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अगर लेखक इमोशंस और भावनाएँ नहीं लिखते… अगर कवि अपने शब्दों में आग नहीं भरते… तो सच कह रही हूँ — आज जो समाज में थोड़ा-बहुत बदलाव दिख रहा है, वो बदलाव कभी नहीं आता। तब सोच नहीं बदलती, सिर्फ़ समय बदलता… और स्त्रियाँ आज भी उन्हीं पुरानी बेड़ियों में जी रही होतीं। जो स्त्रियाँ आवाज़ उठातीं भी, उनकी आवाज़ दबी रह जाती… चार दीवारों में घुट जाती, भीड़ में खो जाती। लेकिन लेखक आए… कवियों ने लिखा… कहानियों ने सवाल खड़े किए… टीवी, किताबें, मंच और आज की इंस्टा रील्स ने दुनिया को सोचने पर मजबूर किया। इन्हीं शब्दों ने स्त्री के संघर्ष को कमज़ोरी नहीं, ताक़त बनाया। इन्हीं कलमों ने चुप्पी को आवाज़ दी। इसलिए — सलाम उन लेखकों को ✍️ सलाम उन कवियों को ✨ जिन्होंने स्त्री समाज को सिर्फ़ सहना नहीं, - archana
मैंने प्रेम को पूजा समझा… उन्होंने खेल बना दिया, मैंने समर्पण को जीवन समझा… उन्होंने बोझ बना दिया, कसूर मेरा बस इतना था कि सच्चा रहा, और उन्होंने सच्चे दिल को भी गुनाह बना दिया… अगर चाहो तो मैं इसे - archana
मैंने दो तरह की स्त्रियाँ देखी हैं… एक तरफ वो… जो दुखी है, इज़्ज़त नहीं मिली, फिर भी संतुष्ट है, क्योंकि उसने दर्द के साथ जीना सीख लिया है… और दूसरी तरफ वो… जिसके पास सोना-चांदी, पैसा, शान-शौकत सब है, फिर भी मन खाली है, क्योंकि संतोष चीज़ों से नहीं, एहसासों से मिलता है…
मां, नए साल में एक ही फरियाद है… मुझे नहीं पता तू पत्थर की मूर्ति में है या मंदिरों में बसती है, मैं तो तुझे अपने दर्द, अपने आंसुओं और अपने टूटे हुए हौसलों में महसूस करती हूं। बस शिकायत इतनी है कि जो मुझे हर बार तोड़ना चाहते हैं, मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, मेरी इज्ज़त को तमाशा बनाते हैं, मां… तू ही उन्हें जवाब दे। ऐसा जवाब दे कि उनके अहंकार को सच का तमाचा लगे… ताकि उन्हें समझ आए कि तेरी बेटी कमजोर नहीं है, टूटी नहीं है। वरना लोग फिर जीत जाएंगे, फिर हंसेंगे, फिर मुझे बदनाम करेंगे… मां, तू बस इतना कर… मेरी खामोशी की लड़ाई तू अपने न्याय से पूरी कर दे। यकीन बस तुझ पर है।🥹
मुझ पर हंसने वालों को, अब तुम ही जवाब देना मां… ताकि मैं गर्व से, सिर ऊँचा कर उठा कर चल सकूं। 🙏✨
नया साल उनको भी मुबारक, जो हमारे बारे में ज़हर उगलते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हर पल हमें गिरता हुआ देखना चाहते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमारी मुस्कान से जल उठते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो सामने खामोश और पीछे वार करते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमारी तरक्की देखना गँवारा नहीं करते। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमारे रिश्ते की मजबूती से डरते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हम दोनों पति-पत्नी को खुश पसंद नहीं करते हैं नया साल उनको भी मुबारक, जो हमारी राहों में काँटे बिछाते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमें दिमाग से पैदल समझते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो खुद रास्ता भटक कर हमें कमज़ोर कहते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमें बिल्कुल मूर्ख समझते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमें किसी काम का नहीं समझते हैं। नया साल उनको भी मुबारक, जो हमें कुछ नहीं… मगर खुद को सबकुछ समझते हैं। और… नया साल उनको भी मुबारक, क्योंकि हम हर साल टूटते नहीं — और ज्यादा चमकते हैं ✨
मुझसे हर वक़्त औरों की तुलना की गई, मेरी मेहनत, मेरी नीयत भी तौली गई। छोटी-छोटी बातों पर हंसी उड़ाई गई, मेरी सादगी, मेरी सच्चाई भी कहानी बना दी गई। रंग-रूप पर तंज, हर कदम पर ताना, मेरी ईमानदारी को भी बना दिया बहाना। कहा—“इतना अच्छा कोई होता नहीं, ये तो दिखावा है”, सचाई को ढोंग कहा, यही उनका नया नकाब है। पर सुन लो दुनिया— मैं न टूटी हूँ, न झूठ का हिस्सा बनी हूँ, मैं अपनी सच्चाई पर आज भी उतनी ही ठहरी हूँ। जो सच्चे होते हैं, वही ज्यादा चोट खाते हैं, पर वही इतिहास में खुद को सच्चा साबित कर जाते हैं। कल जो हंसे थे, एक दिन शर्माएंगे, मेरी सच्चाई को समझकर सिर झुकाएंगे। मैं वही रहूँगी—सीधी, सच्ची, साफ़, और यही मेरी सबसे बड़ी ताकत का इख़्तियार। ✨
सोचा था रोएँगे हम कंधे पर उसके सिर रखकर,उसने हमारे आँसुओं फ़ायदा उठाया ,शातिर बनकर खूब दिल दुखाया उसने,खूब मजे लेकर।
अभी भी समय है, सुधर जाओ हिंदुओं, वरना कहर बनकर दस्तक देगा भविष्य। आज जो बांग्लादेश में जल रही आग है, कल वही सीमा लांघकर आएगी—निर्दय, निष्ठुर। एक-एक करके मरता जाएगा हिंदू, और हम कहते रहेंगे— “मैं बड़ा, तू छोटा, मेरी जात ऊँची, तेरी नीची।” अहम के सिंहासन पर बैठे हम, एकता को ठुकराते रहे, जात-पात की ज़ंजीरों में जकड़े रहे, और दुश्मन हमें गिन-गिनकर काटते रहे। दुश्मन ने कभी नहीं पूछा तुम कौन सी जात के हो, बस इतना देखा— तुम हिंदू हो… और बस वही काफ़ी था। तुम बने रहे “मैं” की भावना में, “तू” और “वो” करते रहे, और इसी बँटवारे की आग में अपने ही लोग जलते रहे। अगर अब भी नहीं जागे, तो इतिहास यही लिखेगा— हिंदू मारा गया हथियारों से नहीं, बल्कि अपने ही अहंकार से। अभी भी समय है— जात नहीं, एकता चुनो। मैं नहीं, हम बनो। वरना याद रखना— बँटा हुआ हिंदू, हमेशा अकेला मरता है।
पीठ पीछे खंजर घोंपते हैं, अकसर वही अपने ही लोग होते हैं। सामने हंसते हैं, कहते हैं हमारा भला चाहते हैं, और दुनिया के सामने सिर्फ बड़े भले बनते हैं। दिल तोड़ते हैं, दिखावे में रखते हैं प्यार, इन्हीं चेहरे के पीछे छुपा होता है हजारों वार। सच यही है, सबसे खतरनाक वही होते हैं, जिन्हें हम अपना समझते हैं।
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