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ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

@brhamduttatyagityagi7880


22 अगस्त गणेश जी का आगमन हो रहा है इस दिन पुरे देश
में
धूमधाम से गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी।
सभी श्री गणेश भक्तों को जय श्री गणेशाय नमः जय श्री
गणेशाय नमः कल 22 अगस्त को गणेश चतुर्थी की पावन
एवं मंगल बेला पर आप सभी भक्तों का हार्दिक स्वागत एवं
अभिनंदन है ब्रह्मदत्त त्यागी
गणेश चतुर्थी मोदक से करें श्री गणेश जी को खुश

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#भोळेभोले भाले चेहरों को देखकर अक्सर गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं.......
हम सोचते हैं उनको अच्छा पर उनकी नियत कुछ और दिखाती है......
इसलिए भोले भाले चेहरे की असलियत नहीं खुल पाती है.....
उनके मन और दिल में क्या है? यह बात प्रश्न चिन्ह बन जाती है......
उसके दिल में क्या है? उसके लबों पर क्या है,? यह बात समझ नहीं आती है.....
धोखे इतने दिए हैं इन भोले से चेहरों ने, यहां विश्वास की नैया से डूबती नजर आती है......
भोले भाले चेहरे पर अचानक यकीन करने की गुंजाइश खत्म हो जाती है......
हम चाहते हैं कुछ और और उनकी चाहत कुछ और दिखाती है......
हम समझते हैं भोले चेहरे को अपना हमदर्द और हमराही पर जब हकीकत का पता लगता है तो पैरों तले की जमीन खिसक जाती है...... तब जाकर उन भोले भाले चेहरों की
सच्चाई नजर आती है...... ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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शुभ प्रभात शुक्रवार वैसे तो शुक्रवार का दिन सभी माताओं को समर्पित है जैसे मां दुर्गा मां लक्ष्मी मां सरस्वती और दुर्गा पौत्री मां संतोषी आज आपको मां संतोषी की कथा से अवगत कराया जा रहा है, ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ के द्वारा शुभ प्रभात, सुबह सुप्रभातम्
शुक्रवार
व्रत कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक बुढि़या के सात पुत्र थे। उनमें से 6 कमाते थे और एक निकम्मा था। बुढि़या अपने 6 बेटों को प्रेम से खाना खिलाती और सातवें बेटे को बाद में उनकी थाली की बची हुई जूठन खिला दिया करती। सातवें बेटे की पत्नी इस बात से बड़ी दुखी थी क्योंकि वह बहुत भोला था और ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देता था। एक दिन बहू ने जूठा खिलाने की बात अपने पति से कही पति ने सिरदर्द का बहाना कर, रसोई में लेटकर स्वयं सच्चाई देख ली। उसने उसी क्षण दूसरे राज्य जाने का निश्चय किया। जब वह जाने लगा, तो पत्नी ने उसकी निशानी मांगी। पत्नी को अंगूठी देकर वह चल पड़ा। दूसरे राज्य पहुंचते ही उसे एक सेठ की दुकान पर काम मिल गया और जल्दी ही उसने मेहनत से अपनी जगह बना ली। संतोषी माता के मंदिर में जाकर संकल्प लिया|
इधर, बेटे के घर से चले जाने पर सास-ससुर बहू पर अत्याचार करने लगे। घर का सारा काम करवा के उसे लकड़ियां लाने जंगल भेज देते और आने पर भूसे की रोटी और नारियल के खोल में पानी रख देते। इस तरह अपार कष्ट में बहू के दिन कट रहे थे। एक दिन लकडि़यां लाते समय रास्ते में उसने कुछ महिलाओं को संतोषी माता की पूजा करते देखा और पूजा विधि पूछी। उनसे सुने अनुसार बहू ने भी कुछ लकडि़यां बेच दीं और सवा रूपए का गुड़-चना लेकर संतोषी माता के मंदिर में जाकर संकल्प लिया। कपड़ा-गहना लेकर घर चल पड़ा
दो शुक्रवार बीतते ही उसके पति का पता और पैसे दोनों आ गए। बहू ने मंदिर जाकर माता से फरियाद की कि उसके पति को वापस ला दे। उसको वरदान दे माता संतोषी ने स्वप्न में बेटे को दर्शन दिए और बहू का दुखड़ा सुनाया। इसके साथ ही उसके काम को पूरा कर घर जाने का संकल्प कराया। माता के आशीर्वाद से दूसरे दिन ही बेटे का सब लेन-देन का काम-काज निपट गया और वह कपड़ा-गहना लेकर घर चल पड़ा। बेटा अपनी पत्नी को लेकर दूसरे घर में ठाठ से रहने लगा|
वहां बहू रोज लकडि़यां बीनकर माताजी के मंदिर में दर्शन कर अपने सुख-दुख कहा करती थी। एक दिन माता ने उसे ज्ञान दिया कि आज तेरा पति लौटने वाला है। तू नदी किनारे थोड़ी लकडि़यां रख दे और देर से घर जाकर आंगन से ही आवाज लगाना कि सासूमां, लकडि़यां ले लो और भूसे की रोटी दे दो, नारियल के खोल में पानी दे दो। बहू ने ऐसा ही किया। उसने नदी किनारे जो लकडि़यां रखीं, उसे देख बेटे को भूख लगी और वह रोटी बना-खाकर घर चला। घर पर
ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ आप और हम और सभी भक्तों का बारंबार प्रणाम नमन नमस्कार है सभी माताओं को

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नीरू त्यागी जी आपको आपके जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनाएं
आपका यह जन्मदिन आपको नई नई खुशियां नए-नए अवश्य प्राप्त कराएं, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना एवं कामना है ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़ एवं सभी दोस्तों मित्रों साथियों की ईश्वर से, आपको आपके इस जन्म पर्व पर एवं समस्त आपके परिजनों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई जन्म पर्व का यह उल्लास आपके सभी कार्यों को संपूर्ण करें happy birthday to you Neeru Tyagi

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शुभ संध्या एवं रात्रि वंदन जय श्री गणेशाय नमः शुभ रात्रि बुधवार श्री गणेश जी की
आरती ब्रह्मदत्त
गणेश जी की आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महा देवा ।।
एक दन्त दयावंत चार भुजा धारी
माथे सिन्दूर सोहे मूस की सवारी ॥
अन्धन को आँख देत कोदिन को काया
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ।।
हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा
लड्डूअन का भोग लगे संत करे सेवा ।।
दीनन की लाज रखो शम्भू पुत्र वारी
मनोरथ को पूरा करो जाय बलिहारी ।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती पिता महा देवा ।।
प्रस्तुतीकरण..... ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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एक समय किसी नगर में एक बहुत ही धनवान साहुकार रहता था. साहुकार का विवाह नगर की सुन्दर और गुणवंती लड़की से हुआ था. एक बार वो अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन ससुराल गया और पत्नी के माता-पिता से विदा कराने के लिए कहा. माता-पिता बोले- बेटा आज बुधवार है. बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते. लेकिन वह नहीं माना और उसने वहम की बातों को न मानने की बात कही.
दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की. दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया. वहां से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की. रास्ते में पत्नी को प्यास लगी तो साहुकार उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद जब वो कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा, क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था. पत्नी भी साहुकार को देखकर हैरान रह गई. वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई. साहुकार ने उस व्यक्ति से पूछा- तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो. साहुकार की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- अरे भाई, यह मेरी पत्नी है. मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूं, लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?
साहुकार ने लगभग चीखते हुए कहा- तुम जरुर कोई चोर या ठग हो. यह मेरी पत्नी है. मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था. इस पर उस व्यक्ति ने कहा- अरे भाई, झूठ तो तुम बोल रहे हो. पत्नी को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था. मैं तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है. अब तुम चुपचाप यहां से चलते बनो नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा.
दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे. उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए. नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए. सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए. सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया. पत्नी भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी. राजा ने उन दोनों को कारागार में डाल देने को कहा. राजा के फैसले को सुनकर असली साहुकार भयभीत हो उठा. तभी आकाशवाणी हुई- साहुकार तूने माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया. यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है.
साहुकार ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए. मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई. भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा. साहुकार की प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया. तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया. राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देखकर हैरान हो गए. भगवान बुधदेव् की अनुकम्पा से राजा ने साहुकार और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक

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मनोजवं मारुततुल्यवेगमं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

अर्थ : मन-जैसी स्फूर्ति और वायु-जैसे वेग वाले, परम बुद्धिमान, इन्द्रियनिग्रही, वानरपति, वायुपुत्र हनुमान की शरण लेता हूं। ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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(हनुमान जी की आरती ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़)
(आरती हनुमंत की ब्रह्मदत्त)
((श्री हनुमान जी की आरती))
आरती कीजै हनुमान लाला की , दुष्टदलन रघुनाथ कला की
जाके बल से गिरिवर काँपै , रोग दोष जाके निकट न झांपै
अंजनि पुत्र महा बलदाई , संतान के प्रभु सदा सहाई
दे बीरा रघुनाथ पठाये , लंका जारि सीय सुधि लाये
लंका सो कोट समुद्र सी खाई , जात पवनसुत बार न लाई
लंका जारि असुर संहारे, सियारामजी के काज सँवारे
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आनि सजीवन पप्रान उबारे
पैठि पाताल तोरि जैम-कारे , अहिरावन की भुज उखारे
बायें भुजा असुर दल मारे, दाहिने भुजा संतजन तारे
सुर नर मुनिजन आरती उतारें, जय जय जय हनुमान उचारें
कंचन थार कपूर लौ छाई , आरती करत अंजना माई
जो हनुमानजी की आरती गावै , बसी बैकुण्ठ परम पद पावै
प्रस्तुतीकरण ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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मंगलवार व्रत की कथा इस प्रकार से है. प्राचीन समय में ऋषिनगर में केशवदत्त ब्राह्मण अपनी पत्नी
अंजलि के साथ रहता था. केशवदत्त को धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी
पति-पत्नी पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से मंगलवार का विधिवत व्रत करने लगे.
एक दिन अंजलि ने मंगलवार को व्रत रखा लेकिन किसी कारणवश उस दिन वह हनुमानजी को भोग
नहीं लगा सकी और सूर्यास्त के बाद भूखी ही सो गई. तब उसने अगले मंगलवार को हनुमानजी को
भोग लगाये बिना भोजन नहीं करने का प्रण कर लिया. छः दिन तक वह भूखी-प्यासी रही. सातवें
दिन मंगलवार को अंजलि ने हनुमानजी की विधिवत रूप से पूजा-अर्चना की, लेकिन तभी
भूख-प्यास के कारण वह बेहोश हो गई. अंजलि की इस भक्ति को देखकर हनुमानजी प्रसन्न हो गए
और उसे स्वप्न देते हुए कहा- उठो पुत्री, मैं तुम्हारी पूजा से प्रसन्न हूं और तुम्हें सुन्दर और सुयोग्य पुत्र
होने का वर देता हूं. यह कहकर पवनपुत्र अंतर्धान हो गए. तब तुरंत ही अंजलि ने उठकर हनुमानजी
को भोग लगाया और स्वयं भी भोजन किया.
हनुमानजी की अनुकम्पा से कुछ महीनों के बाद अंजलि ने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया.
मंगलवार को जन्म लेने के कारण उस बच्चे का नाम मंगलप्रसाद रखा गया. कुछ दिनों के बाद
केशवदत्त भी घर लौट आया. उसने मंगल को देखा तो अंजलि से पूछा- यह सुन्दर बच्चा किसका है?
अंजलि ने खुश होते हुए हनुमानजी के दर्शन देने और पुत्र प्राप्त होने का वरदान देने की सारी कथा
सुना दी, लेकिन केशवदत्त को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उसके मन में यह कलुषित विचार
आ गया कि अंजलि ने उसके साथ विश्वासघात किया है और अपने पापों को छिपाने के लिए झूठ
बोल रही है.
केशवदत्त ने उस बच्चे को मार डालने की योजना बनाई. एक दिन केशवदत्त स्नान करने के लिए कुएं
पर गया, मंगल भी उसके साथ था. केशवदत्त ने मौका देखकर मंगल को कुएं में फेंक दिया और घर
आकर बहाना बना दिया कि मंगल तो कुएं पर मेरे पास पहुंचा ही नहीं. केशवदत्त के इतने कहने के
ठीक बाद मंगल दौड़ता हुआ घर लौट आया. केशवदत्तमंगल को देखकर बुरी तरह हैरान हो उठा.
उसी रात हनुमानजी ने केशवदत्त को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- तुम दोनों के मंगलवार के व्रत करने
से प्रसन्न होकर पुत्रजन्म का वर मैंने प्रदान किया था, फिर तुम अपनी पत्नी को कुलटा क्यों समझते
हो. उसी समय केशवदत्त ने अंजलि को जगाकर उससे क्षमा मांगते हुए स्वप्न में हनुमानजी के दर्शन
देने की सारी कहानी सुनाई. केशवदत्त ने अपने बेटे को ह्रदय से लगाकर बहुत प्यार किया. उस दिन
के बाद सभी आनंदपूर्वक रहने लगे.
मंगलवार का विधिवत व्रत करने से केशवदत्त और उनके परिवार के सभी कष्ट दूर हो गए. इस तरह
जो स्त्री-पुरुष विधिवत रूप से मंगलवार के दिन व्रत रखते हैं और व्रतकथा सुनते हैं, अंजनिपुत्र
हनुमानजी उनके सभी कष्टों को दूर करते हुए उनके घर में धन-संपत्ति का भण्डार भर देते हैं और
शरीर के सभी रक्त विकार के रोग भी नष्ट हो जाते हैं.
प्रस्तुतीकरण...... ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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शुभ संध्या वंदन एवं रात्रि वंदन
सोमवार ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़
शिव
महादेव
महाकाल
[शिव महादेव महाकाल भोलेनाथ शंकर शंभू सोमवार संध्या एवं
रात्रि]
ॐ हीं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
स्वः भुवः भूः ॐ सः जू हौं ॐ !!
ब्रह्मदत्त त्यागी हापुड़

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