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सत्य का उद्घोष: निर्भय वाणी ( कविता ) © _कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि_ सत्य कहो, पर डरो नहीं तुम, अभि कायरता में मरो नहीं तुम। भीतर की उस दिव्य ज्योति को, मौन की ओट से हरो नहीं तुम। सत्य सूर्य है, प्रखर, तपस्वी, अंधकार का काल बड़ा है। झूठ भले ही स्वर्ण जड़ित हो, अंततः वो जंजाल बड़ा है जब अंतस में द्वंद्व मचा हो, भय के बादल छाए हों। जब स्वार्थों की बेड़ियाँ पैरों, में अपनी जकड़न लाए हों। तब याद करो उस निज शक्ति को, जो सत्य मार्ग दिखलाती है। डर की छोटी दीवारों को, क्षण भर में ढहलाती है। सत्य बोलना कठिन तपस्या, वीरों का यह आभूषण है। असत्य तो है मलिन वासना, आत्मा का ये प्रदूषण है। भय कहता है—'मौन रहो तुम', हित अपना पहचानो तुम। पर आत्मा कहती—'अटल रहो', सत्य को ही ईश्वर मानो तुम। क्या डरना उन तुच्छ शक्ति से, जो नश्वर और क्षणभंगुर हैं? सत्य के सम्मुख झुक जाते वे, जो अहंकारी और क्रूरक हैं। इतिहास गवाह है उन लोगों का, जो फाँसी पर भी मुस्काए थे। सत्य की खातिर हलाहल पीकर, लोक अमृत्व में आए थे हरिश्चंद्र की निष्ठा देखो, प्रहलाद का विश्वास पढ़ो। सत्य की ऊँची मीनारों पर, निडर भाव से आज चढ़ो। वाणी में हो धार सत्य की, अभि आँखों में हो तेज नया। डर के साये छँट जाएँगे, जब जागेगा विवेक नया। © _कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि_
*रात - दिन और सुकून* _© अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'_ ऐ मालिक, अभि न ऐसी रात दे जिसका कभी सवेरा न हो, ॲंधेरा भी ज़रूरी हैं, उजाले की क़दर के लिए। न ऐसी सुबह दे जिसकी कभी रात ही न आए, थकान न हो तो सुकून का मतलब क्या बचे। ख़ुशियाँ भी अगर बिना विराम मिलें, तो दिल उन्हें पहचानना भूल जाता है। बस इतनी सी दुआ है रात भी मिले, सुबह भी आए, इनके बीच जीने का हुनर भी आए..... ✍️अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'.....✍️
अब एकांत ही मेरा सुफर है......
परिवर्तन ख़ुद से शुरू होता है....
शिवशक्ति:— तपस्या से प्रेम तक.....
मनुष्यता ही परम धर्म है ( कविता ) रचनाकार/ कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि' ॥ मनुष्यता का अभ्युदय ॥ न पंथ श्रेष्ठ है, न मत विशिष्ट है, मानवता ही इस जग में परम इष्ट है। अहंकार का त्याग कर, जो पर-हित में संलग्र है, वही मनुज चैतन्य है, वही ज्ञान में मग्र है। हृदय-सिंधु में जिसके, करुणा का नव ज्वार हो, पर-दु:ख देख जो द्रवित हो, ऐसा ही आचार हो। जाति-पांति के दुर्ग तोड़, जो समरसता को धारे, वही सत्य का पुत्र है, जो गिरते को सदा उबारे। रक्त वर्ण सबका एक , एक ही प्राण-स्पंदन, भेदभाव की राख तज, करें मानवता का वंदन। परोपकार की वेदी पर, जो निज स्वार्थ देता आहुति, वही देवत्व को प्राप्त है, वही विश्व की पावन विभूति। शस्त्रों में न शक्ति है, न है शास्त्रों के पांडित्य में, ईश्वर का वास निहित है, बस मनुष्य के सामिप्य में। अतः जाग रे आत्मन्! तू निज धर्म को पहचान कभी मानव होकर मानव की, सेवा को ही निज मान अभि। जहाँ संवेदना शून्य हो, वह देह मात्र पाषाण है, मुरझाए अधरों पर मुस्कान दे, वही पुण्य प्रमाण है। पर-पीड़ा की अग्नि में, जिसका अंतर्मन तपता है, मन्दिर के घंटों से अधिक, उसका मौन प्रार्थना तपता है। न स्वर्ण की आभा महान है, न किरीटों का सम्मान है, जो दीन के अश्रु पोंछ सके, वही पुरुष शक्तिमान है। विघटित होते इस विश्व में, प्रेम ही एकमात्र सेतु है, जीना वही सार्थक है, जो जिया जाए पर-हेतु है। न संकुचित सीमाओं में, सत्य का विस्तार होता है, वही मस्तक वंदनीय है, जिसमें परोपकार होता है। क्या हुआ यदि हस्त रेखाएँ, वैभव को न छू सकीं? अभि हृदय में दया शेष है, तो कोई कमी न रह सकीं। जो स्वयंभू के द्वार पर, केवल स्वयं को माँगता, वह मनुष्यता के मर्म को, तिल मात्र भी न जानता। अश्रु किसी के नयन से, यदि धरा पर गिरते हों कहीं और शब्द सांत्वना के, मरहम बनकर खिलते हों कहीं तो समझ लेना कि तूने, पा लिया निर्वाण यहॉं यही मानव-धर्म का, सबसे प्रखर प्रमाण यहॉं अंधकार को कोसने से, ज्योति न प्रज्वलित होगी कभी एक दीप जो तू जला दे, सृष्टि फिर संकलित होगी अभि रचनाकार/ कवि:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
भूख ने इंसान को क्या से क्या बना दिया कहीं देवता बनाया कहीं ख़ुदा बना दिया
ख़ामोशी की ताक़त ( ग़ज़ल:-१ ) कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि' शोर-ओ-गुल में कहाँ मिलती है सदा सच्चाई की, मैंने सीखी है हुकूमत इसी तन्हाई की। वो जो कहते हैं कि लफ़्ज़ों में है ताक़त सारी, उनको क्या इल्म कि क्या ज़द है इस दानाई की। लब कुशा होने से अक्सर ही बिगड़ती है बात, चुप ने रखी है हमेशा ही भरम गहराई की। ज़ुल्म सहकर जो न बोले वो बुज़दिली है मग़र, सब्र की चुप ही इबादत है मसीहाई की। शोर से टूट के गिर जाते हैं महलों के ग़ुरूर, ख़ामोशी नींव हुआ करती है परछाई की। ज़िन्दगी! तूने सिखाया है सलीका 'अभि' को, गुफ्तगू अब तो ज़रूरत नहीं रहनुमाई की। जो न समझे वो इबारत ही अधूरी जानो, चुप ही व्याख्या है मेरे दिल की पज़ीराई की। तंज की धार से घायल नहीं होता है अभि, मार है सबसे कड़ी चुप की और रुसवाई की। बातों-बातों में छलक जाते हैं खाली बर्तन यहॉं गंभीरता ही निशानी है ज़र्फ़-ओ-इलाही की। जिसने सन्नाटे के मफ़हूम को समझ लिया, जीत पक्की है उसी शख़्स की, उसी राही की। वक़्त बोलेगा गवाही में तुम्हारी 'अभि', तुम बस आदत न छोड़ना अपनी शकीबाई की। कवि / शायर :- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'
हम कभी ख़ास थे , अभि ये उनके अल्फ़ाज़ थे....💔 - Abhishek Chaturvedi
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