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Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

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(3m)

मैं और मेरे अह्सास

अधूरे सपने
अधूरे सपने को मुकम्मल करना चाहिए l
मनचाहा पाने के लिए आगे सरना चाहिए ll

बैठे बिठाए कुछ भी हासिल नहीं होता l
दिल की तमन्ना पाने को बहना चाहिए ll

ये खानाबदोशी दिवानगी कहां ले जाएंगी l
जीगर में जोश और उमंग भरना चाहिए ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

लौटकर नहीं आता
गुजरा हुआ लम्हा लौटकर नहीं आता l
जानेवाला वापिस मुड़कर नहीं आता ll

निगाहों से जाम छलक रहा तब आशिक l
भरी महफ़िल से उठकर नहीं आता ll

नज़रे उठाकर सीना तानकर जीने वाला l
अपने ही घर में छुपकर नहीं आता ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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प्यार
प्यार को हर दिन जताना पड़ता हैं l
हाल ए दिल रोज बताना पड़ता हैं ll

मोहब्बत के सफ़र में फूल या काटे l
जो भी मिले गले लगाना पड़ता हैं ll

दौनों बाजू से अक्कड़ काम की नहीं l
रूठे को कसमें दे मनाना पड़ता हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

हौसलों की उड़ान
हौसलों की उड़ान से कामयाबी मिलती हैं l
जीवन की बगियान में कलियां खिलती हैं ll

कठिनाइयाँ और रास्ते की परेशानियों में l
मुकम्मल कोशिशों को तौफीक सिलती हैं ll

खिलखिला कर मुस्कराते आगे बढ़कर l
दौर ए हालात को बड़े सब्र से झिलती हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जीते जी जो कभी नहीं आ सका मिलने l
सखी वो क्या जनाजे में सामिल होगा ll

सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

रिश्तों की सबसे प्यारी पहचान
रिश्तों की सबसे प्यारी पहचान जरूरत के समय पर होती हैं l
अपने अपनों के बीच प्यार और ममता के बीज को बोती हैं ll

बात कोई भी हो चाहे जितनी भी नाराजगी
हो पर जब अपने l
मदद के लिए हाथ बढ़ाकर रिश्ता मजबूती से संजोती हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जिंदगी एक खूबसूरत सफ़र
दिल ने दर्द को चुपचाप सहना सीख लिया l
जुदाई में हसते हुए जीते रहना सीख लिया ll

किसीको बिना मर्जी के बाँध नहीं सकते हैं l
जान से भी प्यारों से बिछड़ना सीख लिया ll

हमेशा कोई नहीं आता है आँसू को पोछने l
अकेलेपन में खुद ही सिमटना सीख लिया ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

त्याग और समर्पण
त्याग और समर्पण भीतरी घटना हैं l
खुद के अंदर चैन ओ सुकून भरना हैं ll

बलिदान का भाव, गहरा हृदय रखो l
मुकम्मिल प्रेम की राहों में चलना हैं ll

प्रारब्ध सोने चांदी जैसे चमकेगा तो l
यही अच्छे सच्चे व्यक्ति का गहना हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

कब्र से लिपटकर रोने से क्या फ़ायदा l
सखी गले से लगाने में बहुत देर लगी ll

अभी पूरी तरह से मिले भी न थे के बिछड़ गये l
सखी मिलना बिछड़ना हमारा भी अज़ीब था ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जीने के मायने
अजनबी हमराही जीने के मायने सिखा गया l
मंजिल तक पहुंचने के सहीं रास्ते दिखा गया ll

जिंदगी किस तरफ जीते हैं वो बताकर के l
चार लम्हें हसी खुशी के साथ बिता गया ll

मुस्कराकर आगे बढ़ने का नाम ही जीवन l
ताउम्र पाया हुआ तजुर्बा वो लिखा गया ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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