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नैनन कजरा , सिर पर अचरा , दीपक की लौ से चमके चेहरा। करे कामना, सुखी घर-अंगना , खुशहाल रहे ,प्रीत रंग हो गहरा। डाॅ अमृता शुक्ला
ऊँची -ऊँची इमारतों से ढका शहर। चाँद छुपा रहता ,सूरज दिखे किधर। न हवाएँ गुज़रती हैं ,न,धूप आती है, झरोखे बंद है ,लोग हैं घरों के भीतर। वाहनों की भीड़ , बेतहाशा शोर समेटे, गुम हरियाली में बसी जीवन की डगर । अमृता शुक्ला
तुमसे जिस दिन से रिश्ता जोड़ा है। लगता है मिलने का समय थोड़ा है। तुम्हारे करीब के लिए पीछे आया हूँ। किस तरह दिल को संभाल पाया हूँ। आज जब सामने आ गया है चेहरा । बात करेंगें तुमसे ,लग जाय पहरा । अमृता शुक्ला
यमुना धीरे बह रही , कदंब खड़ा उदास । राधा को याद हो आई,मोहन खेलते रास बंसी की मीठी धुन गूॅंजती धरती आकाश । माखनचोर बसे हैं ज्यों पुहपुन में बास नदिया तट पर गुमसुम बैठे शाम घिर आई। अब जल्दी से दर्शन दे दो मेरे कृष्ण कन्हाई। तुम बिन चैन नहीं एक पल, जबसे प्रीत लगाई। जल में खुद को देखूं तो दिखे तुम्हारी परछाईं। डॉ अमृता शुक्ला
सर्द मौसम में जब कोहरे की पर्त जमती है। सारी कायनात को वो आगोश में भरती है। चलती हवा ठंडक का एहसास करा जाती है, उस वक्त तेरे साथ न होने की कमी खलती है। डॉ अमृता शुक्ला
#Painदर्द दर्द को दर्द से मिटा रहे हैं वो जिदंगी को मौत बना रहे हैं वो ज़माने को कदमों में झुकाए रहते हैं मासूम फूलो को मुरझा रहे हैं वो। डॉअमृता शुक्ला
#जीवन के बिखरे ताने -बाने में, हँसने और रोने के फ़साने में, समय कैसे गुज़रता जाता है, महीने,सालों के आने जाने में। कितने रिश्ते बिछड़ते ,टूटते होते थे अपने ,जुड़ते अन्जाने में। हमने जिनको प्रेम से सींचा था , उन्हें परवाह नहीं पास आने में। अब तो अकेले ही बसर करूं मैं, बुनकर करखे के चलते जाने में । डाॅ अमृता शुक्ला
पंछी 1_मैं और तुम एक पंछी सुंदर । उड़ते फिरते हम डाल-डाल पर । सुन सखी एक बात है कहना। बहुत ध्यान से सब कुछ सुनना। पेड़ की छांव का कहाँ ठिकाना। मिले नहीं ठीक से पानी -दाना। जल थल नभ में हुआ प्रदूषण , दूभर हो गया है सबका जीवन । मानव अभी यदि समझ जाए, प्रकृति खुश हो ,हम भी मुस्काएं। डॉअमृता शुक्ला
#Falgun पिचकारी में चाह समेटे,प्रेम अबीर हथेली में। फागुन ने रंग बिखराए ,पी मिल जाए होली में। गलियाँ फागो से गूँजे है,ढोल मंजीरे की है धुन, भरी भीड़ में खुद को ढूँढे ,मन में होने लगी चुभन। कोई तो ऐसा आ जाए जो पी को लाए होली में। फागुन ने रंग बिखराए, पी मिल जाए होली में। सखी बोली-सब रंग रंगे हैं,पी कैसे पहचानेगी, कहा-ह्रदय के तार जुड़े हैं,देर सामने आने की। देख तभी कहीं अचानक बाँह पकड़ ली होली में फागुन ने रंग बिखराए, पी मिल पाए होली में। डॉअमृता शुक्ला
आज कलम ,कागज ,दवात चुप हैं। तुम्हारे बिना सारे ज़ज़्बात चुप हैं। लिखना बहुत है,पर लिख नहीं पाते , तन्हाई में लगे सारी कायनात चुप है। डॉअमृता शुक्ला
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