गयाऔर उसने सब कुछ सहना जान लिया।

दुल्हन बनने का शौक था उसका,पर पल भर में सब बिखर गया,जिसे हमसफर कहने चली थी,वही उसका सबसे बड़ा दर्द बन गया।

यकीन मानो, हर चुना हुआ रिश्ताहमेशा खुशियाँ नहीं लाता,कभी-कभी माँ-बाप का भरोसा भीबेटी की खामोशी में दर्द बन जाता।

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